भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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भाषाटीकासहित । ( ४०१ ) निष्कार्द्धं श्लैष्मिकं गुल्मं हन्ति मूत्रानुपानतः । रसो विद्याधरो नाम गोदुग्धञ्च पिबेदनु ॥१७८॥ पारा, गंधक, हरितालभस्म, सोनामाखीभस्म, सोनाभस्म और मनशिल इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर पीपलके काथ और थूहरके दूधमें एक दिनतक खरल करके दो दो मासेकी गोली बनाकर गोमूत्रके साथ सेवन करे और ऊपरसे गायका दूध पीवे तो कफजन्य गुल्म रोग नष्ट होता है । इसे विद्याधररस कहते हैं॥१७॥१८॥ महागुल्मकालानल रस । गन्धकं तालकं ताम्रं तथैव तीक्ष्णलोहकम् । समांशं मर्दयेद् गाढं कन्यानीरेण यत्नतः ॥ १९ ॥ संपुटं कारयेत्पश्चात्सन्धिलेपञ्च कारयेत् । ततो गजपुटं दत्त्वा स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ॥ २० ॥ द्विगुञ्जं भक्षयेद् गुल्मी शृंगवेरानुपानतः । सर्वगुल्मं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥२१॥ गंधक, हरितालभस्म, तांबाभस्म, तीक्ष्णलोहभस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर घीकारके रसमें अच्छे प्रकारसे गोला बना लेवे । पश्चात् इस औषधिके पिंडको मूषामें रखकर उसके जोड़ोंको अच्छे प्रकारसे बंद करके गजपुटमें पकावे । शीतल होनेपर औषधिको चूर्ण करके दो रत्ती परिमाण लेकर अदरखके रसके साथ सेवन करे । जिस प्रकार सूर्योदयसे अंधकारका समूह नष्ट होता है उसी प्रकार इस औष- धिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारका गुल्म नष्ट होता है । इसको महा- गुल्मकालानल रस कहते हैं ॥ १९-२१.॥ अभया वटी । अभया मरिचं कृष्णा टंकणञ्च समांशकम् । सर्वचूर्णसमञ्चैव दद्यात्कानकजं फलम् ॥ २२ ॥