रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४०० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । भक्षयेत्पर्णखण्डेन हिंगुसिन्धुसुवर्चलैः । दाडिमञ्च तथा बिल्वं कार्षिकं भृङ्गजैर्द्रवैः ॥ १३ ॥ पिष्ट्वा तु सुरया युक्तं देयं स्यादनुपानकम् । सर्वगुल्मं निहन्त्याशु शूलञ्च परिणामजम् ॥ १४ ॥ पारा, गन्धक, सोनामाखीभस्म, जवाखार, तांबाभस्म और अभ्रक- भस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर चीतेकी जड़के क्वाथ और आकके पत्तोंके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे; इसको पानमें रखकर खावे । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें हींग, सेंधानमक, कालानमक, अनार और बेलगिरी इन सबको एक एक कर्ष परिमाण लेकर भांगरेके रसमें खरल करके मदिराके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके गुल्म और परिणामशूल नष्ट होते हैं । इसको वडवानल रस कहते हैं ॥ १३-१४ ॥ महानाराच रस । सूतटङ्कणतुल्यांशं मरिचं सूततुल्यकम् । गन्धकं पिप्पली शुण्ठी द्वौ द्वौ भागौ विमिश्रयेत् १५ सर्वतुल्यं क्षिपेद्दन्तीबीजं निस्तुषमेव च । द्विगुञ्जं रेचनं सिद्धं नाराचाख्यो महारसः ॥ १६ ॥ पारा, सुहागा और कालीमिरच यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग; गंधक, पीपल और सोंठ यह प्रत्येक औषधि दो दो भाग और दंतीके बीज ( जमालगोटे ) नव ९ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र पीस- कर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे अच्छे प्रकारसे विरेचन होजाता है । इसको महानाराच रस कहते हैं ॥ १५ ॥ १६ ॥ विद्याधर रस । पारदं गन्धकं तालं ताप्यं स्वर्णं मनःशिलाम् । कृष्णाक्वाथैः स्नुहीक्षीरैर्दिनैकं मर्दयेत्सुधीः ॥१७॥