रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (४०५) प्रत्येकं पलिकं ग्राह्यं छागीदुग्धेन पेषयेत् । चतुर्गुञ्जां वटीं खादेद्वारिणा मधुनापि वा ॥ ३९ ॥ प्राणवल्लभनामायं गहनानन्दभाषितः । निहन्ति कामलां पाण्डुं मेहं हिक्कां विशेषतः॥४०॥ असाध्यं सन्निपातञ्च गुल्मं रुधिरसम्भवम् । वातरक्तञ्च कुष्ठञ्च कण्डूविस्फोटकापचीम् ॥ ४१ ॥ लोहाभस्म, तांवाभस्म, कौड़ीकी भस्म, तूतिया, हींग, त्रिफला, थूहरकी मूल, जवाखार, जमालगोटे, सुहागा और निसोध यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले लेकर बकरीके दूधमें पीसकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको सहत अथवा जलके साथ सेवन करनेसे कामला, पांडु, प्रमेह, हिक्का, असाध्य सन्निपात, रक्तज गुल्म, वातरक्त, कुष्ठ, कण्डू, विस्फोट क और अपची रोग नष्ट होते हैं । इस प्राणवल्लभ रसको गहनानन्दनाथने कहा है ॥ ३८-४१ ॥ सर्वेश्वर रस । ताम्रं दशगुणं स्वर्णात्स्वर्णपादं कटुत्रिकम् । त्रिकटु त्रिफला तुल्या त्रिफलार्द्धमयोरजः ॥ ४२ ॥ अयसोऽर्द्धं विषञ्चैव सर्वं संमर्द्य यत्नतः । सर्वेश्वररसो नाम रौधिरगुल्मनाशनः ॥ ४३ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे गुल्मरोगचिकित्सा । तांबाभस्म १० भाग, सोनाभस्म १ भाग, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, बहेड़ा और आमले यह प्रत्येक औषधि सोनेसे चौथाई भाग, लोहेका चूर्ण त्रिफलेसे आधा भाग और लोहेसे आधा भाग विष लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके सेवन करनेसे रक्तजगुल्म रोग नष्ट होता है । इसको सर्वेश्वर रस कहते हैं ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ इति गुल्मरोगचिकित्सा ।