भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 430

( ४०४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । बवासीर, हृदयरोग और क्रिमिरोग नष्ट होते हैं । गोमूत्रके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे बहुत दिनोंका कफजनित गुल्म रोग नष्ट होता है। दूधके साथ सेवन करनेसे पित्तरोग, मद्य और अम्लके साथ सेवन करनेसे वातरोग, त्रिफलेके रस और गोमूत्रके साथ सेवन करनेसे त्रिदोषज रोग शांत होता है । स्त्रियोंके गुल्मरोगमें इसको ऊंटनीके दूधके साथ सेवन करावे । इसको कांकायन मुनिने कहा है ॥२७-३३॥ गुल्मशार्दूल रस । रसं गन्धं शुद्धलौहं गुग्गुलोः पिप्पलं पलम् । त्रिवृता पिप्पली शुण्ठी शटी धान्यकजीरकम्॥३४ प्रत्येकं पलिकं ग्राह्यं पलार्द्धं कानकं फलम् । संचूर्ण्य वटिका कार्या घृतेन वल्लमानतः ॥ ३५ ॥ वटीद्वयं भक्षयेच्चार्द्रकोष्णाम्बु पिबेदनु । हन्ति प्लीहयकृद्गुल्मकामलोदरशोथकम् ॥ ३६ ॥ वातिकं पैत्तिकं गुल्मं श्लैष्मिकं रौधिरं तथा । गहनानन्दनाथोक्तरसोऽयं गुल्मशार्दुलः ॥ ३७ ॥ पारा, गन्धक, लोहभस्म, गूगल, सुगन्धवाला, निसोथकी जड़, पीपल, सोंठ, कचूर, धनियां और जीरा यह प्रत्येक औषधि एक एक पल, जमाल गोटे २ तोले लेवे इन सब औषधियोंको एकत्र करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । घीके साथ इसकी दो गोली खाकर ऊपरसे अदरखका रस और गरम जल पीवे । इसके सेवन करनेसे प्लीहा, यकृत, गुल्म, कामला, उदरशोथ और वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक और रक्तज गुल्मरोग नष्ट होते हैं । इस गुल्मशार्दूल रसको श्रीमान् गहनानन्दनाथने कहा है ॥ ३४-३७ ॥ प्राणवल्लभ रस । लौहं ताम्रं वराटञ्च तुत्थं हिंगु फलत्रिकम् । स्नुहीमूलं यवक्षारं जैपालं टङ्कणं त्रिवृत् ॥ ३८ ॥ !