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रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

( ४०४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । बवासीर, हृदयरोग और क्रिमिरोग नष्ट होते हैं । गोमूत्रके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे बहुत दिनोंका कफजनित गुल्म रोग नष्ट होता है। दूधके साथ सेवन करनेसे पित्तरोग, मद्य और अम्लके साथ सेवन करनेसे वातरोग, त्रिफलेके रस और गोमूत्रके साथ सेवन करनेसे त्रिदोषज रोग शांत होता है । स्त्रियोंके गुल्मरोगमें इसको ऊंटनीके दूधके साथ सेवन करावे । इसको कांकायन मुनिने कहा है ॥२७-३३॥ गुल्मशार्दूल रस । रसं गन्धं शुद्धलौहं गुग्गुलोः पिप्पलं पलम् । त्रिवृता पिप्पली शुण्ठी शटी धान्यकजीरकम्॥३४ प्रत्येकं पलिकं ग्राह्यं पलार्द्धं कानकं फलम् । संचूर्ण्य वटिका कार्या घृतेन वल्लमानतः ॥ ३५ ॥ वटीद्वयं भक्षयेच्चार्द्रकोष्णाम्बु पिबेदनु । हन्ति प्लीहयकृद्गुल्मकामलोदरशोथकम् ॥ ३६ ॥ वातिकं पैत्तिकं गुल्मं श्लैष्मिकं रौधिरं तथा । गहनानन्दनाथोक्तरसोऽयं गुल्मशार्दुलः ॥ ३७ ॥ पारा, गन्धक, लोहभस्म, गूगल, सुगन्धवाला, निसोथकी जड़, पीपल, सोंठ, कचूर, धनियां और जीरा यह प्रत्येक औषधि एक एक पल, जमाल गोटे २ तोले लेवे इन सब औषधियोंको एकत्र करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । घीके साथ इसकी दो गोली खाकर ऊपरसे अदरखका रस और गरम जल पीवे । इसके सेवन करनेसे प्लीहा, यकृत, गुल्म, कामला, उदरशोथ और वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक और रक्तज गुल्मरोग नष्ट होते हैं । इस गुल्मशार्दूल रसको श्रीमान् गहनानन्दनाथने कहा है ॥ ३४-३७ ॥ प्राणवल्लभ रस । लौहं ताम्रं वराटञ्च तुत्थं हिंगु फलत्रिकम् । स्नुहीमूलं यवक्षारं जैपालं टङ्कणं त्रिवृत् ॥ ३८ ॥ !

भाषाटीकासहित । (४०५) प्रत्येकं पलिकं ग्राह्यं छागीदुग्धेन पेषयेत् । चतुर्गुञ्जां वटीं खादेद्वारिणा मधुनापि वा ॥ ३९ ॥ प्राणवल्लभनामायं गहनानन्दभाषितः । निहन्ति कामलां पाण्डुं मेहं हिक्कां विशेषतः॥४०॥ असाध्यं सन्निपातञ्च गुल्मं रुधिरसम्भवम् । वातरक्तञ्च कुष्ठञ्च कण्डूविस्फोटकापचीम् ॥ ४१ ॥ लोहाभस्म, तांवाभस्म, कौड़ीकी भस्म, तूतिया, हींग, त्रिफला, थूहरकी मूल, जवाखार, जमालगोटे, सुहागा और निसोध यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले लेकर बकरीके दूधमें पीसकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको सहत अथवा जलके साथ सेवन करनेसे कामला, पांडु, प्रमेह, हिक्का, असाध्य सन्निपात, रक्तज गुल्म, वातरक्त, कुष्ठ, कण्डू, विस्फोट क और अपची रोग नष्ट होते हैं । इस प्राणवल्लभ रसको गहनानन्दनाथने कहा है ॥ ३८-४१ ॥ सर्वेश्वर रस । ताम्रं दशगुणं स्वर्णात्स्वर्णपादं कटुत्रिकम् । त्रिकटु त्रिफला तुल्या त्रिफलार्द्धमयोरजः ॥ ४२ ॥ अयसोऽर्द्धं विषञ्चैव सर्वं संमर्द्य यत्नतः । सर्वेश्वररसो नाम रौधिरगुल्मनाशनः ॥ ४३ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे गुल्मरोगचिकित्सा । तांबाभस्म १० भाग, सोनाभस्म १ भाग, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, बहेड़ा और आमले यह प्रत्येक औषधि सोनेसे चौथाई भाग, लोहेका चूर्ण त्रिफलेसे आधा भाग और लोहेसे आधा भाग विष लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके सेवन करनेसे रक्तजगुल्म रोग नष्ट होता है । इसको सर्वेश्वर रस कहते हैं ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ इति गुल्मरोगचिकित्सा ।

( ४०६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ हृद्रोगाधिकार । हृदयार्णव रस । शुद्धसूतं समं गन्धं मृतताम्रं तयोः समम् । मर्दयेत्त्रिफलाक्वाथैः काकमाचीद्रवैर्दिनम् ॥ १ ॥ चणमात्रां वटीं खादेद्रसोऽयं हृदयार्णवः । काकमाचीफलं कर्षं त्रिफलाफलसंयुतम् ॥ २ ॥ द्वात्रिंशत्तोलकं तोयं क्वाथमष्टावशेषितम् । अनुपानं पिबेच्चात्र हृद्रोगे च कफोत्थिते ॥ ३ ॥ पारा १ भाग, गंधक १ भाग, तांबाभस्म २ भाग इन सब औषधि- योंको एकत्र करके त्रिफलेके क्वाथमें और मकोयके रसमें एक दिन- तक खरल करे। पश्चात् चनेकी बराबर गोली बना लेवे। इस औष- धिके सेवन करनेके पश्चात् एक तोला मकोय और १ तोले त्रिफ- लेको बत्तीस तोले जलमें पकावे; जब पकते पकते जल आठवां भाग बाकी रह जाय तब उतारकर छानके पान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे कफजन्य हृदयरोग दूर होता है । इसको हृदयार्णव रस कहते हैं ॥ १-३ ॥ नागार्जुनाभ्रक । सहस्रपुटनैः शुद्धं वज्राभ्रमर्जुनत्वचः । सत्त्वैर्विमर्दितः सप्तदिनं खल्ले विशोषितम् ॥ ४ ॥ छायाशुष्का वटी कार्या नाम्नेदमर्जुनाह्वयम् । हद्रोगं सर्वशूलार्शोहल्लासच्छर्द्यरोचकान् ॥ ५ ॥ अतीसारमग्निमान्द्यं रक्तपित्तं क्षतक्षयम् । शोथोदराम्लपित्तञ्च विषमज्वरमेव च ॥ हन्त्यन्यान्यपि रोगाणि बल्यं वृष्यं रसायनम् ॥६॥

सहस्र पुटसे शुरू किया हुआ वज्राभ्रक लेकर अर्जुनकी छालके क्वाथमें सात भावना देकर गोली बनाकर छायामें सुखा लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे हृदयरोग, सर्व प्रकारका शूल, बवासीर, हल्लास, वमन, अरुचि, अतिसार, मंदाग्नि, रक्तपित्त, क्षतक्षय, शोथ, उदररोग,अम्लपित्त और विषमज्वर नष्ट होते हैं। इसके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके रोग नष्ट होकर बल, वीर्य और रसकी वृद्धि होती है । इसको नागार्जुनाभ्रक कहते हैं ॥ ४-६ ॥ पञ्चानन रस । सूतगन्धौ द्रवैर्धात्र्या मर्दयेद् गोस्तनीद्रवैः । यष्टिखर्जूरसलिलैर्दिनं च परिमर्दयेत् ॥ धात्रीचूर्णं सिताञ्चानु पिबेद्ध्रद्रोगशान्तये ॥ ७ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे हृद्रोगाधिकार । पारे और गंधक दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर आमलोंके रस, दाख, मुलैठीके रस और खजूरके क्वाथमें पृथक् पृथक् खरल करके चूर्ण बनावे, इसको उचित मात्रासे आमलेके चूर्ण और मिसरीके साथ सेवन करे तो हृद्रोग दूर होता है । इसको पञ्चानन रस कहते हैं ॥ ७ ॥ इति हृद्रोगाधिकार संपूर्ण । अथ मूत्रकृच्छ्राधिकार । त्रिनेत्राख्य रस । वङ्गं सूतं गन्धकं भावयित्वा लौहे पात्रे मर्दयेदेक- घस्रम् । दूर्वायष्टीगोक्षुरैः शाल्मलीभिर्मूषामध्ये भूधरे पाचयित्वा ॥ १ ॥ तत्तद्भावैर्भावयित्वास्य वल्लं दद्याच्छीतं पायसं वक्ष्यमाणम् । दूर्वायष्टी- शाल्मलीतोयदुग्धैस्तुल्यैः कुर्यात्पायसं तद्ददीत ।

( ४०८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्रातःकाले शीतपानीयपानान्मूत्रे जाते स्यात्सुखी च क्रमेण ॥ २ ॥ वंगभस्म, पारा और गंधक इन तीनों औषधियोंको समान भाग लेकर लोहेके पात्रमें दूर्वा, मुलैठी, गोखरू और सेमलकी जड़के रसमें अलग अलग खरल करके मूषामें रखकर भूधरयंत्रमें पकावे । पश्चात् उपरोक्त दूब आदिके रसमें सात सात भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । पश्चात् दूब,मुलैठी और सेमलकी जड़का काथ और दूध यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर खीर बनाकर औषधि सेवन करनेके पश्चात् सेवन करे और प्रातःकाल शीतल जलको पीवे । इसके सेवन करनेसे अच्छे प्रकारसे खुलकर साफ पेशाब होता है और रोगी अच्छे प्रकारसे चलने फिरनेको समर्थ होता है । इसको त्रिनेत्राख्य रस कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ वरुणाद्य लौह । द्विपलं वरुणं धात्र्यास्तदर्द्धं धातृपुष्पकम् । हरीतक्याः पलार्द्धञ्च पृश्निपर्णी तदर्द्धकम् ॥ ३ ॥ कर्षमानञ्च लौहाभ्रं चूर्णमेकत्र कारयेत् । भक्षयेत्प्रातरुत्थाय शाणमानं विधानवित् ॥ ४ ॥ मूत्राघातं तथा घोरं मूत्रकृच्छ्रञ्च दारुणम् । अश्मरीं विनिहंत्याशु प्रमेहं विषमज्वरम् ॥ ५ ॥ बलपुष्टिकरञ्चैव वृष्यमायुष्यमेव च । वरुणाद्यमिदं लौहं चरकेण विनिर्मितम् ॥ ६ ॥ बरनेकी छाल २ पल, आमले २ पल, धायके फूल १ पल, हरड़ २ तोले, पृश्निपर्णी, लोहाभस्म और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक कर्ष परिमाण लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके प्रतिदिन प्रातःकाल चार मासे परिमाण भक्षण करे । इस

भाषाटीकासहित । (४०९) औषधिके सेवन करनेसे अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, प्रमेह और विषमज्वर नष्ट होकर बल, पुष्टि, वीर्य और आयुकी वृद्धि होती है । यह वरुणाद्य लोह चरकाचार्यने कहा है ॥ ३-६ ॥ अयोरजः श्लक्ष्णपिष्टं मधुना सह योजयेत् । मूत्राघातं निहन्त्याशु मूत्रकृच्छ्रं सुदारुणम् ॥ ७ ॥ लोहभस्मके चूर्णको अत्यन्त बारीक पीसकर सहतमें मिलाकर सेवन करनेसे मूत्राघात और दारुण मूत्रकृच्छ्र रोग दूर होते हैं ॥ ७ ॥ रसगन्धयवक्षारं सितातक्रयुतं पिबेत् । मूत्रकृच्छ्रान्यशेषाणि निहन्ति नियतं नृणाम् ॥ ८ ॥ पारा और गन्धक, दोनोंको समान भाग लेकर कज्जली बना लेवे । फिर उसमें पारेकी बराबर जवाखार मिलाकर मिश्री और तक्रके साथ सेवन करे तो अनेक प्रकारका मूत्रकृच्छ्र रोग नष्ट होता है ॥ ८ ॥ भैषज्यैरश्मरीप्रोक्तैर्मूत्रकृच्छ्रमुपाचरेत् । योगवाहिरसैर्वापि चानुपानविशेषतः ॥ ९ ॥ अश्मरी रोगमें जो औषधि कही है वह सब औषधि इस मूत्रकृच्छ्र रोगमें भी प्रयुक्त करनी चाहिये । अथवा समस्त योगवाही रसोंको अनुपान विशेषोंके साथ सेवन करावे ॥ ९ ॥ मूत्रकृच्छ्रान्तक रस । शतावरीरसैः पिष्ट्वा मृतसूतञ्च तालकम् । शिखितुत्थञ्च तुल्यांशं दिनैकं मर्दयेद्दृढम् ॥ १० ॥ तद्गोलं सार्षपे तैले पाच्यं यामञ्च चूर्णयेत् । मूत्रकृच्छ्रान्तकश्चास्य क्षौद्रैर्गुञ्जाचतुष्टयम् ॥ ११ ॥ भक्षणान्नात्र सन्देहो मूत्रकृच्छ्रं निहन्त्यलम् ।

( ४१० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । तुलसीतिलपिण्याकं बिल्वमूलं तुषाम्बुना ॥ कर्षैकं वानुपानेन सुरया वा सुवर्चलैः ॥ १२ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे मूत्रकृच्छ्राधिकारः । रससिन्दूर और हरिताल इन दोनोंको समान भाग लेकर सतावरके रसमें खरल करके पश्चात् उसमें रससिन्दूरकी बराबर तूतिया मिला- कर एक दिनतक खरल करके गोला बना लेवे । पश्चात् इस गोलेको सरसोंके तेलमें एक प्रहरतक पकाकर चूर्ण कर लेवे । सहतके साथ इस औषधिको चार रत्ती परिमाण लेकर सेवन करे तो मूत्रकृच्छ्र रोग दूर हो जाता है । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें तुलसीके पत्ते, तिलकी खली और बेलकी जड़ इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर पीसकर कांजीमें मिलाकर एक कर्ष परिमाण सेवन करे । अथवा काले नमकको मदिराके साथ सेवन करे । इसको मूत्रकृच्छा- न्तक रस कहते हैं ॥ १०–१२ ॥ इति मूत्रकृच्छ्ररोगाधिकार सम्पूर्ण । अथ मूत्राघाताधिकार । तारकेश्वर रस । मृतसूताभ्रगन्धं च मर्दयेन्मधुना दिनम् । तारकेश्वरनामायं गहनानन्दभाषितः ॥ १ ॥ माषमात्रं भजेत्क्षौद्रैर्बहुमूत्रप्रशान्तये । उदुम्बरफलं पक्वं चूर्णितं कर्षमात्रकम् ॥ संलिह्यान्मधुना सार्द्धमनुपानं सुखावहम् ॥ २ ॥ रससिन्दूर, अभ्रकभस्म और गन्धक इन तीनों औषधियोंको समान भाग लेकर सहतमें एक दिनतक खरल करके एक मासे परिमाण औषधि सहतमें मिलाकर सेवन करनेसे मूत्राघातरोग दूर होता है । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें पक्व गूलरको पीसकर एक तोला सहतमें मिलाकर भक्षण करे ॥ १ ॥ २ ॥

भाषाटीकासहित । (४११) लघुलोकेश्वर रस । शुद्धसूतस्य भागैकश्चत्वारः शुद्धगन्धकात् । पिष्ट्वा वराटिका पूर्या रसपादेन टंकणम् ॥ ३ ॥ क्षीरैः पिष्ट्वा मुखं लिप्त्वा भाण्डे रुद्ध्वा पुटे पचेत् । स्वाङ्गशीतं विचूर्ण्याथ लघुलोकेश्वरो मतः ॥ ४ ॥ चतुर्गुआप्रमाणन्तु मरिचेन तथैव च । जातीमूलफलैर्युक्तमजाक्षीरेण पाययेत् ॥ शर्कराभावितञ्चानु पीत्वा कृच्छ्रहरः परः ॥ ५ ॥ शुद्ध पारा १ भाग और शुद्ध गन्धक ४ भाग लेवे, दोनोंको एकत्र खरल करके कौड़ीमें भर देवे, फिर पारेसे चौथाई भाग सुहागा लेकर दूधमें पीसकर उससे कौड़ीके मुखको बन्द कर देवे । फिर उस कौड़ीको मूषामें रखकर और उसको अच्छे प्रकारसे कपरमिट्टीसे बन्द करके पुटपाकसे पकावे । जब शीतल होजाय तब इसका चूर्ण करके चार रत्ती परिमाण लेकर चार रत्ती काली मिरचोंका चूर्ण, चार रत्ती चमेलीकी जड़का चूर्ण और चार रत्ती जायफलका चूर्ण इन सबको एकत्र करके बकरीके दूध और मिश्रीके साथ पान करे तो मूत्रकृच्छ्र रोग दूर होता है । इसको लघुलोकेश्वर रस कहते हैं ॥ ३-५ ॥ अन्य योग । येनौषधेन मतिमान्मूत्रकृच्छ्रमुपाचरेत् । तेनौषधेन श्रेष्ठेन मूत्राघातानुपाचरेत् ॥ ६ ॥ जो औषधि मूत्रकृच्छ्र रोगकी कही हैं वे सब औषधि मूत्राघात रोगमें भी प्रयुक्त करनी चाहिये ॥ ६ ॥ लवणाम्लवरायुक्तं घृतञ्चापि पिबेन्नरः । तस्य नश्यन्ति वेगेन मूत्राघातास्त्रयोदश ॥ ७ ॥

( ४१२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सेंधानमक, कांजी और त्रिफलेका चूर्ण इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर घृतके साथ सेवन करनेसे त्रयोदश प्रकारका मूत्रा- घातरोग दूर होता है ॥ ७ ॥ पक्वमिर्वारुबीजानामक्षमात्रं ससैन्धवम् । धान्याम्लयुक्तं पीत्वैव मूत्राघाताद्विमुच्यते ॥ ८ ॥ पकी हुई ककड़ीके बीजोंको ( अथवा खीरेके बीजोंको ) एक तोला परिमाण लेकर सेंधानमक और कांजीके साथ सेवन करनेसे मूत्राघात रोग नष्ट होता है ॥ ८ ॥ गोखरुआदि योग । त्रिकण्टकैरण्डशतावरीभिः सिद्धं पयो वा तृण- पञ्चमूलैः । गुडप्रगाढं सघृतं पयो वा रोगेषु कृच्छ्रादिषु शस्तमेतत् ॥ ९ ॥ गोखरू, एरंडकी जड़ और सतावर इन तीनों औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर दूधमें पकाकर उस दूधको पान करे । अथवा तृणपंचमूल ( कुशा, काँस, रामसर, डाभ और ईख ) के द्वारा सिद्ध किये हुए दूधको या गुड़सहित घी मिले हुए दूधको इस मूत्रकृच्छ्र और मूत्राघात रोगमें प्रयोग करना चाहिये ॥ ९ ॥ इति मूत्राघातरोगचिकित्सा । अथ अश्मरीरोगचिकित्सा । पाषाणवज्र रस । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं रसैः श्वेतपुनर्नवैः । मर्दयित्वा दिनं खल्ले रुद्ध्वा तद्भूधरे पचेत् ॥ १ ॥ दिनान्ते तत्समुद्धृत्य मर्दयेद् गुडसंयुतम् । अश्मरीं बस्तिशूलञ्च हन्ति पाषाणवज्रकः ॥ २ ॥

भाषाटीकासहित । ( ४१३ ) गोरक्षकर्कटीमूलक्वाथं कौलत्थकं तथा । अनुपानं प्रयोक्तव्यं बुद्ध्वा दोषबलाबलम् ॥ ३ ॥ पारा १ भाग और गंधक २ भाग दोनोंको एकत्र पीसकर कज्जली बना लेवे । फिर सफेद विषखपरेके रसमें एक दिनतक खरल करके मूषामें रखकर संधिस्थानों ( जोड़ों ) को अच्छे प्रकारसे बंद करके भूधरयंत्रमें एक दिनतक पकावे । फिर इसको चूर्ण करके गुड़के साथ सेवन करनेसे अश्मरी ( पथरी ) और बस्तिशूल नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें गोरखककडी ( एरण्डककडी ) का क्वाथ; अथवा कुलथीका क्वाथ पान करे । अथवा दोषोंका बलाबल विचार कर अनुपानकी कल्पना करे । इसको पाषाणवज्र रस कहते हैं ॥ १-३ ॥ त्रिविक्रमरस । मृतताम्रमजाक्षीरैः पाच्यं तुल्यं गते द्रवे । तत्ताम्रं शुद्धसूतञ्च गन्धकञ्च समं समम् ॥ ४ ॥ निर्गुण्डीस्वरसैर्मर्द्द्यैदिनं तद्गोलकीकृतम् । यामैकं वालुकायन्त्रे पक्त्वा योज्यं द्विगुञ्जकम् ॥५॥ बीजपूरस्य मूलञ्च सजलञ्चानुपाययेत् । रसस्त्रिविक्रमो नाम शर्करामश्मरीं जयेत् ॥ ६ ॥ तांबेकी भस्मको बराबरके बकरीके दूधमें पकावे । जब वह पककर गाढा हो जाय तब तांबेकी बराबर पारा और समान गंधक मिलाकर सम्हालूके रसमें एक दिनतक खरल करके गोला बना लेवे । फिर उस गोलेको एक मूषा ( घडिया ) में रखकर ऊपरसे कपरोटी करके एक प्रहरतक वालुका यंत्रमें पकावे । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर बिजौरे नींबूकी जडके चूर्ण और जलके साथ सेवन करे, इससे शर्करा और अश्मरी रोग नष्ट होते हैं । इसको त्रिविक्रम रस कहते हैं ॥ ४-६ ॥

( ४१४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लोहप्रयोग । अयोरजः श्लक्ष्णपिष्टं मधुना सह योजितम् । अश्मरीं विनिहन्त्याशु मूत्रकृच्छ्रञ्च दारुणम् ॥ ७ ॥ लोहभस्मको बारीक पीसकर सहतके साथ सेवन करनेसे अश्मरी और मूत्रकृच्छ्र रोग दूर होते हैं ॥ ७ ॥ अन्य योग । इन्द्रवारुणिकामूलं मरिचं क्षीरपाचितम् । पर्पटीरससंयुक्तं सप्ताहादश्मरीं जयेत् ॥ ८ ॥ इन्द्रायणकी जड़ और काली मिरचोंको दूधमें पकावे । फिर दोनोंको अच्छे प्रकारसे मर्दन करके पित्तपापड़ेके रसके साथ एक सप्ताह पर्यंत सेवन करनेसे अश्मरी रोग नष्ट होता है ॥ ८ ॥ गंधकादियोग । गन्धकं जीरकं क्षुद्राफलं क्षारद्वयं सदा । अश्मरीं शर्करां मूत्रकृच्छ्रं क्षपयति ध्रुवम् ॥ ९ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे अश्मर्य्यधिकारः । गंधक, जीरा, कटेरीके फल, सज्जीक्षार और जवाखार इन सबको एकत्र पीसकर भक्षण करनेसे शर्करा और मूत्रकृच्छ्ररोग दूर होते हैं ॥९॥ इति अश्मरीरोगचिकित्सा । अथ प्रमेहाधिकार । हरिशंकररस । मृतसूताभ्रकं तुल्यं धात्रीफलनिशाद्रवैः । सप्ताहं भावयेत्खल्ले योगोऽयं हरिशंकरः ॥ माषमात्रां वटीं खादेत्सर्वमेहप्रशान्तये ॥ १ ॥ रससिन्दूर और अभ्रकभस्म दोनोंको समान भाग लेकर आमला और हल्दीके रसमें सात वार भावना देकर एक एक मासेकी गोली बना

४. चतुर्थ-पञ्चम अध्याय: कुष्ठ, प्रमेह, विसर्प, विष-चिकित्सा, रसायन-वाजीकरण एवं उपसंहार

भाषाटीकासहित । ( ४१६ ) लेवे इस औषधिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारका प्रमेह रोग नष्ट होता है । इसको हरिशंकर रस कहते हैं ॥ १ ॥ इन्द्रवटी । मृतं सूतं मृतं वङ्ग-मर्जुनस्य त्वचान्वितम् । तुल्यांशं मर्दयेत्खल्ले शाल्मल्या मूलजैर्द्रवैः ॥ २ ॥ दिनान्ते वटिका कार्या माषमात्रा प्रमेहहा । एषा इन्द्रवटी नाम्ना मधुमेहप्रशान्तिकृत् ॥ ३ ॥ रससिन्दूर, वंगभस्म और अर्जुनवृक्षकी छाल समान भाग लेकर सेमलकी जड़के रसमें एक दिनतक खरल करके एक एक मासेकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे सब प्रकारका प्रमेह और मधुमेह नष्ट होता है ॥ २ ॥ ३ ॥ वङ्गावलेह । वंगभस्म द्विवल्लञ्च लेहयेन्मधुना सह । ततो गुडसमं गन्धं भक्षयेत्कर्षमात्रकम् ॥ ४ ॥ गुडूचीसत्त्वमथवा शर्करासहितं तथा । सर्वमेहहरो ज्ञेयो वङ्गावलेह उत्तमः ॥ ५ ॥ चार रत्ती परिमाण वंगकी भस्मको सहतमें मिलाकर चाटे और ऊपरसे एक कर्ष परिमाण गुड़ और गंधक भक्षण करे । अथवा एक तोला गिलोयका सत और मिश्री दोनोंको एकत्र मिलाकर भक्षण करे । इसके सेवन करनेसे सब प्रकारका प्रमेहरोग दूर होता है । इसको वंगावलेह कहते हैं ॥ ४ ॥ ५ ॥ प्रमेहसेतु । सूताभ्रञ्च वटक्षीरैर्मर्दयेत्प्रहरद्वयम् । विशोष्य पक्वमूषायां सर्वरोगे प्रयोजयेत् ॥ ६ ॥

( ४१६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । विशेषान्मेहरोगेषु त्रिफलामधुसंयुक्तम् । युञ्जीत वल्लमेकन्तु रसेन्द्रस्यास्य वैद्यराट् ॥ ७ ॥ रससिन्दूर और अभ्रकभस्म दोनोंको समान भाग लेकर बड़के दूधमें दो प्रहरतक खरल करके मूषामें रखकर मंद मंद अग्निसे पकावें । इस औषधिका सब रोगोंमें प्रयोग करना चाहिये । प्रमेह रोगमें इस औषधिको दो रत्ती लेकर त्रिफलेके रसके साथ और सह- तके साथ सेवन करे । इसको प्रमेहसेतु रस कहते हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥ विडंगाद्य लोह । विडङ्गत्रिफलामुस्तैः कणया नागरेण च । जीरकाभ्यां युतं हन्ति प्रमेहानतिदारुणान् ॥ लौहं मूत्रविकारांश्च सर्वानैव विनाशयेत् ॥ ८ ॥ वायविडंग, हरड़, बहेड़ा, आमला, नागरमोथा, पीपल, सोंठ, जीरा और कालाजीरा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और लोहाभस्म ९ नव भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे प्रमेह और सब प्रकारके मूत्ररोग नष्ट होते हैं । इसको विडंगाद्य लोह कहते हैं ॥ ८ ॥ बृहत् हरिशंकर रस । रसगन्धकलौहञ्च स्वर्णं वङ्गञ्च माक्षिकम् । समभागं तु संपिष्य वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ ९ ॥ सप्ताहमामलद्रावैर्भावितोऽयं रसेश्वरः । हरिशङ्करनामायं गहनानन्दभाषितः ॥ प्रमेहान् विंशतिं हन्ति सत्यं सत्यं न संशयः ॥१०॥ पारा, गंधक, लोहाभस्म, सोनाभस्म, वंगभस्म और सोना- माखीभस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर आमलोंके रसमें

भाषाटीकासहित । ( ४१७ ) सात भावना देकर गोलियां बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे बीस प्रकारके प्रमेह रोग नष्ट होते हैं । यह बृहत् हरिशंकर रस गहनानन्दने कहा है ॥ ९ ।। १० ॥ आनन्दभैरव रस । वङ्गभस्म मृतं स्वर्णं रसं क्षौद्रैर्विमर्दयेत् । द्विगुञ्जं भक्षयेन्नित्यं हन्ति मेहं चिरोद्भवम् । गुञ्जामूलं तथा क्षौद्रैरनुपानं प्रशस्यते ॥ ११ ॥ वंगभस्म, सोनाभस्म और रससिन्दूर इन तीनों औषधियोंको समान भाग लेकर सहतमें मिलाकर दो रत्ती परिमाण नित्य खावे । इससे बहुत दिनोंका पुराना प्रमेह नष्ट होजाता है। इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् गुंजाकी जड़को सहतमें मिलाकर भक्षण करे । इसको आनन्दभैरव रस कहते हैं ॥ ११ ॥ विद्यावागीश रस । मृतसूताभ्रनागञ्च स्वर्णं तुल्यं प्रकल्पयेत् । महानिम्बस्य चूर्णं तु चतुर्भिः सममाहरेत् ॥ १२ ॥ मधुना लेहयेन्माषं लालामेहप्रशान्तये । सक्षौद्रं रजनीचूर्णं लेह्यं निष्कद्वयं तथा ॥ असाध्यं नाशयेन्मेहं विद्यावागीशको रसः ॥ १३ ॥ रससिन्दूर, अभ्रकभस्म, सीसाभस्म और सोनाभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, बकायनका चूर्ण ४ भाग इन सब औषधि- योंको एकत्र करके एक मासे सहतके साथ सेवन करनेसे लालामेह नष्ट होता है। इस औषधिके भक्षण करनेके पश्चात् छः मासे हल्दीके चूर्णको सहतमें मिलाकर चाटे । इसके सेवन करनेसे असाध्य प्रमेहरोग भी नष्ट हो जाता है । इसको विद्यावागीश रस कहते हैं ॥१२॥१३॥

( ४१८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मेहमुद्गर रस । रसाञ्जनं विडं दारु बिल्वगोक्षुरदाडिमम् । भूनिम्बं पिप्पलीमूलं त्रिकटु त्रिफला त्रिवृत् ॥ १४ ॥ प्रत्येकं तोलकं देयं लौहचूर्णन्तु तत्समम् । पलैकं गुग्गुलुं दत्त्वा घृतेन वटिकां कुरु ॥ १५ ॥ माषैका निर्मिता चेयं मेहमुद्गरसंज्ञिनी । श्रीमद्गहननाथेन लोकनिस्तारकारिणा ॥ १६ ॥ अनुपानं प्रकर्त्तव्यं छागीदुग्धं जलञ्च वा । मेहांश्च विंशतिं हन्ति मूत्रकृच्छ्रं हलीमकम् ॥ १७ ॥ अश्मरीं कामलां पाण्डुं मूत्राघातमरोचकम् । अर्शांसि व्रणकुष्ठञ्च वातरक्तं भगन्दरम् ॥ १८ ॥ रसौत, विरियासेंचरनमक, दारुहलदी, बेलकी छाल, गोखुरुके बीज, अनारका बक्कल, चिरायता, पीपलामूल, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल और निसोध यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेवे और सबके बराबर लोहेका चूर्ण लेवे, गूगल ४ तोले इन सब औषधियोंको एकत्र करके घृतमें खरल करके एक एक मासेकी गोली बना लेवे । बकरीके दूध अथवा जलके साथ इस औष- धिके सेवन करनेसे बीस प्रकारका प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, हलीमक, अश्मरी, कामला, पाण्डु, मूत्राघात, अरुचि, बवासीर, व्रण, कुष्ठ, वातरक्त और भगन्दर रोग नष्ट होते हैं । यह मेहमुद्गर रस श्रीमान् गहना- नन्दनाथने कहा है ॥ १४–१८ ॥ मेघनादरस । भस्म सूतं समं कान्तमभ्रकन्तु शिलाजतु । शुद्धताप्यं शिलाव्योषत्रिफलांकोठजीरकम् ॥ १९ ॥

भाषाटीकासहित । (४१९) कार्पासबीजं रजनीचूर्णं भाव्यञ्च वह्निना । विंशतिधा विशोष्याथ लिह्याच्च मधुना सह ॥ माषमात्रं हरेन्मेहं मेघनादरसो महान् ॥ २० ॥ रससिन्दूर, कान्तलोहभस्म, अभ्रक, शिलाजीत, सोनामाखीभस्म, मैनाशल, सोंठ, पीपल, कालीमिरच, हरड़, बहेड़ा, आमला, अंकोलकी जड़, जीरा, कपासके बीज और हल्दी इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर चित्रककी जड़के रसमें बीस वार भावना देवे । इसमेंसे एक मासा परिमाण औषधि लेकर सहतमें मिलाकर चाटनेसे मेहरोग नष्ट होता है । इसको मेघनाद रस कहते हैं ॥ १९ ॥ २० ॥ चन्द्रप्रभा वटी । मृतसूताभ्रकं लोहं नागं वङ्गं समं समम् । एलाबीजं लवङ्गञ्च जातीकोषफलं तथा ॥ २१ ॥ मधूकं मधुयष्टिश्च धात्री च समशर्करा । कर्पूरं खादिरं सारं शताह्वा कण्टकारिका ॥ २२ ॥ अम्लवेतसकं तुल्यं दिनैकं लाङ्गलीद्रवैः । भावयेन्मेषदुग्धेन नागवल्लया रसैर्दिनम् ॥ २३ ॥ वटिका बदरास्थ्याभा कार्या चन्द्रप्रभा परा । भक्षयेद्वटिकामेकां सर्वमेहकुलान्तिकाम् ॥ २४ ॥ धात्रीपटोलपत्रं वा कषायं वामृतायुतम् । सक्षौद्रं भक्षयेच्चानु सर्वमेहप्रशान्तये ॥ २५ ॥ रससिन्दूर, अभ्रकभस्म, लोहाभस्म, सीसाभस्म, वंगभस्म, इला- यची, लौंग, जावित्री, जायफल, महुवेके फूल, मुलैठी, आमले, मिश्री, कपूर, खैरसार, सौंफ, कटेरी और अमलवेत इन सब औष- धियोंको समान भाग लेकर कलिहारीकी जड़के रसमें एक दिन, भेड़के

( ४२० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दूधमें एक दिन और पानोंके रसमें एक दिन भावना देकर बेरकी गुठलीकी बराबर गोली बना ले । इन गोलियोंमेंसे नित्य एक गोली सेवन करनेसे सर्व प्रकारके प्रमेह रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें आमले और पटोलपत्र तथा गिलोयके क्वाथमें सहत मिलाकर सेवन करनेसे सर्व प्रकारके प्रमेह नष्ट होते हैं ॥ २१-२५ ॥ इक्षुमेहपर वंगेश्वर रस । रसभस्मसमायुक्तं वङ्गभस्म प्रकल्पयेत् । अस्य माषद्वयं हन्ति मेहान्क्षौद्रसमन्वितम् ॥ २६ ॥ रससिन्दूर और वंगभस्म इन दोनोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर दो मासे परिमाण सहतके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारके प्रमेहरोग नष्ट होते हैं । इसको वंगेश्वर रस कहते हैं ॥ २६ ॥ बृहद्वङ्गेश्वर रस । वंगभस्म रसं गन्धं रौप्यं कर्पूरमभ्रकम् । कर्षं कर्षं मानमेषां सूतांघ्रि हेम मौक्तिकम् ॥ २७ ॥ केशराजरसैर्भाव्यं द्विगुञ्जाफलमानतः । प्रमेहान्विंशतिश्चैव साध्यासाध्यमथापि वा ॥ २८ ॥ मूत्रकृच्छ्रं तथा पाण्डुं धातुस्थञ्च ज्वरं जयेत् । हलीमकं रक्तपित्तं वातपित्तकफोद्भवम् ॥ २९ ॥ ग्रहणीमामदोषञ्च मन्दाग्नित्वमरोचकम् । एतान्सर्वान्निहन्त्याशु वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ३० ॥ बृहद्वङ्गेश्वरो नाम सोमरोगं निहन्त्यलम् । बहुमूत्रं बहुविधं मूत्रमेहं सुदारुणम् ॥ ३१ ॥ मूत्रातिसारं कृच्छ्रञ्च क्षीणानां पुष्टिवर्द्धनः । ओजस्तेजस्करो नित्यं स्त्रीषु सम्यग्वृषायते ॥ ३२ ॥

भाषाटीकासहित । ( ४२१ ) बलवर्णकरो रुच्यः शुक्रसञ्जननः परः । छागं वा यदि वा गव्यं पयो वा दधि निर्मलम्॥३३॥ अनुपानं प्रयोक्तव्यं बुद्ध्वा दोषगतिं भिषक् । दद्याच्च बाले प्रौढे च सेवनार्थं रसायनम् ॥ ३४ ॥ वंगभस्म, पारा, गन्धक, रूपाभस्म, कपूर और अभ्रकभस्म, यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेवे । सोनाभस्म और मोती प्रत्येक चार चार मासे; इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके कुकुरभांगरेके रसमें सात भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे साध्य और असाध्य बीस प्रकारके प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, पांडु, धातुगत ज्वर, हलीमक, वातपित्त, कफोत्पन्न रक्तपित्त, संग्रहणी, आमदोष, मन्दाग्नि और अरुचि प्रभृति समस्त रोग नष्ट होते हैं । तथा सोमरोग, बहुमूत्ररोग, घोरतर मूत्रमेह, मूत्रातिसार और मूत्रकृच्छ्र रोग नष्ट होते हैं । क्षीणमनुष्यको पुष्टि उत्पन्न होती है । ओज और तेजकी वृद्धि होती है । स्त्री प्रसंगमें उत्तम शक्ति उत्पन्न होती है । तथा बल, वर्ण, रुचि और शुक्र उत्पन्न होता है । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें दोषोंका बलाबल विचार कर बकरीका दूध अथवा गायके दूधको पान करे, अथवा स्वच्छ दही पीवे । यह औषधि बालक और प्रौढ मनुष्यको सेवन करानी चाहिये । इसको बृहद्वंगेश्वर रस कहते हैं ॥ २७-३४ ॥ वङ्गाभ्रमथ नागाभ्रं नागं वङ्गञ्च केवलम् । मेहरोगे प्रयोक्तव्यं शिलाजतुसमन्वितम् ॥ ३५ ॥ अन्य योग-वंग और अभ्रक, अथवा सीसा और अभ्रक, अथवा केवल सीसा या वंगको शिलाजीतके साथ सेवन करनेसे प्रमेहरोग नष्ट होता है ॥ ३५ ॥

( ४२२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कस्तूरीमोदक । कस्तूरी वनिता क्षुद्रा त्रिफला जीरकद्वयम् । एलाबीजं त्वचं यष्टिमधुकं मिषि वालकम् ॥ ३६ ॥ शतपुष्पोत्पलं धात्री मुस्तकं भद्रसंज्ञकम् ॥ कदलीनां फलं पक्वं खर्जूरं कृष्णतिल्वकम् ॥ ३७ ॥ कोकिलाख्यस्य बीजञ्च माषमात्रं समं समम् । यावन्त्येतानि चूर्णानि द्विगुणा सितशर्करा ॥ ३८ ॥ धात्रीरसेन पयसा कूष्माण्डस्वरसेन च । विषचेत्पाकविद्वैद्यो मन्दमन्देन वह्निना ॥ ३९ ॥ अवतार्य सुशीते च यथालाभं विनिःक्षिपेत् । अक्षमात्रं प्रयुञ्जीत सर्वमेहप्रशान्तये ॥ ४० ॥ वातिकं पैत्तिकञ्चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् । सोमरोगं बहुविधं मूत्रातीसारमुल्बणम् ॥ ४१ ॥ मूत्रकृच्छ्रं निहन्त्याशु मूत्राघातं तथाश्मरीम् । ग्रहणीं पाण्डुरोगञ्च कामलां कुम्भकामलाम् ॥ ४२ ॥ वृष्यो बलकरो हृद्यः शुक्रवृद्धिकरः परः । कस्तूरीमोदकश्चायं चरकेण च भाषितः ॥ ४३ ॥ कस्तूरी, फूलप्रियंगू, कटेरी, हरड़, बहेड़ा, आमला, जीरा, काला जीरा, इलायची, दालचीनी, मुलैठी, सौंफ, सुगन्धवाला, सोयाके बीज, कमल, आमले, नागरमोथा, पकी केलाकी फली, खजूर, काले तिल और तालमखाने यह प्रत्येक औषधि एक एक मासे लेवे और सब औषधियोंसे दुगुनी मिश्री लेवे तथा आमलोंका रस, दूध और भेटेका रस यह तीनों वस्तु सब औषधियोंसे चौगुनी लेवे । इन सब

भाषाटीकासहित । ( ४२३ ) औषधियोंको एकत्र पीसकर मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब पाक तैयार होजाय तब एक एक तोलेके लड्डू बना लेवे । प्रतिदिन एक मोदक खाय, इससे सब प्रकारके प्रमेह नष्ट होते हैं । इसके सेवन करनेसे वाजत, पित्तज, कफज और त्रिदोषज सब प्रकारका सोमरोग शमन होता है । इससे अनेक प्रकारका मूत्रातिसार, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, अश्मरी, संग्रहणी, पाण्डु, कामला और कुम्भकामला रोग दूर होता है । यह अत्यन्त वीर्य्यको बढ़ानेवाला, बलकारक, हृदयको हितकारी और वीर्य्यको बढ़ानेवाला है । यह कस्तूरीमोदक चरक ऋषि ने कहा है ॥ ३६-४३ ॥ मेहवज्र । भस्मसूतं मृतं कान्तलौहभस्म शिलाजतु । शुद्धताप्यं शिलाव्योषं त्रिफलाबिल्वजीरकम् ॥४४॥ कपित्थं रजनीचूर्णं भृङ्गराजेन भावयेत् । त्रिंशद्वारं विशोष्याथ लिह्याच्च मधुना सह ॥ ४५ ॥ निष्कमात्रं हरेन्मेहान्मूत्रकृच्छ्रं सुदारुणम् । महानिम्बस्य बीजञ्च षण्निष्कं पेषितञ्च यत् ॥४६॥ पलं तण्डुलतोयेन घृतनिष्कद्वयेन च । एकीकृत्य पिबेच्चानु हन्ति मेहं चिरोत्थितम् ॥४७॥ रससिन्दूर, कान्तलोहभस्म, शिलाजीत, सोनामाखीभस्म, मनशिल, सोंठ, पीपल, काली मिरच हरड़, बहेडा, आमला, बेलकी छाल, जीरा, कैथ और हल्दी इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर भांगरेके रसमें तीस भावना देकर चार चार मासेकी गोली बना लेवे । सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे प्रमेह और मूत्रकृच्छ्र रोग नष्ट होते हैं। इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें दो तोले बकायनके बीजोंको चार तोले चावलोंके जलमें पीसकर एक तोला घृत मिलाकर सेवन करे, इससे बहुत दिनोंका प्रमेह रोग दूर होता है ॥ ४४-४७ ॥