रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४१४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लोहप्रयोग । अयोरजः श्लक्ष्णपिष्टं मधुना सह योजितम् । अश्मरीं विनिहन्त्याशु मूत्रकृच्छ्रञ्च दारुणम् ॥ ७ ॥ लोहभस्मको बारीक पीसकर सहतके साथ सेवन करनेसे अश्मरी और मूत्रकृच्छ्र रोग दूर होते हैं ॥ ७ ॥ अन्य योग । इन्द्रवारुणिकामूलं मरिचं क्षीरपाचितम् । पर्पटीरससंयुक्तं सप्ताहादश्मरीं जयेत् ॥ ८ ॥ इन्द्रायणकी जड़ और काली मिरचोंको दूधमें पकावे । फिर दोनोंको अच्छे प्रकारसे मर्दन करके पित्तपापड़ेके रसके साथ एक सप्ताह पर्यंत सेवन करनेसे अश्मरी रोग नष्ट होता है ॥ ८ ॥ गंधकादियोग । गन्धकं जीरकं क्षुद्राफलं क्षारद्वयं सदा । अश्मरीं शर्करां मूत्रकृच्छ्रं क्षपयति ध्रुवम् ॥ ९ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे अश्मर्य्यधिकारः । गंधक, जीरा, कटेरीके फल, सज्जीक्षार और जवाखार इन सबको एकत्र पीसकर भक्षण करनेसे शर्करा और मूत्रकृच्छ्ररोग दूर होते हैं ॥९॥ इति अश्मरीरोगचिकित्सा । अथ प्रमेहाधिकार । हरिशंकररस । मृतसूताभ्रकं तुल्यं धात्रीफलनिशाद्रवैः । सप्ताहं भावयेत्खल्ले योगोऽयं हरिशंकरः ॥ माषमात्रां वटीं खादेत्सर्वमेहप्रशान्तये ॥ १ ॥ रससिन्दूर और अभ्रकभस्म दोनोंको समान भाग लेकर आमला और हल्दीके रसमें सात वार भावना देकर एक एक मासेकी गोली बना