रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ४१३ ) गोरक्षकर्कटीमूलक्वाथं कौलत्थकं तथा । अनुपानं प्रयोक्तव्यं बुद्ध्वा दोषबलाबलम् ॥ ३ ॥ पारा १ भाग और गंधक २ भाग दोनोंको एकत्र पीसकर कज्जली बना लेवे । फिर सफेद विषखपरेके रसमें एक दिनतक खरल करके मूषामें रखकर संधिस्थानों ( जोड़ों ) को अच्छे प्रकारसे बंद करके भूधरयंत्रमें एक दिनतक पकावे । फिर इसको चूर्ण करके गुड़के साथ सेवन करनेसे अश्मरी ( पथरी ) और बस्तिशूल नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें गोरखककडी ( एरण्डककडी ) का क्वाथ; अथवा कुलथीका क्वाथ पान करे । अथवा दोषोंका बलाबल विचार कर अनुपानकी कल्पना करे । इसको पाषाणवज्र रस कहते हैं ॥ १-३ ॥ त्रिविक्रमरस । मृतताम्रमजाक्षीरैः पाच्यं तुल्यं गते द्रवे । तत्ताम्रं शुद्धसूतञ्च गन्धकञ्च समं समम् ॥ ४ ॥ निर्गुण्डीस्वरसैर्मर्द्द्यैदिनं तद्गोलकीकृतम् । यामैकं वालुकायन्त्रे पक्त्वा योज्यं द्विगुञ्जकम् ॥५॥ बीजपूरस्य मूलञ्च सजलञ्चानुपाययेत् । रसस्त्रिविक्रमो नाम शर्करामश्मरीं जयेत् ॥ ६ ॥ तांबेकी भस्मको बराबरके बकरीके दूधमें पकावे । जब वह पककर गाढा हो जाय तब तांबेकी बराबर पारा और समान गंधक मिलाकर सम्हालूके रसमें एक दिनतक खरल करके गोला बना लेवे । फिर उस गोलेको एक मूषा ( घडिया ) में रखकर ऊपरसे कपरोटी करके एक प्रहरतक वालुका यंत्रमें पकावे । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर बिजौरे नींबूकी जडके चूर्ण और जलके साथ सेवन करे, इससे शर्करा और अश्मरी रोग नष्ट होते हैं । इसको त्रिविक्रम रस कहते हैं ॥ ४-६ ॥