रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४०६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ हृद्रोगाधिकार । हृदयार्णव रस । शुद्धसूतं समं गन्धं मृतताम्रं तयोः समम् । मर्दयेत्त्रिफलाक्वाथैः काकमाचीद्रवैर्दिनम् ॥ १ ॥ चणमात्रां वटीं खादेद्रसोऽयं हृदयार्णवः । काकमाचीफलं कर्षं त्रिफलाफलसंयुतम् ॥ २ ॥ द्वात्रिंशत्तोलकं तोयं क्वाथमष्टावशेषितम् । अनुपानं पिबेच्चात्र हृद्रोगे च कफोत्थिते ॥ ३ ॥ पारा १ भाग, गंधक १ भाग, तांबाभस्म २ भाग इन सब औषधि- योंको एकत्र करके त्रिफलेके क्वाथमें और मकोयके रसमें एक दिन- तक खरल करे। पश्चात् चनेकी बराबर गोली बना लेवे। इस औष- धिके सेवन करनेके पश्चात् एक तोला मकोय और १ तोले त्रिफ- लेको बत्तीस तोले जलमें पकावे; जब पकते पकते जल आठवां भाग बाकी रह जाय तब उतारकर छानके पान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे कफजन्य हृदयरोग दूर होता है । इसको हृदयार्णव रस कहते हैं ॥ १-३ ॥ नागार्जुनाभ्रक । सहस्रपुटनैः शुद्धं वज्राभ्रमर्जुनत्वचः । सत्त्वैर्विमर्दितः सप्तदिनं खल्ले विशोषितम् ॥ ४ ॥ छायाशुष्का वटी कार्या नाम्नेदमर्जुनाह्वयम् । हद्रोगं सर्वशूलार्शोहल्लासच्छर्द्यरोचकान् ॥ ५ ॥ अतीसारमग्निमान्द्यं रक्तपित्तं क्षतक्षयम् । शोथोदराम्लपित्तञ्च विषमज्वरमेव च ॥ हन्त्यन्यान्यपि रोगाणि बल्यं वृष्यं रसायनम् ॥६॥