रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३९५ ) शंखादि चूर्ण । शंखचूर्णस्य च पलं पञ्चैव लवणानि च । क्षारं टंकणकं जाती शतपुष्पा यमानिका ॥ ६५ ॥ हिंगु त्रिकटुकञ्चैव सर्वमेकत्र चूर्णयेत् । आमवातं यकृच्छूलं परिणामसमुद्भवम् ॥ अन्नद्रवकृतं शूलं शूलञ्चैव त्रिदोषजम् ॥ ६६ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे शूलरोगाधिकारः । शंखका चूर्ण १पल, पांचों लवण ५ भाग, सुहागा १ पल, आम- लोंका चूर्ण १ पल, सौंफका चूर्ण १ पल, अजवायनका चूर्ण १ पल, हींग १ पल और त्रिकुटेका चूर्ण ३ पल लेवे। इन सबको एकत्र पीस- कर सेवन करनेसे आमवात, यकृत्, परिणाम शूल, अन्नद्रवशूल और त्रिदोषजशूल रोग नष्ट होते हैं। इसे शंखादि चूर्ण कहते हैं॥६५॥६६॥ इति शूलाधिकार समाप्त । अथ उदावर्त्तानाहरोगधिकार । वैद्यनाथवटी । पथ्या त्रिकटु सूतञ्च द्विगुणं कनकं तथा । थानकुनीर सैरम्ललोलिकाया रसैः कृता ॥ १ ॥ गुटिकोदरगुल्मादिपाण्ड्वामयविनाशिनी । क्रिमिकुष्ठगात्रकण्डूपिडिकाश्च निहन्ति च ॥ वटी सिद्धफला चेयं वैद्यनाथेन भाषिता ॥ २ ॥ अब उदावर्त और आनाह रोगकी चिकित्सा कहते हैं । हरड़, त्रिकुटा, रससिन्दूर यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और जमालगोटे २ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र गोरखमुण्डीके