रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३९४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । हींग इनको समान भाग लेकर सहत और घृतमें मिलाकर इस औष- धिके ऊपरसे भक्षण करे । इससे एक प्रहरमें परिणामशूल नष्ट होता है । इसको त्रिगुणाख्य रस कहते हैं ॥ ५९ ॥ ६० ॥ शूलहरणयोग । हरीतकी त्रिकटुकं कुचिला हिंगुसैन्धवम् । गन्धकञ्च समं सर्वं वटीं कुर्यात्सुखावहाम् ॥ ६१ ॥ लघुकोलप्रमाणान्तु शस्यते प्रातरेव हि । एकैका वटिका ग्राह्या गुल्मशूलविनाशिनी ॥ ६२ ॥ ग्रहण्यामतिसारे च सजीर्णे मन्दपावके । योजयेदुष्णपयसा सुखमाप्नोति निश्चितम् ॥ सुवर्णञ्च भवेद्देहं सदोत्साहयुतं नृणाम् ॥ ६३ ॥ हरड़, त्रिकुटा, कुचला, हींग, सेंधानमक और गंधक यह सब औषधि समान भाग लेकर जलमें पीसकर गोली बना लेवे । यह गोली छोटे बेरकी बराबर बनानी चाहिये । गुल्म और शूलरोग नष्ट करनेवाली यह गोली प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली खाये । ग्रहणी, अतिसार, अजीर्ण और मंदाग्नि प्रभृति रोगोंमें इसको गरम जलके साथ सेवन करे तो अवश्य आरोग्यता प्राप्त होती है । इसके सेवन करनेसे शरीरमें सुवर्णकी समान कांति उत्पन्न होती है । बल और उत्साहकी वृद्धि होती है । इसको शूलहरण योग कहते हैं ॥ ६१-६३ ॥ शर्करालोह । त्रिफलायास्तथा धात्र्याश्चूर्णं वा काललौहजम् । शर्कराचूर्णसंयुक्तं सर्वशूलेषु योजयेत् ॥ ६४ ॥ त्रिफलेका चूर्ण ३ भाग, आमलेका चूर्ण १ भाग, मिश्री १ भाग और लोहेका चूर्ण ५ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर सर्व- प्रकारके शूलरोगोंमें प्रयोग करे । इसको शर्करालोह कहते हैं ॥ ६४ ॥