रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (३९३) वचामरिचजं चूर्णं कर्षमुष्णजलैः पिबेत् । असाध्यं नाशयेच्छूलं श्रीशूलगजकेसरी ॥ ५८ ॥ शुद्ध पारा १ भाग और गंधक २ भाग दोनोंकी एकत्र कज्जली बना लेवे । पश्चात् तीन भाग तांबा लेकर उसका सम्पुट बनवाकर उसमें इस कज्जलीको भरकर पश्चात् एक हाँडीमें ४ तोले पिसा हुआ नमक बिछाकर उसमें इस मूसाको स्थापित करे और ऊपरसे एक पल परिमाण पिसा हुआ नमक बिछा देवे । पश्चात् गजपुटमें पकावे । जब स्वयं शीतल हो जाय तब मूसाको पीसकर बारीक चूर्ण कर लेवे । इसमेंसे नित्य दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर पानके रसमें मिलाकर खाये । इस औषधिके भक्षण करनेके पश्चात् हींग, सोंठ, जीरा, वच और काली मिरच यह सब समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करके एक कर्ष परिमाण गरम जलके साथ सेवन करे । इससे सर्व प्रका- रका असाध्य शूलरोग नष्ट होता है । इसको श्रीशूलगजकेसरी रस कहते हैं ॥ ५५-५८ ॥ त्रिगुणाख्य रस । टङ्कणं हारिणं शृङ्गं स्वर्णं गन्धं मृतं रसम् । दिनैकमार्द्रकद्रावैर्मर्द्यं रुद्ध्वा पुटे पचेत् ॥ ५९ ॥ त्रिगुणाख्यो रसो ह्यस्य माषैकं मधुसर्पिषा । सैन्धवं जीरकं हिंगु मध्वाज्याभ्यां लिहेदनु ॥ पक्तिशूलहरः ख्यातो याममात्रान्न संशयः ॥६०॥ शुद्ध सुहागा, हिरनके सींगकी भस्म, सोनाभस्म, गंधक और रससिन्दूर यह सब औषधि समान भाग लेकर अदरखके रसमें एक दिन तक खरल करके पश्चात् मूसामें रखकर और अच्छे प्रकार कप- र्रौटीसे बंद करके पुटपाक करे । इसमेंसे एक मासे परिमाण औषधि लेकर सहत और घृतमें मिलाकर भक्षण करे । सेंधानमक, जीरा और