भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( ४३७ ) पीपलामूल, चित्रककी जड़, अभ्रकभस्म, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, चित्रककी जड़, नागरमोथा, वायविडंग, कपूर और सेंधानमक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और सबकी बराबर लोहेका चूर्ण लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर भक्षण करनेसे उदररोग नष्ट होता है । इसको पिप्पलीमूलाद्य लोह कहते हैं ॥ २७ ॥ उदरारि रस । पारदं शुक्तितुत्थञ्च जैपालं पिप्पलीसमम् । आरग्वधफलान्मज्जा वज्रीक्षीरेण मर्दयेत् ॥ २८ ॥ माषमात्रां वटीं खादेत्स्त्रीणां जलोदरं जयेत् । चिञ्चाफलरसञ्चानु पथ्यं दध्योदनं हितम् ॥ दकोदरहरश्चैव तीव्रेण रेचनेन च ॥ २९ ॥ रससिन्दूर, सीपकी भस्म, तूतिया, जमालगोटे, पीपल और अमलतासका गूदा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके एक एक मासेकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे स्त्रियोंका जलोदररोग नष्ट होता है । इसके सेवन करनेके अंतमें इमलीका रस और दहीके साथ भात खाय । इस औषधिसे अच्छे प्रकारसे विरेचन होकर घोरतर जलोदर रोग नष्ट होता है । इसको उदरारि रस कहते हैं ॥ २८ ॥ २९ ॥ वङ्गेश्वर रस । सूतभस्म वङ्गभस्म भागैकं संप्रकल्पयेत् । गन्धकं मृतताम्रञ्च प्रत्येकञ्च चतुःपलम् ॥ ३० ॥ अर्कक्षीरैर्दिनं मर्द्य सर्वं तद्गोलकीकृतम् । रुद्धा। तद्भूधरे पक्त्वा पुटकेन समुद्धरेत् ॥ ३१ ॥ एष वङ्गेश्वरो नाम पीतो गुल्मोदरं जयेत् ।