रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । घृतैर्गुञ्जाद्वयं लेह्यं निष्कां श्वेतपुनर्नवाम् ॥ गवां मूत्रैः पिबेच्चानु रजनीं वा गवां जलैः ॥ ३२ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे उदररोगाधिकारः । रससिन्दूर और वंगकी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक पल, गन्धक और तांबाभस्म यह प्रत्येक चार चार पल इन सब औष- धियोंको एकत्र आकके दूधमें खरल करके गोला बना लेवे । इस गोलेको मूषामें रखकर भूधर यंत्रमें पकावे; जब शीतल हो जाय तब इसको पीसकर चूर्ण करलेवे । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर घीमें मिलाकर चाटे और ऊपरसे चार मासे सफेद पुनर्नवा अथवा चार मासे हलदीके चूर्णको गोमूत्रके साथ पान करे । इससे गुल्म और उदररोग नष्ट होता है । इसको वंगेश्वर रस कहते हैं ॥ ३०-३२ ॥ इति उदररोगाधिकार सम्पूर्ण । अथ प्लीहरोगचिकित्सा । रोहितकसमायुक्तं त्रिकत्रययुतं त्वयः । प्लीहानमग्रमांसञ्च यकृतञ्च विनाशयेत् ॥ १ ॥ रोहेड़ा, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, चित्रककी जड़, नागरमोथा और वायविडंग यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोहा दश भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानुसार सेवन करे तो प्लीहा, अग्रमांस और यकृत् रोग नष्ट होते हैं ॥ १ ॥ लोकनाथ रस । पारदं गन्धकञ्चैव समभागं विमर्दयेत् । मृताभ्रं रसतुल्यञ्च यत्नतः परिमर्दयेत् ॥ २ ॥