भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 471, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 471

भाषाटीकासहित । (४५५) रोगानीकविनाशाय धन्वन्तरिकृतं पुरा । मृत्युञ्जयमिदं लोहं सिद्धिदं शुभदं नृणाम् ॥ ३६ ॥ यथादोषानुसार इसके अनुपानकी कल्पना करे । सम्पूर्ण रोग- नाशक इस औषधिको प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करे तो प्लीहा, ज्वर, खाँसी, विषमज्वर, बहुत पुराना और वंशज श्लीपद रोग नष्ट होता है । समस्त रोगोंको दूर करनेके लिये पूर्वकालमें मनुष्योंको सिद्धि देने- वाली और मंगल कामनाओंको देनेवाली यह औषधि धन्वन्तरि भगवान्ने कही है ॥ ३४-३६ ॥ प्लीहार्णव रस । हिंगुलं गन्धकं टङ्कमभ्रकं विषमेव च । प्रत्येकं फलिकं भागं चूर्णयेदतिचिक्कणम् ॥ ३७ ॥ पिप्पली मरिचञ्चैव प्रत्येकञ्च पलार्द्धकम् । मर्दयित्वा वटीं कुर्याद्वल्लमात्रां प्रयत्नतः ॥ ३८ ॥ सेव्या शेफालिदलजैर्वटी माक्षिकसंयुता । प्लीहानं षट्प्रकारञ्च हन्ति शीघ्रं न संशयः ॥ ३९ ॥ ज्वरं मन्दानलञ्चैव कासं श्वासं वमिं भ्रमिम् । प्लीहार्णव इति ख्यातो गहनानन्दभाषितः ॥ ४० ॥ सिंग्रफ, गन्धक, सुहागा, अभ्रकभस्म और विष इन प्रत्येकका बारीक चूर्ण एक २ पल, पीपल और काली मिरचोंका चूर्ण प्रत्येक दो दो तोले, इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । हरसिंगारके पत्तोंके रस और सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे छः प्रकारकी प्लीहा, ज्वर, मंदाग्नि, खाँसी, श्वास, वमन और भ्रमरोग नष्ट होते हैं । इस प्लीहार्णव रसको श्रीमान् गहनानन्दनाथने कहा है ॥ ३७-४० ॥