रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४४४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मृत्युञ्जय रस । शुद्धसूतं समं गन्ध जारिताभ्रं समं समम् । गन्धकाद्विगुणं लौहं मृतताम्रञ्चतुर्गुणम् ॥ २९ ॥ द्विक्षारं टङ्गणविडं वराटमथ शंखकम् । चित्रकं कुनटीतालकटुकीरामठन्तथा ॥ ३० ॥ रोहितकं त्रिवृच्चिञ्चा विशालाधवमङ्कोठम् । अपामार्ग तालमूलं मल्लिका च निशायुगम् ॥ ३१ ॥ कानकं तुत्थकञ्चैव यकृन्मर्द रसाञ्जनम् । एतानि समभागानि चूर्णयित्वा विभावयेत् ॥ ३२ ॥ आर्द्रकस्वरसेनेव गुडूच्याः स्वरसेन च । मधुनः कुडवैर्भाव्यं वटिका माषमात्रतः ॥ ३३ ॥ शुद्ध पारा, गन्धक और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, लोहाभस्म २ भाग, तांबाभस्म ४ भाग, जवारखार, सज्जी, सुहागा, विडनमक, कौड़ीकी भस्म, शंखकी भस्म, चित्रककी जड़ मैनशिल, हरिताल, कुटकी, हींग, रोहिड़ा, निसोथकी जड़, इमलीका खार, इन्द्रायनकी जड़, धावेके फूल, अंकोल, चिरचिटेका खार, ताड़की जड़की राख, हल्दी, दारुहल्दी, धतूरेके बीज, तूतिया, जमालगोटे और रसौंत यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेने, सबको एकत्र पीस- कर अदरख और गिलोयके रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर सुखा लेवे । फिर एक कुडव परिमाण सहतमें भावना देकर एक एक मासेकी गोली बना लेवे ॥ २९-३३ ॥ अनुपानं प्रदातव्यं बुद्ध्या दोषानुसारतः । भक्षयेत्प्रातरुत्थाय सर्वरोगकुलान्तकम् ॥ ३४ ॥ प्लीहानं ज्वरमुग्रञ्च कासञ्च विषमज्वरम् । चिरजं कुलजञ्चैव श्लीपदं हन्ति दारुणम् ॥ ३५ ॥