रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ४५३ ) लोहा, तांबा, कौड़ी इनकी भस्म, तूतिया, हींग, हरड़, बहेडे, आमले, थूहरकी जड़, जवाखार, जमालगोटे, सुहागा और निसोध यह प्रत्येक औषधि एक एक पल लेवे. इन सब औषधियोंको एकत्र बकरीके दूधमें पीसकर चार चार रत्तीकी गोली बनाकर सहत अथवा जलके साथ सेवन करे । दोषोंका बलाबल और रोगका बलाबल विचारकर; अथवा और किसी युक्तिसे चार रत्ती या अधिक बढाकर देवे । इस औष- धिके सेवन करनेसे कामला, पांडु, आनाह, श्लीपद, अर्बुद, गलगण्ड, गण्डमाला, व्रण, हलीमक, अपची, वातरक्त, कण्डू, विस्फोटक और कुष्ठरोग नष्ट होते हैं । कामला रोगको दूर करनेवाली इससे उत्तम अन्य औषधि नहीं है ॥ २१-२५ ॥ यकृदरि लोह । द्विकर्षं लौहचूर्णस्य चाभ्रकस्य वलार्द्धकम् । कर्षं शुद्धं मृतं ताम्रं लिम्पाकांघ्रित्वचं पलम् ॥२६॥ मृगाजिनभस्मपलं सर्वमेकत्र कारयेत् । नवगुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ २७ ॥ यकृत्प्लीहोदरञ्चैव कामलाञ्च हलीमकम् । कासं श्वासं ज्वरं हन्याद्वलवर्णाग्निकारकम् ॥ यकृदरि त्विदं लौहं वातगुल्मविनाशकम् ॥ २८ ॥ लोहभस्मका चूर्ण २ कर्ष, अभ्रकभस्म २ तोले, शुद्ध तांबाभस्म १ कर्ष, कागजी नींबूकी छाल १ पल और हिरनके चर्मकी भस्म १पल लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर जलमें खरल करके नौ नौ रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे यकृत्, प्लीहो- दर, कामला, हलीमक, खाँसी, श्वास और ज्वर नष्ट होते हैं । यह बल, वर्ण और अग्निको दीपन करता है तथा वातगुल्मनाशक है । इसको यकृदरि लोह कहते हैं ॥ २३-२८ ॥