भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ४४२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । घृतेन मधुना खाद्यं लौहमग्निकुमारकम् । यकृत्प्लीहोदरहरं गुल्मञ्चापि हलीकम् ॥ १९ ॥ बलवर्णाग्निजननं कान्तिपुष्टिविवर्द्धनम् । श्रीमद्गहननाथेन निर्मितं विश्वसम्पदे ॥ २० ॥ तूतिया, हींग, सुहागा, सेंधानमक, धनिया, जीरा, अजवायन, काली मिरच, सोंठ, लौंग, इलायची और वायविडंग यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण और लोहेका चूर्ण सब औषधिकी बराबर लेवे । पारा १ पल और गंधक १ पल लेवे । इन सब औषधि- योंको एकत्र पीसकर घी और शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे यकृत, प्लीहा, उदररोग, गुल्म और हलीमक रोग दूर होते हैं । तथा बल, वर्ण, अग्नि, कान्ति और पुष्टिकी वृद्धि होती है । संसारकी रक्षा करनेके लिये इस अग्निकुमार लोहेको श्रीमान् गहनानन्दनाथने कहा है ॥ १७–२० ॥ प्राणवल्लभ रस । लौहं ताम्रं वराटञ्च तुत्थं हिंगु फलत्रिकम् । स्नुहीमूलं यवक्षारं जैपालं टंकणं त्रिकम् ॥ २१ ॥ प्रत्येकञ्च पलं ग्राह्यं छागीदुग्धेन पेषितम् । चतुर्गुञ्जां वटीं खाद्दारिणा मधुनापि वा ॥ २२ ॥ प्राणवल्लभनामायं गहनानन्द-भाषितः । दोषं रोगञ्च संवीक्ष्य युक्त्या वा त्रुटिवर्द्धनम् ॥२३॥ निहन्ति कामलां पाण्डुमानाहं श्लीपदार्बुदम् । गलगण्डं गण्डमालां व्रणानि च हलीमकम् ॥२४॥ अपचीं वातरक्तञ्च कण्डूं विस्फोटकुष्ठकम् । नातः परतरः श्रेष्ठः कामलार्त्तिभयेष्वपि ॥ २५ ॥