रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ४४१ ) इसमेंसे चार रत्ती परिमाण औषधि लेकर चार रत्ती पीपलके चूर्ण और चार रत्ती सहत, अथवा चार रत्ती हरड़का चूर्ण और चार रत्ती गुड़,अथवा चार रत्ती जीरेका चूर्ण और चार रत्ती गुड़के साथ भक्षण करे और ऊपरसे गोमूत्रको पान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे यकृत, प्लीहा, प्रवृद्ध उदररोग, शोथ, वाताष्ठीला, कमठी, प्रत्यष्ठीला, कांस्यक्रोड, अग्रमांस, शूल, भगन्दर, मंदाग्नि और कासरोग नष्ट होते हैं । इसको बृहल्लोकनाथ रस कहते हैं ॥ ११-१३ ॥ ताम्रेश्वरवटी । हिंगु त्रिकटुकञ्चैव अपामार्गस्य पत्रकम् । अर्कपत्रन्तथा स्नुहीपत्रञ्च समभागकम् ॥ १४ ॥ सैन्धवं तत्समं ग्राह्यं लौहं ताम्रञ्च तत्समम् । प्लीहानं यकृतं गुल्ममामवातं सुदारुणम् ॥ १५ ॥ अर्शांसि घोरमुदरं मूर्च्छा पाण्डुं हलीमकम् । ग्रहणीमतिसारञ्च यक्ष्माणं शोथमेव च ॥१६॥ हींग, सांठ, पीपल, काली मिरच, चिरचिटेके पत्तोंका खार, मदार और थूहरके पीले पत्ते समान भाग और इन सबके बराबर सेंधानमक, लोहा और तांबाभस्म लेकर खरल करके यथोचित मात्रानुसार भक्षण करनेसे प्लीहा, यकृत, गुल्म, आमवात, अर्श, उदररोग, मूर्च्छा, पांडु, हलीमक, संग्रहणी, अतिसार, राजयक्ष्मा और शोथरोग नष्ट होते हैं । इसको ताम्रेश्वरवटी कहते हैं ॥ १४-१६ ॥ अग्निकुमार लोह । तुत्थरामठटङ्कानि सैन्धवं धान्यजीरकम् । यमानी मरिचं शुण्ठी लवङ्गैला विडङ्गकम् ॥ १७ ॥ प्रत्येकं तोलकं चूर्णं लौहचूर्णन्तु तत्समम् । रसस्य गन्धकस्यापि पलैकं कज्जलीकृतम् ॥ १८ ॥