भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ४४० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । तन्मध्ये गोलकं क्षिप्त्वा यत्नेनच्छादयेद्भिषक् । शरावसम्पुटं कृत्वा मृद्भस्मलवणाम्बुभिः ॥ ९ ॥ शरावसन्धिमालिप्य चातपे शोषयेत्क्षणम् । ततो गजपुटं दत्त्वा स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ॥ पिष्ट्वा तु सर्वमेकत्र स्थापयेद्भाजने शुभे ॥ १० ॥ शुद्ध पारा १ भाग और गन्धक २ भाग, दोनोंकी एकत्र कज्जली बना लेवे। फिर इस कज्जलीमें अभ्रककी भस्म १ भाग मिलाकर घीकारके रसमें खरल करके पश्चात् उसमें तांबेकी भस्म २ भाग और लोहेकी भस्म २ भाग मिलावे। फिर मकोयके रसमें खरल करके सुखा लेवे। तदनन्तर उसमें गन्धक २ भाग और कौड़ीकी भस्म २ भाग मिलाकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके गोलासा बना लेवे। फिर इस गोलेके दो भाग करके एक भग एक सिकोरेमें रखे और दूसरा भाग दूसरे सिकोरेमें रखे। पश्चात् दोनों सिकोरोंके ऊपर दो सिकोरे ढककर दोनोंके संधिस्थानों ( जोड़ों ) को अच्छे प्रकारसे मृत्तिका, राख और लवण तथा जल इनसे बंद कर देवे, फिर थोड़ी देरतक धूपमें रख देवे जब सूख जाये तब गजपुटमें पकावे। शीतल होनेपर चूर्ण करके उत्तम पात्रमें भरकर रख देवे ॥ ६-१० ॥ खादेद्वल्लद्वयञ्चास्य मूत्रञ्चानु पिबेन्नरः । मधुना पिप्पलीचूर्ण सगुडां वा हरीतकीम् ॥ ११ ॥ अजाजीं वा गुडेनैव भक्षयेत्तुल्ययोगतः । यकृत्प्लीहोदरोयञ्च श्वयथुञ्च विनाशयेत् ॥ १२ ॥ वाताष्ठीलाञ्च कमठीं प्रत्यष्ठीलां तथैव च । कांस्यक्रोडायमांसञ्च शूलञ्चैव भगन्दरम् ॥ वह्निमान्द्यञ्च कासञ्च लोकनाथरसोत्तमः ॥ १३ ॥