भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 473

भाषाटीकासहित । (४४७) प्लीहारि रस । द्विकर्षं लौहभस्मापि कर्षं ताम्रं प्रदापयेत् । शुद्धसूतं तथा गन्धं कर्षमानं भिषग्वरः ॥ ४७ ॥ मृगाजिनं पलं भस्म लिम्पाकांघ्रित्वचः पलम् । एवं भागक्रमेणैव कुर्यात्प्लीहारिकां वटीम् ॥ ४८ ॥ नवगुञ्जामितां खादेच्चाथ नित्यं हि पूतवान् । प्लीहानं यकृतं गुल्मं हन्त्यवश्यं न संशयः ॥ ४९ ॥ लोहकी भस्म २ कर्ष, तांबा, शुद्ध पारा और गन्धक प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेवे, हिरनके चमड़ेकी भस्म और कागजी नींबूकी जड़की छाल प्रत्येक चार चार तोले लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर नौ नौ रत्तीकी गोली बना लेवे । प्रतिदिन इन गोलियोंमेंसे एक एक गोली सेवन करनेसे प्लीहा, यकृत् और गुल्मरोग नष्ट होते हैं ॥ ४७-४९ ॥ अपर प्लीहारि रस । कर्षैकं तालचूर्णस्य तत्पादांशं सुवर्णकम् । पलार्द्धं मृतताम्रञ्च तत्समं शुद्धमभ्रकम् ॥ ५० ॥ मृगाजिनस्य भस्मापि कर्षमत्र प्रदापयेत् । लिम्पाकांघ्रित्वचस्तद्वत्सर्वमेकत्र कारयेत् ॥ ५१ ॥ रसगुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कारयेत्ततः । मधुना वह्निचूर्णेन खादेन्नित्यं यथाबलम् ॥ ५२ ॥ असाध्यमपि प्लीहानं हन्त्यवश्यं न संशयः । यकृतं पाण्डुरोगं च गुल्मादिकभगन्दरान् ॥ ५३ ॥ हरिताल १ तोला, सोना ३ मासे, तांबा और अभ्रक प्रत्येक दो दो तोले, हिरनके चमड़ेकी भस्म और कागजी नींबूकी जड़की छाल प्रत्येक एक एक कर्ष परिमाण लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र