भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ४४६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पीसकर छः छः रत्तीकी गोली बना लेवे । चित्रककी जड़के चूर्ण और सहतके साथ प्रतिदिन इस औषधिके सेवन करनेसे असाध्य प्लीहारोग, यकृत्, पाण्डु, गुल्म और भगन्दररोग नष्ट होते हैं ॥ ५०-५३ ॥ लोहमृत्युञ्जय रस । रसगन्धकलौहाभ्रं कुनटी मृतताम्रकम् । विषमुष्टिवराटञ्च तुत्थं शङ्खरसाञ्जनम् ॥ ५४ ॥ जातीफलञ्च कटुकी द्विक्षारं कानकन्तथा । व्योषं हिङ्गु सैन्धवञ्च प्रत्येकं सूततुल्यकम् ॥ ५५ ॥ श्लक्ष्णचूर्णीकृतं सर्वमेकत्र भावयेत्ततः । सूर्यावर्त्तरसेनैव बिल्वपत्ररसेन च ॥ ५६ ॥ सूर्यावर्तेन मतिमान्वटिकां कारयेत्ततः । प्लीहानं यकृतं गुल्ममष्ठीलाञ्च विनाशयेत् ॥ ५७ ॥ अग्रमांसं तथा शोथं तथा सर्वोदराणि च । वातरक्तञ्च कमठं चान्तर्विद्रधिमेव च ॥ ५८ ॥ पारा, गंधक, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, मैनशिल, तांवाभस्म, कुचला, कौड़ीकी भस्म, तूतिया, शंखकी भस्म, रसौत, जायफल, कुटकी, जवाखार, सज्जी, जमालगोटे, सोंठ, मिरच, पीपल, हींग और सेंधानमक यह सब औषधि समान भाग लेकर सबका एकत्र बारीक चूर्ण करके हुलहुलके रसमें सात भावना देवे; फिर बेलके पत्तोंके रसमें सात भावना देवे । फिर हुलहुलके पत्तोंके रसमें खरल करके गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे प्लीहा, यकृत्, गुल्म, अष्ठीला, अग्रमांस, शोथ, सर्व प्रकारके उदररोग, वातरक्त, कमठी और अन्त- र्विद्रधि रोग नष्ट होते हैं । इसको लोहमृत्युञ्जय रस कहते हैं५४-५८॥ महामृत्युञ्जय रस । रसगन्धकलोहाभ्रं कुनटीतुत्थताम्रकम् । सैन्धवञ्च वराटञ्च वागुजीविडशङ्ककम् ॥ ५९ ॥