भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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भाषाटीकासहित । ( ४५१ ) रक्तिद्वयक्रमेणैव योज्यं माषद्वयावधि । ह्रासयेच्च क्रमेणैव तथा चैव विवर्द्धयेत् ॥ ७३ ॥ काला नमक, पारा और गंधक यह प्रत्येक औषधि दो दो कर्ष और तांबेकी भस्म ६ कर्ष इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके हुलहुलके रस, पीपलके क्वाथ और मोचरसके क्वाथमें मर्दन करे । फिर इसको सूर्यकी तीक्ष्ण धूपमें सुखाकर फिर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करे । जबतक यह औषधि अच्छे प्रकारसे जीर्ण न होजाय तबतक मर्दन करे । पश्चात् सूख जाय तब उत्तम शुभ्र खरलमें पीसकर बारीक चूर्ण कर लेवे । प्रथम दिन दो रत्ती, दूसरे दिन चार रत्ती, इस प्रकार प्रतिदिन दो दो रत्ती बढ़ाकर सेवन करे । जब बढ़ते बढ़ते दो मासे पर्यंत होजाय तब घटाने लगे ॥ ७०-७३ ॥ जीर्णे भुञ्जीत शाल्यन्नं क्षीरं घृतसमन्वितम् । हन्त्यम्लपित्तं विविधं ग्रहणीं विषमज्वरम् ॥ ७४ ॥ चिरज्वरं प्लीहगदं यकृद्रोगं सुदुस्तरम् । अग्रमांसं तथा शोथं कांस्यक्रोडं सुदुर्जयम् ॥ ७५ ॥ कमठं च तथा शोथमुदरं च सुदारुणम् । धातुवृद्धिकरं वृष्यं बलवर्णकरं शुभम् ॥ ७६ ॥ सद्यो वह्निकरं चैव सर्वरोगहरं परम् । मुखशुद्धिर्विधातव्या पर्णैश्चूर्णसमन्वितैः ॥ ताम्रकल्पमिदं नाम्ना सर्वरोगप्रशान्तये ॥ ७७ ॥ इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें औषधिके जीर्ण होनेपर शालि चावलोंका भात, दूध और घृत भक्षण करे । इस औषधिके सेवन करनेसे विविध प्रकारका अम्लपित्त, संग्रहणी, विषमज्वर, चिरज्वर, प्लीहा, यकृत्, अग्रमांस, शोथ, कांस्यक्रोड, कमठ, शोथ और