रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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भाषाटीकासहित । ( ४५३ ) वाताधिके जलं कोष्णं घृतं वा पैत्तिके हितम् । कफे गोमूत्रसंयुक्तमारनालं त्रिदोषजे ॥ ८४ ॥ सामुद्रिक लवण, सेंधानमक, काचलवण, जवाखार, काला नमक, सुहागा और सज्जी इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर आकके दूध और थूहरके दूधमें धूपमें रखकर अलग अलग तीन तीन भावना देकर गोला बनाकर उस गोलेको आकके पत्तोंमें लपेटकर एक हाण्डी में रख संधि बन्द करके गजपुट में फूंकदे; फिर आकके भस्म हुए पत्तों सहित चूर्ण करके उसमें सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आमला, जीरा, हल्दी और चित्रककी जड़ इन सबका चूर्ण उपरोक्त चूर्णसे आधा भाग लेवे । सबको एकत्र मिलाकर एक उत्तम चिकने बासनमें भरकर रख देवे । प्रतिदिन इस औषधिमेंसे आठ मासे लेकर वाताधिक रोगमें किंचित् गरम जलके साथ, पित्तरोगमें घृत, कफज रोगमें