रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (४६३) अथ भगन्दररोगचिकित्सा । वारिताण्डव रस । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं कुमारीरसमर्दितम् । त्र्यहान्ते गोलकं कृत्वा ततस्तेन प्रलेपयेत् ॥ १ ॥ द्वयोः समं ताम्रपत्रं हण्डिकान्तर्निवेशयेत् । तद्भाण्डं भस्मनापूर्य चुल्ल्यां तीव्राग्निना पचेत्॥२॥ द्वियामान्ते समुद्धृत्य चूर्णयेत्स्वाङ्गशीतलम् । जम्बीरस्य रसैः पिष्ट्वा रुद्ध्वा सप्तपुटे पचेत् ॥ ३ ॥ गुञ्जैकां मधुनाज्येन लेह्याद्धन्ति भगन्दरम् । मूसली लवणञ्चानु आरनालयुतं पिबेत् ॥ ४ ॥ भुञ्जीत मधुराहारं दिवा स्वप्नञ्च मैथुनम् । वर्जयेच्छीतलाहारं रसेऽस्मिन्वारिताण्डवे ॥ ५ ॥ शुद्ध पारा १ भाग और शुद्ध गंधक २ भाग, दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर घीकारके रसमें तीन दिन तक खरल करके कल्कसा बना लेवे. फिर बराबर भाग पारे और गंधकके तांबेके पत्रोंको लेकर उनके ऊपर इसका लेप कर देवे । फिर उपरोक्त ताम्रपत्रोंको एक हांडीमें रखकर उसके ऊपर एक छोटासा सिकोरा ढक देवे और उसके ऊपरके भागको राखसे भर देवे । फिर तीव्र अग्निसे दो प्रहरतक पकावे, जब अपने आप शीतल होजाय तब उसका चूर्ण कर लेवे । पश्चात् जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके सुखा लेवे । फिर इसको मूषामें रखकर पुटपाककी विधिसे पकावे । इस प्रकार सात बार जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके सात बार पुट देवे । इस- मेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि लेकर सहत और घीमें मिला करके चाटे तो भगन्दर रोग नष्ट होता है । इसके भक्षण करनेके बाद मुसली, सेंधानमक और कांजी इनको एकत्र मिलाकर पान करे । इसके सेवन