भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ४६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । हरीतकीरसं दत्त्वा पञ्चगुञ्जामितां शुभाम् । एकैकां भक्षयेन्नित्यं शीतं वारि पिबेदनु ॥ ४ ॥ श्लीपदं कफवातोत्थं रक्तमांसगतञ्च यत् । मेदोगतं धातुगतं हन्त्यवश्यं न संशयः ॥ ५ ॥ श्रीमद्गहननाथेन निर्मितो विश्वसम्पदे । नित्यानन्दकरश्चायं यत्नतः श्लीपदे गदे ॥ ६ ॥ सिंगरफमेंसे निकाला हुआ पारा, गंधक, तांबाभस्म, वंगभस्म, हरि- तालभस्म, तूतिया, शंखकी भस्म, काँसाभस्म, कौड़ीकी भस्म, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आमला, लोहा, वायविडंग, पांचों लवण, चव्य, पीपलामूल, हाऊबेर, वच, कचूर, पाठ, देवदारु, इला- यची और विधारेके बीज इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर हरड़के रसमें खरल करके पांच पांच रत्तीकी गोली बना लेवे । प्रति- दिन एक एक गोली सेवन करे और ऊपरसे शीतल जलको पान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे कफवातजनित श्लीपद रोग, रुधि- रगत, मांसगत, मेदोगत और धातुगत श्लीपदरोग नष्ट होता है । श्रीमान् गहनानन्दनाथने संसारकी रक्षाके लिये सदैव आनन्दजनक ऐसी यह औषधि कही है । इसको नित्यानन्द रस कहते हैं ॥ १–६ ॥ कणादि वटी । कणावचादारुपुनर्नवानां चूर्णं सबिल्वं समवृद्धदारकम् । संमर्द्य चैतस्य निहन्ति वल्लःसकाञ्जिकःश्लीपदमुग्रवेगम् ७ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे श्लीपदाधिकारः । पीपल, वच, देवदारु, पुनर्नवा, बेलागिरी और विधारेके बीज इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र जलमें पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । कांजीके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे प्रबल श्लीपदरोग नष्ट होता है ॥ ७ ॥ इति श्लीपदरोगचिकित्सा समाप्त ।