रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (४६१) अथ अर्बुदरोगचिकित्सा । रौद्ररस । शुद्धसूतं समं गन्धं मर्द्यं यामचतुष्टयम् । नागवल्लीरसैर्युक्तं मेघनादपुनर्नवैः ॥ १ ॥ गोमूत्रपिप्पलीयुक्तं मर्द्यं रुध्वा पुटेल्लघु । लिह्यात्क्षौद्रे रसो रौद्रो गुञ्जामात्रोऽर्बुदं जयेत् ॥२॥ शुद्ध पारा १ भाग और गन्धक १ भाग, दोनोंको एकत्र पीसकर चार प्रहरतक पानाके रस, चौलाईके रस, पुनर्नवेके रस, गोमूत्र और पीपलके क्वाथमें अलग अलग खरल करके मूषामें रखकर लघुपुटमें पकावे । पश्चात् शीतल होनेपर इसमेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि लेकर सहतमें मिलाकर सेवन करावे । इसके सेवन करनेसे अर्बुदरोग नष्ट होता है । इसको रौद्ररस कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ रामबाणादिकान्योगवाहिनोऽत्र प्रयोजयेत् ॥ ३ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे अर्बुदाधिकारः । रामबाण प्रभृति समस्त योगवाही औषधि इस अर्बुदरोगमें प्रयुक्त करनी चाहिये ॥ ३ ॥ इति अर्बुदरोगचिकित्सा समाप्त । अथ श्लीपदरोगचिकित्सा । नित्यानन्द रस । हिंगुलसम्भवं सूतं गन्धकं मृतताम्रकम् । वङ्गं तालञ्च तुत्थञ्च शंखं कांस्यं वराटकम् ॥ १ ॥ त्रिकटुत्रिफलालौहं विडङ्गं पटुपञ्चकम् । चविका पिप्पलीमूलं हबुषा च वचा तथा ॥ २ ॥ शटी पाठा देवदारु एला च वृद्धदारकम् । एतानि समभागानि वटिकां कुरु यत्नतः ॥ ३ ॥ १६