भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 486, कुल 584 में से

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( ४६० ) रसेंद्रसारसंग्रह । पूर्वक इसका सेवन करे । इससे प्लीहोदर, श्वित्र, हलीमक, बवासीर, पाण्डुरोग, अरुचि, शोथ, शोष, विसूचिका, गुल्म, विषदोष, अश्मरी, श्वास, खाँसी और कुष्ठरोग नष्ट होते हैं ॥ ६-९ ॥ वंगेश्वर रस । सूतभस्म वंगभस्म भागैकैकं प्रकल्पयेत् । गन्धकं मृतताम्रञ्च प्रत्येकञ्च चतुर्गुणम् ॥ १० ॥ अर्कक्षीरैर्द्दिनं मर्द्यं सर्वं तद्गोलकीकृतम् । रुद्ध्वा तु भूधरे पक्त्वा पुटकेन समुद्धरेत् ॥ ११ ॥ एष वंगेश्वरो नाम्ना प्लीहगुल्मोदराञ्जयेत् । घृतैर्गुञ्जाद्वयं लिह्यान्निष्कां श्वेतपुनर्नवाम् ॥ गवां मूत्रैः पिबेच्चानु रजनीं वा गवां जलैः ॥ १२ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे शोथाधिकारः । रससिन्दूर और वंगभस्म यह प्रत्येक दोनों एक एक भाग लेवे, गन्धक और तांबाभस्म यह प्रत्येक चार चार भाग इन सब औषधि- योंको एकत्र पीसकर आकके दूधमें खरल करके गोला बना लेवे । फिर इस गोलेको मूषामें रखकर और उस मूषाको बन्द करके भूधर- यन्त्रमें पकावे । जब पाक समाप्त होजाय तब उतारकर चूर्ण कर लेवे । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर घृतमें मिलाकर चाटनेसे प्लीहा, गुल्म और उदररोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे अन्तमें चार मासे परिमाण श्वेतपुनर्नवाके चूर्ण अथवा चार मासे हल्दीके चूर्णको गोमूत्रके साथ पान करे । इसको वंगेश्वर रस कहते हैं ॥ १०-१२ ॥ इति शोथरोगचिकित्सा समाप्त ।

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