भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( ४५९ ) ऽमरदारु बिल्वम् ॥ ६ ॥ कलिङ्गकश्चित्रकमूल- पाठा यष्ट्याह्वयं सातिविषं पलाशम् । सहिंगुकर्षं त्वतिसूक्ष्मचूर्णं द्रोणं तथा मूलकशुण्ठिकानाम् ॥ ७ ॥ स्याद्भस्मनस्तत्सलिलेन साध्यमालोक्य यावद्धनमप्यदग्धम् । स्त्यानं ततः कोलसमां च मात्रां कृत्वा तु शुष्कां विधिना प्रयुंज्यात् ॥ ८ ॥ प्लीहोदरं श्वित्रहलीमकार्शःपाण्ड्वामयारोचकशोथ- शोषान् । विषूचिकागुल्मगराश्मरीश्च सश्वास- कासान् प्रणुदेत् सकुष्ठान् ॥ ९ ॥ जवारखार, सज्जी, *पांचों लवण, कान्तलोह, तीक्ष्णलोह, मुण्डलोह, मण्डूर, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, पीपलामूल, वायविडंग, नागरमोथा, अजवायन, देवदारु, बेलकी जड़की छाल, इन्द्रजौ, चित्रककी जड़, पाठ, मुलैठी, अतीस, ढाकके बीज और हींग इन प्रत्येक औषधियोंका चूर्ण एक एक कर्ष परिमाण लेकर सबको एकत्र पीसकर एक उत्तम बासनमें भरकर रख देवे । फिर सूखी मूलीकी भस्म एक द्रोण परिमाण लेकर आठगुने जलमें पकावे; जब पककर आधा जल बाकी रह जाय तब उतारकर छान लेवे । फिर इसको २१ वार टपकावे और जो क्षार इकट्ठा होय उसको उतारकर एक बर्त्तनमें करलेवे । फिर इस क्षारजलमें उपरोक्त यवक्षारादिके चूर्णसे चौगुना जल डालकर पकावे । जब पकते पकते गाढा होजाय तब उसमें उक्त जवारखारादिका चूर्ण डालकर खूब करछीसे घोटकर एक एक तोलेकी गोली बना लेवे । जब यह सूख जाय तब विधि

  • “सौवर्चलं सैन्धवञ्च विडमौद्भिदमेव च । सामुद्रलवणञ्चात्र जलमष्टगुणं भवेत् ॥”