रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४५८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कुटकी, सोंठ, मिरच, पीपल, दंती, वायविडंग, हरड, बहेडा, आमला, चित्रककी जड, देवदारु, निसोथकी जड और गज- पीपल इन सब औषधियोंका चूर्ण प्रत्येक एक एक भाग और लोह- भस्मका चूर्ण सब औषधिसे दुगुना लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र करके यथोचित मात्रासे दूधके साथ सेवन करनेसे शोथरोग नष्ट होता है । इसको कटुकाद्यलोह कहते हैं ॥ २ ॥ ३ ॥ त्र्यूषणाद्यलोह । अयोरजस्त्र्यूषणयावशूकं चूर्णञ्च पीतं त्रिफला- रसेन । शोथं निहन्यात्सहसा नरस्य यथाऽशनि- र्वृक्षमुदीर्णवेगः ॥ ४ ॥ सोंठ, मिरच, पीपल और जवाखार यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, लोहभस्मका चूर्ण ४ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र करके त्रिफलेके क्वाथके साथ यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे शोथरोग नष्ट होता है । इसको त्र्यूषणाद्यलोह कहते हैं ॥ ४ ॥ सुवर्चलाद्यलोह । सुवर्चला व्याघ्रनखं चित्रकं कटुरोहिणी । चव्यञ्च देवकाष्ठञ्च दीप्यकं लोहमेव च ॥ शोथं पाण्डुं तथा कासमुदराणि निहन्ति च ॥ ५ ॥ काला नमक, नखी, चित्रककी जड, कुटकी, देवदारु और अजवायन यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोहभस्म ७ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानु- सार सेवन करनेसे शोथ, पाण्डु, खांसी और सब प्रकारके उदररोग नष्ट होते हैं । इसको सुवर्चलाद्यलोह कहते हैं ॥ ५ ॥ क्षारगुटिका । क्षारद्वयं स्याल्लवणानि पञ्च अयश्चतुष्कं त्रिफला च व्योषम् । सपिप्पलीमूलविडङ्गसारं मुस्ताजमोदा-