भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 483, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 483

भाषाटीकासहित । ( ४५७ ) कासे श्वासे च मेहे जठरजलगदे सर्वदोषप्रभूते,ख्यातो योगःसुराणामधिपतिविहितःसर्वतोभद्र एषः १०५॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे प्लीहाधिकारः । शुद्ध पारा, गंधक, तांवाभस्म, अभ्रकभस्म और कान्तलोहभस्म इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर अदरकके रसमें खरल करके यकृत, अर्श, प्लीहा, सब प्रकारके ज्वर, शोथ, पांडु, क्रिमिजन्य रोग, कामला, खांसी, श्वास, प्रमेह और त्रिदोषज जलोदररोगमें यथोचित मात्रानुसार सेवन करे । इस सर्वतोभद्र रसको महात्मा इन्द्रदेवने कहा है ॥ १०४ ॥ १०५ ॥ इति प्लीहरोगचिकित्सा समाप्त । अथ शोथरोगचिकित्सा । त्रिकट्वाद्यलोह । त्रिकटु त्रिफला दन्ती मार्गत्रिमदशुण्ठकैः । पुनर्नवासमायुक्तं शोथं हन्ति सुदुस्तरम् ॥ लौहं शोथोदरस्थौल्यं जलोदरनिवारणम् ॥ १ ॥ सोंठ, पीपल, काली मिरच, हरड, बहेडा, आमला, दंतीकी जड़, चिरचिटेकी जड़, चित्रक, नागरमोथा, वायविडंग, सोंठ और पुनर्नवा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोहा १३ भाग लेवे इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानुसार यथोक्त अनु- पानके साथ सेवन करनेसे दुर्निवार शोथरोग, उदररोग, मेदरोग और जलोदररोग नष्ट होते हैं । इसको त्रिकट्वाद्यलोह कहते हैं ॥ १ ॥ कटुकाद्यलोह । कटुकी त्र्यूषणं दंती विडंगं त्रिफला तथा । चित्रको देवकाष्ठञ्च त्रिवृद्धारणपिप्पली ॥ २ ॥ तुल्यान्येतानि चूर्णानि द्विगुणं स्यादयोरजः । क्षीरेण पीतमेतत्तु श्रेष्ठं श्वयथुनाशनम् ॥ ३ ॥