भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ४५६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अतिवह्निकरः श्रीदो बलवर्णाग्निवर्द्धनः । धन्वन्तरिकृतः सद्यो रसः परमदुर्लभः । सर्वरोगे प्रयोक्तव्यो निःसंदेहं भिषग्वरैः ॥ १०३ ॥ फिर इन गोलियोंको शराव सम्पुटमें रखकर कपरमिट्टी कर देवे । फिर इस सम्पुटको एक हांडीमें रख बालूसे भर देवे । फिर इस हांडीके मुखको कपरमिट्टीसे बंद करके एक दिनरात पकावे । शीतल होनेपर उतारकर उसका चूर्ण कर लेवे, फिर इस चूर्णको मौलसिरीके बीजोंके क्वाथ, कटेरीके क्वाथ, बड़ीकटेरीके क्वाथ, गिलोयके क्वाथ, त्रिफलेके क्वाथ, बिधारेके बीजोंके क्वाथ, अपराजिताकी जड़के रस और मछलीके पित्तमें अलग अलग सात सात भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । पश्चात् देवता, गुरु, साधु और ब्राह्मणोंकी पूजा करके इस औषधिका सेवन करना आरम्भ करे । संज्ञाहीन सन्निपातग्रसित रोगीको मारिचोंके चूर्णके साथ इस औषधिका सेवन करावे तो संज्ञा प्राप्त होजाती है । कफज रोग, संग्रहणी, मंदाग्नि, प्लीहा, पाण्डु, शूल और उदावर्त रोगमें इस औषधिको त्रिकुटे और त्रिफलेके क्वाथके साथ और कुष्ठरोगमें कठूमरके रसके साथ इसका प्रयोग करे । यह अत्यंत अग्निको दीपन करनेवाली, लक्ष्मीजनक, बल, वर्ण और अग्निको बढ़ानेवाली है । भिषक्गण निश्चय चित्तसे सब रोगोंमें इस औषधिका प्रयोग करें । इस वारिशोषण रसको स्वयं धन्वन्तरि भगवान्ने कहा है ॥ ९५-१०३ ॥ सर्वतोभद्र रस । सूतं गन्धं तपनगगनं कान्तलौहस्य चूर्णं, कृत्वैकस्मिन्दृषदि पिषितं शृङ्गवेरस्य वारा । युञ्ज्याद्रोगे यकृति गुदजे प्लीह्नि सर्वज्वरेषु, शोथे पाण्डौ क्रिमिकृतगदे सर्वतः कामलायाम् ॥ १०४ ॥