रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
( ४५६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अतिवह्निकरः श्रीदो बलवर्णाग्निवर्द्धनः । धन्वन्तरिकृतः सद्यो रसः परमदुर्लभः । सर्वरोगे प्रयोक्तव्यो निःसंदेहं भिषग्वरैः ॥ १०३ ॥ फिर इन गोलियोंको शराव सम्पुटमें रखकर कपरमिट्टी कर देवे । फिर इस सम्पुटको एक हांडीमें रख बालूसे भर देवे । फिर इस हांडीके मुखको कपरमिट्टीसे बंद करके एक दिनरात पकावे । शीतल होनेपर उतारकर उसका चूर्ण कर लेवे, फिर इस चूर्णको मौलसिरीके बीजोंके क्वाथ, कटेरीके क्वाथ, बड़ीकटेरीके क्वाथ, गिलोयके क्वाथ, त्रिफलेके क्वाथ, बिधारेके बीजोंके क्वाथ, अपराजिताकी जड़के रस और मछलीके पित्तमें अलग अलग सात सात भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । पश्चात् देवता, गुरु, साधु और ब्राह्मणोंकी पूजा करके इस औषधिका सेवन करना आरम्भ करे । संज्ञाहीन सन्निपातग्रसित रोगीको मारिचोंके चूर्णके साथ इस औषधिका सेवन करावे तो संज्ञा प्राप्त होजाती है । कफज रोग, संग्रहणी, मंदाग्नि, प्लीहा, पाण्डु, शूल और उदावर्त रोगमें इस औषधिको त्रिकुटे और त्रिफलेके क्वाथके साथ और कुष्ठरोगमें कठूमरके रसके साथ इसका प्रयोग करे । यह अत्यंत अग्निको दीपन करनेवाली, लक्ष्मीजनक, बल, वर्ण और अग्निको बढ़ानेवाली है । भिषक्गण निश्चय चित्तसे सब रोगोंमें इस औषधिका प्रयोग करें । इस वारिशोषण रसको स्वयं धन्वन्तरि भगवान्ने कहा है ॥ ९५-१०३ ॥ सर्वतोभद्र रस । सूतं गन्धं तपनगगनं कान्तलौहस्य चूर्णं, कृत्वैकस्मिन्दृषदि पिषितं शृङ्गवेरस्य वारा । युञ्ज्याद्रोगे यकृति गुदजे प्लीह्नि सर्वज्वरेषु, शोथे पाण्डौ क्रिमिकृतगदे सर्वतः कामलायाम् ॥ १०४ ॥
भाषाटीकासहित । ( ४५७ ) कासे श्वासे च मेहे जठरजलगदे सर्वदोषप्रभूते,ख्यातो योगःसुराणामधिपतिविहितःसर्वतोभद्र एषः १०५॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे प्लीहाधिकारः । शुद्ध पारा, गंधक, तांवाभस्म, अभ्रकभस्म और कान्तलोहभस्म इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर अदरकके रसमें खरल करके यकृत, अर्श, प्लीहा, सब प्रकारके ज्वर, शोथ, पांडु, क्रिमिजन्य रोग, कामला, खांसी, श्वास, प्रमेह और त्रिदोषज जलोदररोगमें यथोचित मात्रानुसार सेवन करे । इस सर्वतोभद्र रसको महात्मा इन्द्रदेवने कहा है ॥ १०४ ॥ १०५ ॥ इति प्लीहरोगचिकित्सा समाप्त । अथ शोथरोगचिकित्सा । त्रिकट्वाद्यलोह । त्रिकटु त्रिफला दन्ती मार्गत्रिमदशुण्ठकैः । पुनर्नवासमायुक्तं शोथं हन्ति सुदुस्तरम् ॥ लौहं शोथोदरस्थौल्यं जलोदरनिवारणम् ॥ १ ॥ सोंठ, पीपल, काली मिरच, हरड, बहेडा, आमला, दंतीकी जड़, चिरचिटेकी जड़, चित्रक, नागरमोथा, वायविडंग, सोंठ और पुनर्नवा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोहा १३ भाग लेवे इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानुसार यथोक्त अनु- पानके साथ सेवन करनेसे दुर्निवार शोथरोग, उदररोग, मेदरोग और जलोदररोग नष्ट होते हैं । इसको त्रिकट्वाद्यलोह कहते हैं ॥ १ ॥ कटुकाद्यलोह । कटुकी त्र्यूषणं दंती विडंगं त्रिफला तथा । चित्रको देवकाष्ठञ्च त्रिवृद्धारणपिप्पली ॥ २ ॥ तुल्यान्येतानि चूर्णानि द्विगुणं स्यादयोरजः । क्षीरेण पीतमेतत्तु श्रेष्ठं श्वयथुनाशनम् ॥ ३ ॥
( ४५८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कुटकी, सोंठ, मिरच, पीपल, दंती, वायविडंग, हरड, बहेडा, आमला, चित्रककी जड, देवदारु, निसोथकी जड और गज- पीपल इन सब औषधियोंका चूर्ण प्रत्येक एक एक भाग और लोह- भस्मका चूर्ण सब औषधिसे दुगुना लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र करके यथोचित मात्रासे दूधके साथ सेवन करनेसे शोथरोग नष्ट होता है । इसको कटुकाद्यलोह कहते हैं ॥ २ ॥ ३ ॥ त्र्यूषणाद्यलोह । अयोरजस्त्र्यूषणयावशूकं चूर्णञ्च पीतं त्रिफला- रसेन । शोथं निहन्यात्सहसा नरस्य यथाऽशनि- र्वृक्षमुदीर्णवेगः ॥ ४ ॥ सोंठ, मिरच, पीपल और जवाखार यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, लोहभस्मका चूर्ण ४ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र करके त्रिफलेके क्वाथके साथ यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे शोथरोग नष्ट होता है । इसको त्र्यूषणाद्यलोह कहते हैं ॥ ४ ॥ सुवर्चलाद्यलोह । सुवर्चला व्याघ्रनखं चित्रकं कटुरोहिणी । चव्यञ्च देवकाष्ठञ्च दीप्यकं लोहमेव च ॥ शोथं पाण्डुं तथा कासमुदराणि निहन्ति च ॥ ५ ॥ काला नमक, नखी, चित्रककी जड, कुटकी, देवदारु और अजवायन यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोहभस्म ७ भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानु- सार सेवन करनेसे शोथ, पाण्डु, खांसी और सब प्रकारके उदररोग नष्ट होते हैं । इसको सुवर्चलाद्यलोह कहते हैं ॥ ५ ॥ क्षारगुटिका । क्षारद्वयं स्याल्लवणानि पञ्च अयश्चतुष्कं त्रिफला च व्योषम् । सपिप्पलीमूलविडङ्गसारं मुस्ताजमोदा-
भाषाटीकासहित । ( ४५९ ) ऽमरदारु बिल्वम् ॥ ६ ॥ कलिङ्गकश्चित्रकमूल- पाठा यष्ट्याह्वयं सातिविषं पलाशम् । सहिंगुकर्षं त्वतिसूक्ष्मचूर्णं द्रोणं तथा मूलकशुण्ठिकानाम् ॥ ७ ॥ स्याद्भस्मनस्तत्सलिलेन साध्यमालोक्य यावद्धनमप्यदग्धम् । स्त्यानं ततः कोलसमां च मात्रां कृत्वा तु शुष्कां विधिना प्रयुंज्यात् ॥ ८ ॥ प्लीहोदरं श्वित्रहलीमकार्शःपाण्ड्वामयारोचकशोथ- शोषान् । विषूचिकागुल्मगराश्मरीश्च सश्वास- कासान् प्रणुदेत् सकुष्ठान् ॥ ९ ॥ जवारखार, सज्जी, *पांचों लवण, कान्तलोह, तीक्ष्णलोह, मुण्डलोह, मण्डूर, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, पीपलामूल, वायविडंग, नागरमोथा, अजवायन, देवदारु, बेलकी जड़की छाल, इन्द्रजौ, चित्रककी जड़, पाठ, मुलैठी, अतीस, ढाकके बीज और हींग इन प्रत्येक औषधियोंका चूर्ण एक एक कर्ष परिमाण लेकर सबको एकत्र पीसकर एक उत्तम बासनमें भरकर रख देवे । फिर सूखी मूलीकी भस्म एक द्रोण परिमाण लेकर आठगुने जलमें पकावे; जब पककर आधा जल बाकी रह जाय तब उतारकर छान लेवे । फिर इसको २१ वार टपकावे और जो क्षार इकट्ठा होय उसको उतारकर एक बर्त्तनमें करलेवे । फिर इस क्षारजलमें उपरोक्त यवक्षारादिके चूर्णसे चौगुना जल डालकर पकावे । जब पकते पकते गाढा होजाय तब उसमें उक्त जवारखारादिका चूर्ण डालकर खूब करछीसे घोटकर एक एक तोलेकी गोली बना लेवे । जब यह सूख जाय तब विधि
- “सौवर्चलं सैन्धवञ्च विडमौद्भिदमेव च । सामुद्रलवणञ्चात्र जलमष्टगुणं भवेत् ॥”
( ४६० ) रसेंद्रसारसंग्रह । पूर्वक इसका सेवन करे । इससे प्लीहोदर, श्वित्र, हलीमक, बवासीर, पाण्डुरोग, अरुचि, शोथ, शोष, विसूचिका, गुल्म, विषदोष, अश्मरी, श्वास, खाँसी और कुष्ठरोग नष्ट होते हैं ॥ ६-९ ॥ वंगेश्वर रस । सूतभस्म वंगभस्म भागैकैकं प्रकल्पयेत् । गन्धकं मृतताम्रञ्च प्रत्येकञ्च चतुर्गुणम् ॥ १० ॥ अर्कक्षीरैर्द्दिनं मर्द्यं सर्वं तद्गोलकीकृतम् । रुद्ध्वा तु भूधरे पक्त्वा पुटकेन समुद्धरेत् ॥ ११ ॥ एष वंगेश्वरो नाम्ना प्लीहगुल्मोदराञ्जयेत् । घृतैर्गुञ्जाद्वयं लिह्यान्निष्कां श्वेतपुनर्नवाम् ॥ गवां मूत्रैः पिबेच्चानु रजनीं वा गवां जलैः ॥ १२ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे शोथाधिकारः । रससिन्दूर और वंगभस्म यह प्रत्येक दोनों एक एक भाग लेवे, गन्धक और तांबाभस्म यह प्रत्येक चार चार भाग इन सब औषधि- योंको एकत्र पीसकर आकके दूधमें खरल करके गोला बना लेवे । फिर इस गोलेको मूषामें रखकर और उस मूषाको बन्द करके भूधर- यन्त्रमें पकावे । जब पाक समाप्त होजाय तब उतारकर चूर्ण कर लेवे । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर घृतमें मिलाकर चाटनेसे प्लीहा, गुल्म और उदररोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे अन्तमें चार मासे परिमाण श्वेतपुनर्नवाके चूर्ण अथवा चार मासे हल्दीके चूर्णको गोमूत्रके साथ पान करे । इसको वंगेश्वर रस कहते हैं ॥ १०-१२ ॥ इति शोथरोगचिकित्सा समाप्त ।
भाषाटीकासहित । (४६१) अथ अर्बुदरोगचिकित्सा । रौद्ररस । शुद्धसूतं समं गन्धं मर्द्यं यामचतुष्टयम् । नागवल्लीरसैर्युक्तं मेघनादपुनर्नवैः ॥ १ ॥ गोमूत्रपिप्पलीयुक्तं मर्द्यं रुध्वा पुटेल्लघु । लिह्यात्क्षौद्रे रसो रौद्रो गुञ्जामात्रोऽर्बुदं जयेत् ॥२॥ शुद्ध पारा १ भाग और गन्धक १ भाग, दोनोंको एकत्र पीसकर चार प्रहरतक पानाके रस, चौलाईके रस, पुनर्नवेके रस, गोमूत्र और पीपलके क्वाथमें अलग अलग खरल करके मूषामें रखकर लघुपुटमें पकावे । पश्चात् शीतल होनेपर इसमेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि लेकर सहतमें मिलाकर सेवन करावे । इसके सेवन करनेसे अर्बुदरोग नष्ट होता है । इसको रौद्ररस कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ रामबाणादिकान्योगवाहिनोऽत्र प्रयोजयेत् ॥ ३ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे अर्बुदाधिकारः । रामबाण प्रभृति समस्त योगवाही औषधि इस अर्बुदरोगमें प्रयुक्त करनी चाहिये ॥ ३ ॥ इति अर्बुदरोगचिकित्सा समाप्त । अथ श्लीपदरोगचिकित्सा । नित्यानन्द रस । हिंगुलसम्भवं सूतं गन्धकं मृतताम्रकम् । वङ्गं तालञ्च तुत्थञ्च शंखं कांस्यं वराटकम् ॥ १ ॥ त्रिकटुत्रिफलालौहं विडङ्गं पटुपञ्चकम् । चविका पिप्पलीमूलं हबुषा च वचा तथा ॥ २ ॥ शटी पाठा देवदारु एला च वृद्धदारकम् । एतानि समभागानि वटिकां कुरु यत्नतः ॥ ३ ॥ १६
( ४६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । हरीतकीरसं दत्त्वा पञ्चगुञ्जामितां शुभाम् । एकैकां भक्षयेन्नित्यं शीतं वारि पिबेदनु ॥ ४ ॥ श्लीपदं कफवातोत्थं रक्तमांसगतञ्च यत् । मेदोगतं धातुगतं हन्त्यवश्यं न संशयः ॥ ५ ॥ श्रीमद्गहननाथेन निर्मितो विश्वसम्पदे । नित्यानन्दकरश्चायं यत्नतः श्लीपदे गदे ॥ ६ ॥ सिंगरफमेंसे निकाला हुआ पारा, गंधक, तांबाभस्म, वंगभस्म, हरि- तालभस्म, तूतिया, शंखकी भस्म, काँसाभस्म, कौड़ीकी भस्म, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आमला, लोहा, वायविडंग, पांचों लवण, चव्य, पीपलामूल, हाऊबेर, वच, कचूर, पाठ, देवदारु, इला- यची और विधारेके बीज इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर हरड़के रसमें खरल करके पांच पांच रत्तीकी गोली बना लेवे । प्रति- दिन एक एक गोली सेवन करे और ऊपरसे शीतल जलको पान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे कफवातजनित श्लीपद रोग, रुधि- रगत, मांसगत, मेदोगत और धातुगत श्लीपदरोग नष्ट होता है । श्रीमान् गहनानन्दनाथने संसारकी रक्षाके लिये सदैव आनन्दजनक ऐसी यह औषधि कही है । इसको नित्यानन्द रस कहते हैं ॥ १–६ ॥ कणादि वटी । कणावचादारुपुनर्नवानां चूर्णं सबिल्वं समवृद्धदारकम् । संमर्द्य चैतस्य निहन्ति वल्लःसकाञ्जिकःश्लीपदमुग्रवेगम् ७ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे श्लीपदाधिकारः । पीपल, वच, देवदारु, पुनर्नवा, बेलागिरी और विधारेके बीज इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र जलमें पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । कांजीके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे प्रबल श्लीपदरोग नष्ट होता है ॥ ७ ॥ इति श्लीपदरोगचिकित्सा समाप्त ।
भाषाटीकासहित । (४६३) अथ भगन्दररोगचिकित्सा । वारिताण्डव रस । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं कुमारीरसमर्दितम् । त्र्यहान्ते गोलकं कृत्वा ततस्तेन प्रलेपयेत् ॥ १ ॥ द्वयोः समं ताम्रपत्रं हण्डिकान्तर्निवेशयेत् । तद्भाण्डं भस्मनापूर्य चुल्ल्यां तीव्राग्निना पचेत्॥२॥ द्वियामान्ते समुद्धृत्य चूर्णयेत्स्वाङ्गशीतलम् । जम्बीरस्य रसैः पिष्ट्वा रुद्ध्वा सप्तपुटे पचेत् ॥ ३ ॥ गुञ्जैकां मधुनाज्येन लेह्याद्धन्ति भगन्दरम् । मूसली लवणञ्चानु आरनालयुतं पिबेत् ॥ ४ ॥ भुञ्जीत मधुराहारं दिवा स्वप्नञ्च मैथुनम् । वर्जयेच्छीतलाहारं रसेऽस्मिन्वारिताण्डवे ॥ ५ ॥ शुद्ध पारा १ भाग और शुद्ध गंधक २ भाग, दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर घीकारके रसमें तीन दिन तक खरल करके कल्कसा बना लेवे. फिर बराबर भाग पारे और गंधकके तांबेके पत्रोंको लेकर उनके ऊपर इसका लेप कर देवे । फिर उपरोक्त ताम्रपत्रोंको एक हांडीमें रखकर उसके ऊपर एक छोटासा सिकोरा ढक देवे और उसके ऊपरके भागको राखसे भर देवे । फिर तीव्र अग्निसे दो प्रहरतक पकावे, जब अपने आप शीतल होजाय तब उसका चूर्ण कर लेवे । पश्चात् जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके सुखा लेवे । फिर इसको मूषामें रखकर पुटपाककी विधिसे पकावे । इस प्रकार सात बार जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके सात बार पुट देवे । इस- मेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि लेकर सहत और घीमें मिला करके चाटे तो भगन्दर रोग नष्ट होता है । इसके भक्षण करनेके बाद मुसली, सेंधानमक और कांजी इनको एकत्र मिलाकर पान करे । इसके सेवन
भाग और गंधक->भाग. In line 5: शुद्धवलिना. Let's look at व: indeed, no cut inside. But let's check: in Sanskrit it's often written शुद्धबलिनाorशुद्धवलिना(व/ब interchangeable). I will transcribeशुद्धवलिनाorशुद्धबलिना? In line 7: निम्बूजलैः(ब with dot/loop). In line 8:गुञ्जोन्मितः. Let's look closely at शुद्धवलिनाvsशुद्धबलिना: there is a very faint diagonal slash or is it just व? It looks like व, but शुद्धवलिनाis totally normal in Sanskrit prints.) * Line 6:शुद्धं ताम्रमयः समस्ततुलितं पात्रं निधायोपरि । Wait,ताम्रमयः->ताम्रमयः(taamramayah = copper and iron, ताम्र + अयस्). समस्ततुलितं-> equal to all (i.e. equal to mercury + sulfur). पात्रं निधायोपरि । * Line 7:स्वेद्यं यामयुगञ्च भस्म पिठरे निम्बूजलैः सप्तधा, -स्वेद्यं यामयुगञ्च` (with
भाषाटीकासहित । ( ४६५ ) अथ कुष्ठरोगचिकित्सा । कन्याकोटिप्रदानेन गङ्गायां पितृतर्पणे । विश्वेश्वरपुरीवासे तत्फलं कुष्ठनाशने ॥ १ ॥ गवां कोटिप्रदानेन अश्वमेधशतेन च । वृषोत्सर्गे च यत्पुण्यं तत्पुण्यं कुष्ठनाशने ॥ २ ॥ जो फल करोड़ कन्या प्रदान करनेसे होता है, जो फल गंगामें पितृ- तर्पण करनेसे होता है, जो फल काशीमें निवास करनेसे होता है, जो फल करोड़ गोदान करनेसे होता है, जो फल सौ अश्वमेध यज्ञ कर- नेसे होता है तथा जो पुण्य वृषोत्सर्ग करनेसे संचय होता है वही फल केवल एक कुष्ठरोगीको आरोग्य करनेमें होता है ॥ १ ॥ २ ॥ गलत्कुष्ठारि रस । रसो वलिस्ताम्रमयः पुरोऽग्निशिलाजतु स्याद्विष- तिन्दुकोग्रे । सर्वञ्च तुल्यं गगनं करञ्जबीजं तथा भागचतुष्टयञ्च ॥ ३ ॥ संमर्द्य गाढं मधुना घृतेन वल्लद्वयञ्चास्य निहन्त्यवश्यम् । कुष्ठं किलासं ह्यपि वातरक्तं जलोदरं वाथ विबद्धमूलम् । विशीर्णकर्णा- ङ्गुलिनासिकोऽपि भवेत्प्रसादात्स्मरतुल्यमूर्तिः ॥४॥ पारा, गन्धक, तांबाभस्म, लोहभस्म, गूगल, चित्रककी जड़, शिला- जीत, शुद्ध कुचले और वच यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, अभ्रक और करंजके बीज यह प्रत्येक चार चार भाग, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर थोड़ेसे घी और सहतमें सानकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे कुष्ठ, किलास, वातरक्त और बँधी हुई जड़वाला जलोदर रोग नष्ट हो जाता है । कुष्ठरोगमें जिस मनुष्यके कान, अंगुली और नासिका गल गई वह इस औषधिके प्रभावसे कामदेवके समान स्वरूपवान् होजाता है । इसको गलत्कुष्ठारि रस कहते हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥
( ५६६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । उदयभास्कर । गन्धकेन मृतं ताम्रं दशभागं समुद्धरेत् । ऊषणं पञ्चभागं स्यादमृतञ्च द्विभागिकम् ॥ ५ ॥ सूक्ष्मचूर्णीकृतं सर्वं रक्तिकैकप्रमाणतः । दातव्यं कुष्ठिने सम्यगनुपानस्य योगतः ॥ ६ ॥ गलिते स्फुटिते चैव विषूच्यां मण्डले तथा । विचर्चिकादद्रुपामाकुष्ठरोगप्रशान्तये ॥ ७ ॥ गंधकसे मारा हुआ तांबा १० भाग, काली मिरच ५ भाग, विष २ भाग, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर जलमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इसको यथोचित अनुपानके साथ कुष्ठरोगीको देवे । गला हुआ और फूटा हुआ ऐसे कुष्ठरोगमें, विषू- चिकामें, मण्डलरोगमें और विचर्चिका, दद्रु, पामा इत्यादि कुष्ठ रोगोंमें इस औषधिका प्रयोग करे । इसको उदयभास्कर रस कहते हैं॥५-७॥ तालकेश्वर रस । धात्रीटंकणतालानां दशभागं समुद्धरेत् । धात्र्या रसैर्मर्दयित्वा शिखरीमूलवारिणा ॥ सर्वकुष्ठहरः सेव्यः सर्वदा भोजनप्रियः ॥ ८ ॥ आमला, सुहागा और हरिताल यह प्रत्येक औषधि दश तोले लेकर सबको एकत्र पीसकर आमले और चिरचिटेके रसमें खरल करके गोली बना लेवे । इसके सेवन करनेसे कुष्ठ रोग नष्ट होता है ॥८॥ ब्रह्म रस । भागैकं मूर्च्छितं सूतं गन्धकं त्वथवागुजी । चूर्णन्तु ब्रह्मबीजानां प्रतिद्वादशभागिकम् ॥ ९ ॥ त्रिंशद्भागं गुडस्यापि क्षौद्रेण गुटिका कृता । अयं ब्रह्मरसो नाम्ना ब्रह्महत्यादिनाशनः ॥ १० ॥
भाषाटीकासहित । ( ४६७ ) द्विनिष्कं भक्षणाद्धन्ति प्रसुतिकुष्ठमण्डलम् । पातालगरुडीमूलं जलैः पिष्ट्वा पिबेदनु ॥ ११ ॥ मूर्च्छित पारा १ भाग, गंधक, चित्रककी जड़, बावचीके बीज और ढाकके बीज यह प्रत्येक द्वादश ( बारह १२ ) भाग और पुराना गुड़ ३० भाग, इन सब औषधियोंको एकत्र सहतमें पीसकर आठ आठ मासेकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे ब्रह्म- हत्यादिजन्य प्रसुतिरोग और मण्डल कुष्ठ नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेके बाद पातालगरुडी (छिरहिंटा) की जड़को जलमें पीसकर सेवन करे । इसको ब्रह्मरस कहते हैं ॥ ९-११ ॥ चन्द्रानन रस । सूतव्योमाग्नयस्तुल्यास्त्रिभागो गन्धकस्य च । काठोडुम्बरिकाक्षीरैः सर्वमेकत्र मर्दयेत् ॥ १२ ॥ माषमात्रां गुटीं कृत्वा कुष्ठरोगे प्रयोजयेत् । देहशुद्धिं पुरा कृत्वा सर्वकुष्ठानि नाशयेत् ॥ एष चन्द्राननो नाम साक्षाच्छ्रीभैरवोदितः ॥ १३ ॥ शुद्ध पारा, अभ्रकभस्म और चित्रक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और गन्धक ३ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र कठूमरके दूधमें पीसकर एक एक मासेकी गोली बना लेवे । प्रथम वमन और विरेचनके द्वारा शरीरको शुद्ध करके कुष्ठरोगमें इस औषधिका प्रयोग करे । इससे सब प्रकारके कुष्ठ रोग नष्ट होते हैं । इस चन्द्रानन रसको श्रीभैरवजीने कहा है ॥ १२ ॥ १३ ॥ कुष्ठकालानल रस । गन्धं रसं टङ्कणताम्रलोहं भस्मीकृतं मागधिकासमेतम् । पञ्चाङ्गनिम्बेन फलत्रिकेन विभावितं राजतरोस्तथैव ॥ नियोजयेद्वल्लकयुग्ममानं कुष्ठेषु सर्वेषु च रोगसंघे १४॥
( ४६८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । गंधक, पारा, सुहागा, तांबाभस्म, लोहभस्म और पीपल इन सबको समान भाग लेकर नींवके पञ्चांगके रसमें सात वार, त्रिफलेके रसमें सात वार और अमलतासके क्वाथमें सात वार भावना देकर चार चार रत्ती परिमाण औषधिका कुष्ठरोग और अन्यान्य समस्त रोगोंमें प्रयोग करे । इसको कुष्ठकालानल रस कहते हैं ॥ १४ ॥ वज्रवटी । शुद्धसूताग्निमरिचं सूताद्द्विगुणगन्धकम् । काठोडुम्बरिकाक्षीरैर्दिनं मर्द्यं प्रयत्नतः ॥ १५ ॥ वराव्योषकषायेण वटीञ्चास्य समाचरेत् । लिह्याद्वज्रवटी ह्येषा पामारोगविनाशिनी ॥ १६ ॥ शुद्ध पारा और चित्रककी जड़, मरिच यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, गंधक २ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके कठूमरके दूधमें एक दिनतक खरल करे । पश्चात् त्रिफला और त्रिकुटेके क्वाथमें खरल करके यथोचित मात्रानुसार गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे पामा रोग नष्ट होता है । इसको वज्रवटी कहते हैं ॥१५॥१६॥ चन्द्रकान्त रस । पलत्रयं मृतं ताम्रं सूतमेकं द्विगन्धकम् । त्रिकटुत्रिफलाचूर्णं प्रत्येकञ्च पलं पलम् ॥ १७ ॥ निर्गुण्ड्याश्चार्द्रकद्रावैर्वह्निद्रावैर्विमर्दयेत् । दिनैकं तद्विशोष्याथ तुषाग्नौ स्वेदयेद्दिनम् ॥ १८ ॥ समुद्धृत्य विचूर्ण्याथ वागुजीतैलमर्दितम् । त्रिदिनं भावयेत्तेन निष्कैकं भक्षयेत्सदा ॥ १९ ॥ चन्द्रकान्तरसो नाम्ना कुष्ठं हन्ति न संशयः । तैलं करञ्जबीजोत्थं वह्निगन्धकसैन्धवैः ॥ अनुपानं प्रकर्त्तव्यं कल्कं वा वागुजीभवम् ॥ २० ॥
भाषाटीकासहित । ( ४६९ ) तांबेकी भस्म ३ पल, पारा १ पल, गंधक २ पल, त्रिकुटा ३ पल और त्रिफला ३ पल लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके सम्हा- लूके पत्तोंके रस, अदरखके रस और चित्रककी जड़के रसमें खरल करके सूर्यकी धूपमें एक दिन सुखाकर मूषामें रखे, पश्चात् तुषोंकी अग्निमें मूषाको रखकर पकावे । जब अपने आप शीतल होजाय तब बारीक पीसकर चूर्ण कर लेवे । फिर उस चूर्णको बावचीके तेलमें खरल करके उसी तेलमें ३ दिन भावना देवे । इसमेंसे प्रतिदिन चार मासे औषधि सेवन करनेसे अवश्य कुष्ठ रोग नष्ट होता है । इसके सेवन करनेके पश्चात् करंजके तेलमें पिसी हुई चित्रककी जड़, गन्धक और सेंधानमक अथवा बावचीके कल्कको भक्षण करे। इसको चन्द्रकान्त रस कहते हैं ॥ १७-२० ॥ सङ्कोच रस । मृतताम्राभ्रकं तुल्यं तयोः सूतश्चतुर्गुणम् । शुद्धं तन्मर्दयेत्खल्ले गोलकं कारयेत्ततः ॥ २१ ॥ त्रिभिस्तुल्यं शुद्धगन्धं लोहपात्रे क्षणं पचेत् । तन्मध्ये गोलकं पाच्यं यावज्जीर्णं तु गन्धकम्॥२२॥ एतन्मृद्वग्निना तावत्समुद्धृत्य विचूर्णयेत् । गुग्गुलुंनिम्बपञ्चाङ्गं त्रिफला चामृता विषम् ॥ २३ ॥ पटोलं खादिरं सारं व्याधिघातं समं समम् । चूर्णितं मधुना लेह्यं निष्कमौदुम्बरापहम् ॥ रसः संकोचनामायं कुष्ठे परमदुर्लभः ॥ २४ ॥ तांबेकी भस्म १ भाग, अभ्रककी भस्म १ भाग, शुद्ध पारा ८ भाग इन तीनों औषधियोंको एकत्र पीसकर गोलासा बना लेवे । फिर उसमें दश भाग गन्धक मिलाकर लोहेके पात्रमें डालकर पकावे । जबतक गन्धक जीर्ण न होजाय तबतक इसको मन्द मन्द अग्निसे
( ४७० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पकावे । फिर शीतल होनेपर इसका चूर्ण करके फिर इसमें एक भाग गूगल, नीमके पत्तोंका चूर्ण १ भाग, नीमकी छालका चूर्ण १ भाग, नीमके फूलोंका चूर्ण १ भाग, नीमके बीजोंका तेल, नीमकी जड़का चूर्ण १ भाग, त्रिफलेका चूर्ण ३ भाग, गिलोयका चूर्ण १ भाग, विषका चूर्ण १ भाग, पटोलपत्रका चूर्ण १ भाग, खैरसारका चूर्ण १ भाग और अमलतासका चूर्ण १ भाग मिलाकर एक उत्तम पात्रमें भरकर रख देवे । इसमेंसे चार मासे औषधि सहतमें मिलाकर सेवन करे तो उदुम्बरकुष्ठ नष्ट होता है । यह संकोचरस कुष्ठ रोगमें अतीव हितकारी है ॥ २१-२४ ॥ अमृतांकुर लोह । हुताशमुखसंशुद्धं पलमेकं रसस्य वै । पलं लौहस्य ताम्रस्य पलं भल्लातकस्य च ॥ २५ ॥ अभ्रकस्य पलञ्चैकं गन्धकस्य चतुःपलम् । हरीतकीविभीतक्योश्चूर्णं कर्षद्वयं द्वयोः ॥ २६ ॥ अष्टमात्राधिकं तत्र धात्र्याः पाणितलानि षट् । घृतं चाष्टगुणं लौहाद्द्वात्रिंशत्त्रिफलाजलम् ॥ २७ ॥ एकीकृत्य पचेत्पात्रे लौहे च विधिपूर्वकम् । पाकमेवास्य जानीयाच्छास्त्रज्ञो लौहपाकवित् ॥ २८ ॥ भक्षयेत्प्रातरुत्थाय गुरुदेवद्विजार्च्चकः । रक्तिकादिक्रमेणैव घृतभ्रामरमर्द्दितम् ॥ लौहे च लौहदण्डेन कुर्यादेतद्रसायनम् ॥ २९ ॥ भिलावेसे शुद्ध किया रससिन्दूर १ पल, लोहभस्म १ पल, तांवा- भस्म १ पल, भिलावेका चूर्ण १ पल, अभ्रकभस्म १ पल, गन्धक ४ पल, हरड़का चूर्ण २ कर्ष, बहेड़ेका चूर्ण २ कर्ष, आमले ६ तोले ८ मासे, घी ८ पल, त्रिफलेका क्वाथ ३२ पल, इनको एकत्र करके
भाषाटीकासहित । (४७१) पकावे । जब केवल ३२ पल जल बाकी रह जाय तब लोहपाकको जाननेवाला शास्त्रज्ञ वैद्य प्रथम रससिन्दूरसे लेकर गन्धक पर्यंत औषधियोंको त्रिफलेके क्वाथ और घृतके साथ लोहेके पात्रमें उत्तम रीतिसे पकावे । जब पाक समाप्त होजाय तब शीतल होनेपर त्रिफ- लेका चूर्ण डालकर उतार लेवे । पश्चात् रोगी गुरु, देवता और ब्राह्म- णोंकी पूजा करके प्रतिदिन प्रातःकाल शय्यासे उठकर एक एक रत्ती प्रतिदिन बढाकर घृत और सहतमें लोहेके डंडेसे लोहेके पात्रमें पीस- कर सेवन करे ॥ २६-२९ ॥ अनुपानञ्च कुर्वीत नारिकेलजलं पयः । सर्वकुष्ठहरं श्रेष्ठं वलीपलितनाशनम् । अग्निदीप्तिकरं हृद्यं कान्त्यायुर्बलवर्द्धनम् ॥ ३० ॥ सेव्यो रसों जांगललावकानां विवर्ज्य शाकाम्ल- मपि स्त्रियश्च । शाल्योदनं षष्टिकमाज्यमुद्गं क्षौद्रं गुडं क्षीरमिह क्रियायाम् ॥ ३१ ॥ इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें नारियलका जल और दूधको पीवे । यह उत्तम औषधि सब प्रकारके कुष्ठरोग और वली तथा पलित रोगोंको नष्ट करती है । अग्निको दीपन करती है, हृदयको हित- कारी और शरीरमें कांति, आयु और बलको बढ़ानेवाली है । इसके सेवन करनेपर जांगल प्रदेशके जीवोंका मांस, लवा पक्षीका मांस, शालि चावल और साठीके चावल, घी, मूंग, सहत, गुड़ और दूधका पथ्य देवे । तथा शाक, खटाई और स्त्रीसेवन इनको त्याग देवे । इसको अमृतांकुर लोह कहते हैं ॥ ३० ॥३१ ॥ माणिक्यरस । पलं तालं पलं गन्धं शिलायाश्च पलार्द्धकम् । चपलः शुद्धसीसञ्च ताम्रमभ्रमयोरजः ॥ ३२ ॥
( ४७२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । एतेषां कोलभागञ्च वटक्षीरेण मर्दयेत् । ततो दिनत्रयं घर्मे निम्बक्वाथेन भावयेत् ॥ ३३ ॥ गुडूचीवालहिन्तालवानरीनीलझिण्टिकाः । शोभाञ्जनमुराजाजीनिर्गुण्डीहयमारकम् ॥ ३४ ॥ एषां शाणमितं चूर्णमेकीकृत्य सरित्तटे । मृत्पात्रे कठिने कृत्वा मृदम्बरयुते दृढे ॥ ३५ ॥ एकाकी पाकविद्वैद्यो नग्नः शिथिलकुन्तलः । पचेदवहितो रात्रौ यत्नात्संयतमानसः ॥ ३६ ॥ शुद्ध हरिताल १ पल, शुद्ध गंधक १ पल, मैनशिल २ तोले, शुद्ध पारा, सीसाभस्म, तांबाभस्म, अभ्रकभस्म और लोहभस्म यह प्रत्येक औषधि आधा आधा तोला लेकर इन सब औषधियोंको एकत्र पीस- कर वडके दूधमें खरल करके नीमके क्वाथमें तीन दिनतक खरल करे । फिर उसमें गिलोय, सुगंधवाला, हिंताल, कौंचके बीज, नीली, कटसरैया, सहेंजनेके बीज, कपूरकचरी, जीरा, सम्हालू और कनेर इन प्रत्येक औषधिका चूर्ण चार चार मासे लेकर चूर्ण बनाकर नदीके तीरपर जाकर वहांसे कठिन मृत्तिका लेकर उसकी घडिया बनाकर उसमें इस औषधिको रखे और उसके ऊपर एक दूसरी घड़िया ढक देवे । दोनोंकी कपड़ौटी करके धूपमें सुखावे । इसके उपरान्त पाकको जाननेवाला विद्वान् वैद्य बालोंको और वस्त्रोंको खोल कर नग्न होकर रात्रिके समय चित्तको एकाग्र करके पकावे ॥ ३२-३६ ॥ तद्विजानीहि भेषज्यं सर्वकुष्ठविनाशनम् । सर्पिषा मधुना लौहपात्रे तद्दण्डमर्दितम् ॥ ३७ ॥ द्विगुञ्जं सर्वकुष्ठानां नाशनं बलवर्द्धनम् । शीतलं सारसं तोयं दुग्धं वा पाकशीतलम् ॥३८॥
भाषाटीकासहित । ( ४७३ ) आनीतं तत्क्षणादाजमनुपानं सुखावहम् । वातरक्तं शीतपित्तं हिक्कां च दारुणां जयेत् ॥ ३९ ॥ ज्वरान्सर्वान्वातरोगान्पांडुं कण्डूञ्च कामलाम् । श्रीमद्गहननाथेन निर्मितो बहुयत्नतः ॥ ४० ॥ जबतक कि पात्रकी तली अच्छे प्रकारसे लाल न होजाय तब- तक पकावे । जब पाक समाप्त होजाय तब शीतल होनेपर इसका चूर्ण करके दो रत्ती परिमाण लेकर घृत और सहतमें मिलाकर लोहेकी खर- लमें डालकर लोहेके डंडेसे खरल करे । इसको नित्य भक्षण करे । इससे सब प्रकारके कुष्ठ रोग नष्ट होकर बलकी वृद्धि होती है । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें सरोवरका शीतल जल, अथवा शृत शीतल दूधको पीवे । अथवा तत्काल बनाया हुआ बकरेका मांस भक्षण करे । इस औषधिके सेवन करनेसे वातरक्त, शीत- पित्त, दारुण हिक्का, सब प्रकारका ज्वर, वातरोग, पाण्डुरोग, कण्डू
( ४७४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्रत्येक औषधियोंका चूर्ण सोलह सोलह भाग, करंजके बीजोंका चूर्ण ६४ भाग और अभ्रक भस्म ६४ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर सहत और घृतमें मर्दन करके घीके चिकने बासनमें भरकर रख देवे । इसमेंसे प्रतिदिन २ निष्क परिमाण औषधि सेवन करे । इससे सब प्रकारके कुष्ठ और विशेष करके गलत्कुष्ठ नष्ट होते हैं। इसको कुष्ठकुठार रस कहते हैं। ( इस रसकी २ निष्ककी खुराक अधिक है; अधिकसे अधिक १।। मासे तककी खुराक देनी चाहिये)४१-४३॥ रसतालेश्वर रस । गुञ्जाशङ्खकरञ्चचूर्णरजनीभल्लातकाग्नेः शिखा, कन्यासूर्यपयः पुनर्नवरजो गन्धं तथा सूतकम् । गोमूत्रे पचितं विडङ्गमरिचैः क्षौद्रञ्च तत्तुल्यकं, हन्यादाशु विचर्चिकारुजमिदं कण्डूं तथाकैटिभम्॥४४ घुंघुचीके बीज, शंखकी भस्म, करंजके बीज, हलदी, भिलावे, कलि- हारी, घीकारका रस, आकका दूध, पुनर्नवा, गन्धक, पारा, वायविडंग और काली मिरच इन सब औषधियोंको एकत्र करके अठगुने गोमूत्रमें पकावे । पकनेपर सबके बराबर मधु मिलाकर रख दे । इसको प्रतिदिन यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे विचर्चिका, कण्डू और कैटिभ रोग नष्ट होते हैं ॥ ४४ ॥ • राजतालेश्वर रस । नागस्य भस्म शाणैकं तोलकं गन्ध१कस्य च । द्विनिष्कं शुद्धतालस्य समुद्भूतं गवां जलैः ॥ ४५ ॥ विपचेत्षोडशगुणैः पात्रे ताम्रमये शनैः । घर्मे द्विघस्रं जम्बीरकुमारीवज्रकन्दजैः ॥ ४६ ॥ रसैर्भृङ्गस्य चाम्भोभिर्युतं वल्लद्वयं भजेत् । १ 'पारदस्य' इत्यपि पाठोऽन्यत्रोपलभ्यते ।
भाषाटीकासहित । ( ४७५ ) कुष्ठे चास्थिगते चापि शाखानासाविभुग्नके ॥ स्वरभंगे क्षतक्षीणे मण्डलेषु महत्स्वपि ॥४७॥ सीसेकी भस्म ४ मासे, गंधक १ तोला और शुद्ध हरिताल ८ मासे लेवे, सबको एकत्र करके सोलह गुने गोमूत्रमें तांबेके पात्रमें डाल मंद मंद अग्निसे पकावे । पश्चात् जम्भीरी नींबूका रस, घीकारका रस और थूहरकी जड़के रसमें दो दिन तक खरल करके धूपमें सुखावे । इसमेंसे चार रत्ती परिमाण औषधि लेकर अस्थिगतकुष्ठ, हस्त, नासा- भंगरोग, स्वरभंग, क्षतक्षीण और मण्डलकुष्ठमें भांगरेके रसके द्वारा सेवन करे ॥ ४५-४७ ॥ औदुम्बरं हन्ति शिवामधुभ्यां कृच्छ्रञ्च कुष्ठं त्रिफलाजलेन । गुडार्द्रकाभ्यां गजचर्मसिध्म- विचर्चिकास्फोटविसर्पकण्डूम् ॥ ४८ ॥ निह- न्ति पाण्डुं विविधां विपादीं सरक्तपित्तं कटु- कासिताभ्याम् । खादेद्विजीरं ह्यमृतायुतञ्च समुद्गयूषं सघृतञ्च दद्यात् ॥ ४९ ॥ रोहितकजटाक्वाथमनुपानं प्रयच्छति । चतुर्दशदिनस्यान्ते कुष्ठं शुष्यति यत्नतः ॥ ५० ॥ क्षुद्बोधो जायतेऽत्यर्थमत्यर्थं सुभगं वपुः । वर्जयेत्सततं कुष्ठी मत्स्यमांसादिभोजनम् ॥ ५१ ॥ हरड़ और सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे उदुम्बर- कुष्ठ, त्रिफलेके क्वाथके साथ इसके सेवन करनेसे कष्टसाध्य कुष्ठरोग, गुड़ और अदरखके रसके साथ भक्षण करनेसे गजचर्म, सिध्म, विचर्चिका, विस्फोटक, विसर्प और कण्डू ये रोग नष्ट होते हैं । कुट- र्कीके चूर्ण और मिश्रीके साथ भक्षण करनेसे पाण्डु, विपादिका और रक्तपित्तरोग नष्ट होता है । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें जीरा