रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ४६५ ) अथ कुष्ठरोगचिकित्सा । कन्याकोटिप्रदानेन गङ्गायां पितृतर्पणे । विश्वेश्वरपुरीवासे तत्फलं कुष्ठनाशने ॥ १ ॥ गवां कोटिप्रदानेन अश्वमेधशतेन च । वृषोत्सर्गे च यत्पुण्यं तत्पुण्यं कुष्ठनाशने ॥ २ ॥ जो फल करोड़ कन्या प्रदान करनेसे होता है, जो फल गंगामें पितृ- तर्पण करनेसे होता है, जो फल काशीमें निवास करनेसे होता है, जो फल करोड़ गोदान करनेसे होता है, जो फल सौ अश्वमेध यज्ञ कर- नेसे होता है तथा जो पुण्य वृषोत्सर्ग करनेसे संचय होता है वही फल केवल एक कुष्ठरोगीको आरोग्य करनेमें होता है ॥ १ ॥ २ ॥ गलत्कुष्ठारि रस । रसो वलिस्ताम्रमयः पुरोऽग्निशिलाजतु स्याद्विष- तिन्दुकोग्रे । सर्वञ्च तुल्यं गगनं करञ्जबीजं तथा भागचतुष्टयञ्च ॥ ३ ॥ संमर्द्य गाढं मधुना घृतेन वल्लद्वयञ्चास्य निहन्त्यवश्यम् । कुष्ठं किलासं ह्यपि वातरक्तं जलोदरं वाथ विबद्धमूलम् । विशीर्णकर्णा- ङ्गुलिनासिकोऽपि भवेत्प्रसादात्स्मरतुल्यमूर्तिः ॥४॥ पारा, गन्धक, तांबाभस्म, लोहभस्म, गूगल, चित्रककी जड़, शिला- जीत, शुद्ध कुचले और वच यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, अभ्रक और करंजके बीज यह प्रत्येक चार चार भाग, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर थोड़ेसे घी और सहतमें सानकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे कुष्ठ, किलास, वातरक्त और बँधी हुई जड़वाला जलोदर रोग नष्ट हो जाता है । कुष्ठरोगमें जिस मनुष्यके कान, अंगुली और नासिका गल गई वह इस औषधिके प्रभावसे कामदेवके समान स्वरूपवान् होजाता है । इसको गलत्कुष्ठारि रस कहते हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥