रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
भाषाटीकासहित । ( ४६५ ) अथ कुष्ठरोगचिकित्सा । कन्याकोटिप्रदानेन गङ्गायां पितृतर्पणे । विश्वेश्वरपुरीवासे तत्फलं कुष्ठनाशने ॥ १ ॥ गवां कोटिप्रदानेन अश्वमेधशतेन च । वृषोत्सर्गे च यत्पुण्यं तत्पुण्यं कुष्ठनाशने ॥ २ ॥ जो फल करोड़ कन्या प्रदान करनेसे होता है, जो फल गंगामें पितृ- तर्पण करनेसे होता है, जो फल काशीमें निवास करनेसे होता है, जो फल करोड़ गोदान करनेसे होता है, जो फल सौ अश्वमेध यज्ञ कर- नेसे होता है तथा जो पुण्य वृषोत्सर्ग करनेसे संचय होता है वही फल केवल एक कुष्ठरोगीको आरोग्य करनेमें होता है ॥ १ ॥ २ ॥ गलत्कुष्ठारि रस । रसो वलिस्ताम्रमयः पुरोऽग्निशिलाजतु स्याद्विष- तिन्दुकोग्रे । सर्वञ्च तुल्यं गगनं करञ्जबीजं तथा भागचतुष्टयञ्च ॥ ३ ॥ संमर्द्य गाढं मधुना घृतेन वल्लद्वयञ्चास्य निहन्त्यवश्यम् । कुष्ठं किलासं ह्यपि वातरक्तं जलोदरं वाथ विबद्धमूलम् । विशीर्णकर्णा- ङ्गुलिनासिकोऽपि भवेत्प्रसादात्स्मरतुल्यमूर्तिः ॥४॥ पारा, गन्धक, तांबाभस्म, लोहभस्म, गूगल, चित्रककी जड़, शिला- जीत, शुद्ध कुचले और वच यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, अभ्रक और करंजके बीज यह प्रत्येक चार चार भाग, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर थोड़ेसे घी और सहतमें सानकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे कुष्ठ, किलास, वातरक्त और बँधी हुई जड़वाला जलोदर रोग नष्ट हो जाता है । कुष्ठरोगमें जिस मनुष्यके कान, अंगुली और नासिका गल गई वह इस औषधिके प्रभावसे कामदेवके समान स्वरूपवान् होजाता है । इसको गलत्कुष्ठारि रस कहते हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥
( ५६६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । उदयभास्कर । गन्धकेन मृतं ताम्रं दशभागं समुद्धरेत् । ऊषणं पञ्चभागं स्यादमृतञ्च द्विभागिकम् ॥ ५ ॥ सूक्ष्मचूर्णीकृतं सर्वं रक्तिकैकप्रमाणतः । दातव्यं कुष्ठिने सम्यगनुपानस्य योगतः ॥ ६ ॥ गलिते स्फुटिते चैव विषूच्यां मण्डले तथा । विचर्चिकादद्रुपामाकुष्ठरोगप्रशान्तये ॥ ७ ॥ गंधकसे मारा हुआ तांबा १० भाग, काली मिरच ५ भाग, विष २ भाग, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर जलमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इसको यथोचित अनुपानके साथ कुष्ठरोगीको देवे । गला हुआ और फूटा हुआ ऐसे कुष्ठरोगमें, विषू- चिकामें, मण्डलरोगमें और विचर्चिका, दद्रु, पामा इत्यादि कुष्ठ रोगोंमें इस औषधिका प्रयोग करे । इसको उदयभास्कर रस कहते हैं॥५-७॥ तालकेश्वर रस । धात्रीटंकणतालानां दशभागं समुद्धरेत् । धात्र्या रसैर्मर्दयित्वा शिखरीमूलवारिणा ॥ सर्वकुष्ठहरः सेव्यः सर्वदा भोजनप्रियः ॥ ८ ॥ आमला, सुहागा और हरिताल यह प्रत्येक औषधि दश तोले लेकर सबको एकत्र पीसकर आमले और चिरचिटेके रसमें खरल करके गोली बना लेवे । इसके सेवन करनेसे कुष्ठ रोग नष्ट होता है ॥८॥ ब्रह्म रस । भागैकं मूर्च्छितं सूतं गन्धकं त्वथवागुजी । चूर्णन्तु ब्रह्मबीजानां प्रतिद्वादशभागिकम् ॥ ९ ॥ त्रिंशद्भागं गुडस्यापि क्षौद्रेण गुटिका कृता । अयं ब्रह्मरसो नाम्ना ब्रह्महत्यादिनाशनः ॥ १० ॥
भाषाटीकासहित । ( ४६७ ) द्विनिष्कं भक्षणाद्धन्ति प्रसुतिकुष्ठमण्डलम् । पातालगरुडीमूलं जलैः पिष्ट्वा पिबेदनु ॥ ११ ॥ मूर्च्छित पारा १ भाग, गंधक, चित्रककी जड़, बावचीके बीज और ढाकके बीज यह प्रत्येक द्वादश ( बारह १२ ) भाग और पुराना गुड़ ३० भाग, इन सब औषधियोंको एकत्र सहतमें पीसकर आठ आठ मासेकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे ब्रह्म- हत्यादिजन्य प्रसुतिरोग और मण्डल कुष्ठ नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेके बाद पातालगरुडी (छिरहिंटा) की जड़को जलमें पीसकर सेवन करे । इसको ब्रह्मरस कहते हैं ॥ ९-११ ॥ चन्द्रानन रस । सूतव्योमाग्नयस्तुल्यास्त्रिभागो गन्धकस्य च । काठोडुम्बरिकाक्षीरैः सर्वमेकत्र मर्दयेत् ॥ १२ ॥ माषमात्रां गुटीं कृत्वा कुष्ठरोगे प्रयोजयेत् । देहशुद्धिं पुरा कृत्वा सर्वकुष्ठानि नाशयेत् ॥ एष चन्द्राननो नाम साक्षाच्छ्रीभैरवोदितः ॥ १३ ॥ शुद्ध पारा, अभ्रकभस्म और चित्रक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और गन्धक ३ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र कठूमरके दूधमें पीसकर एक एक मासेकी गोली बना लेवे । प्रथम वमन और विरेचनके द्वारा शरीरको शुद्ध करके कुष्ठरोगमें इस औषधिका प्रयोग करे । इससे सब प्रकारके कुष्ठ रोग नष्ट होते हैं । इस चन्द्रानन रसको श्रीभैरवजीने कहा है ॥ १२ ॥ १३ ॥ कुष्ठकालानल रस । गन्धं रसं टङ्कणताम्रलोहं भस्मीकृतं मागधिकासमेतम् । पञ्चाङ्गनिम्बेन फलत्रिकेन विभावितं राजतरोस्तथैव ॥ नियोजयेद्वल्लकयुग्ममानं कुष्ठेषु सर्वेषु च रोगसंघे १४॥
( ४६८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । गंधक, पारा, सुहागा, तांबाभस्म, लोहभस्म और पीपल इन सबको समान भाग लेकर नींवके पञ्चांगके रसमें सात वार, त्रिफलेके रसमें सात वार और अमलतासके क्वाथमें सात वार भावना देकर चार चार रत्ती परिमाण औषधिका कुष्ठरोग और अन्यान्य समस्त रोगोंमें प्रयोग करे । इसको कुष्ठकालानल रस कहते हैं ॥ १४ ॥ वज्रवटी । शुद्धसूताग्निमरिचं सूताद्द्विगुणगन्धकम् । काठोडुम्बरिकाक्षीरैर्दिनं मर्द्यं प्रयत्नतः ॥ १५ ॥ वराव्योषकषायेण वटीञ्चास्य समाचरेत् । लिह्याद्वज्रवटी ह्येषा पामारोगविनाशिनी ॥ १६ ॥ शुद्ध पारा और चित्रककी जड़, मरिच यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, गंधक २ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके कठूमरके दूधमें एक दिनतक खरल करे । पश्चात् त्रिफला और त्रिकुटेके क्वाथमें खरल करके यथोचित मात्रानुसार गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे पामा रोग नष्ट होता है । इसको वज्रवटी कहते हैं ॥१५॥१६॥ चन्द्रकान्त रस । पलत्रयं मृतं ताम्रं सूतमेकं द्विगन्धकम् । त्रिकटुत्रिफलाचूर्णं प्रत्येकञ्च पलं पलम् ॥ १७ ॥ निर्गुण्ड्याश्चार्द्रकद्रावैर्वह्निद्रावैर्विमर्दयेत् । दिनैकं तद्विशोष्याथ तुषाग्नौ स्वेदयेद्दिनम् ॥ १८ ॥ समुद्धृत्य विचूर्ण्याथ वागुजीतैलमर्दितम् । त्रिदिनं भावयेत्तेन निष्कैकं भक्षयेत्सदा ॥ १९ ॥ चन्द्रकान्तरसो नाम्ना कुष्ठं हन्ति न संशयः । तैलं करञ्जबीजोत्थं वह्निगन्धकसैन्धवैः ॥ अनुपानं प्रकर्त्तव्यं कल्कं वा वागुजीभवम् ॥ २० ॥
भाषाटीकासहित । ( ४६९ ) तांबेकी भस्म ३ पल, पारा १ पल, गंधक २ पल, त्रिकुटा ३ पल और त्रिफला ३ पल लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके सम्हा- लूके पत्तोंके रस, अदरखके रस और चित्रककी जड़के रसमें खरल करके सूर्यकी धूपमें एक दिन सुखाकर मूषामें रखे, पश्चात् तुषोंकी अग्निमें मूषाको रखकर पकावे । जब अपने आप शीतल होजाय तब बारीक पीसकर चूर्ण कर लेवे । फिर उस चूर्णको बावचीके तेलमें खरल करके उसी तेलमें ३ दिन भावना देवे । इसमेंसे प्रतिदिन चार मासे औषधि सेवन करनेसे अवश्य कुष्ठ रोग नष्ट होता है । इसके सेवन करनेके पश्चात् करंजके तेलमें पिसी हुई चित्रककी जड़, गन्धक और सेंधानमक अथवा बावचीके कल्कको भक्षण करे। इसको चन्द्रकान्त रस कहते हैं ॥ १७-२० ॥ सङ्कोच रस । मृतताम्राभ्रकं तुल्यं तयोः सूतश्चतुर्गुणम् । शुद्धं तन्मर्दयेत्खल्ले गोलकं कारयेत्ततः ॥ २१ ॥ त्रिभिस्तुल्यं शुद्धगन्धं लोहपात्रे क्षणं पचेत् । तन्मध्ये गोलकं पाच्यं यावज्जीर्णं तु गन्धकम्॥२२॥ एतन्मृद्वग्निना तावत्समुद्धृत्य विचूर्णयेत् । गुग्गुलुंनिम्बपञ्चाङ्गं त्रिफला चामृता विषम् ॥ २३ ॥ पटोलं खादिरं सारं व्याधिघातं समं समम् । चूर्णितं मधुना लेह्यं निष्कमौदुम्बरापहम् ॥ रसः संकोचनामायं कुष्ठे परमदुर्लभः ॥ २४ ॥ तांबेकी भस्म १ भाग, अभ्रककी भस्म १ भाग, शुद्ध पारा ८ भाग इन तीनों औषधियोंको एकत्र पीसकर गोलासा बना लेवे । फिर उसमें दश भाग गन्धक मिलाकर लोहेके पात्रमें डालकर पकावे । जबतक गन्धक जीर्ण न होजाय तबतक इसको मन्द मन्द अग्निसे
( ४७० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पकावे । फिर शीतल होनेपर इसका चूर्ण करके फिर इसमें एक भाग गूगल, नीमके पत्तोंका चूर्ण १ भाग, नीमकी छालका चूर्ण १ भाग, नीमके फूलोंका चूर्ण १ भाग, नीमके बीजोंका तेल, नीमकी जड़का चूर्ण १ भाग, त्रिफलेका चूर्ण ३ भाग, गिलोयका चूर्ण १ भाग, विषका चूर्ण १ भाग, पटोलपत्रका चूर्ण १ भाग, खैरसारका चूर्ण १ भाग और अमलतासका चूर्ण १ भाग मिलाकर एक उत्तम पात्रमें भरकर रख देवे । इसमेंसे चार मासे औषधि सहतमें मिलाकर सेवन करे तो उदुम्बरकुष्ठ नष्ट होता है । यह संकोचरस कुष्ठ रोगमें अतीव हितकारी है ॥ २१-२४ ॥ अमृतांकुर लोह । हुताशमुखसंशुद्धं पलमेकं रसस्य वै । पलं लौहस्य ताम्रस्य पलं भल्लातकस्य च ॥ २५ ॥ अभ्रकस्य पलञ्चैकं गन्धकस्य चतुःपलम् । हरीतकीविभीतक्योश्चूर्णं कर्षद्वयं द्वयोः ॥ २६ ॥ अष्टमात्राधिकं तत्र धात्र्याः पाणितलानि षट् । घृतं चाष्टगुणं लौहाद्द्वात्रिंशत्त्रिफलाजलम् ॥ २७ ॥ एकीकृत्य पचेत्पात्रे लौहे च विधिपूर्वकम् । पाकमेवास्य जानीयाच्छास्त्रज्ञो लौहपाकवित् ॥ २८ ॥ भक्षयेत्प्रातरुत्थाय गुरुदेवद्विजार्च्चकः । रक्तिकादिक्रमेणैव घृतभ्रामरमर्द्दितम् ॥ लौहे च लौहदण्डेन कुर्यादेतद्रसायनम् ॥ २९ ॥ भिलावेसे शुद्ध किया रससिन्दूर १ पल, लोहभस्म १ पल, तांवा- भस्म १ पल, भिलावेका चूर्ण १ पल, अभ्रकभस्म १ पल, गन्धक ४ पल, हरड़का चूर्ण २ कर्ष, बहेड़ेका चूर्ण २ कर्ष, आमले ६ तोले ८ मासे, घी ८ पल, त्रिफलेका क्वाथ ३२ पल, इनको एकत्र करके
भाषाटीकासहित । (४७१) पकावे । जब केवल ३२ पल जल बाकी रह जाय तब लोहपाकको जाननेवाला शास्त्रज्ञ वैद्य प्रथम रससिन्दूरसे लेकर गन्धक पर्यंत औषधियोंको त्रिफलेके क्वाथ और घृतके साथ लोहेके पात्रमें उत्तम रीतिसे पकावे । जब पाक समाप्त होजाय तब शीतल होनेपर त्रिफ- लेका चूर्ण डालकर उतार लेवे । पश्चात् रोगी गुरु, देवता और ब्राह्म- णोंकी पूजा करके प्रतिदिन प्रातःकाल शय्यासे उठकर एक एक रत्ती प्रतिदिन बढाकर घृत और सहतमें लोहेके डंडेसे लोहेके पात्रमें पीस- कर सेवन करे ॥ २६-२९ ॥ अनुपानञ्च कुर्वीत नारिकेलजलं पयः । सर्वकुष्ठहरं श्रेष्ठं वलीपलितनाशनम् । अग्निदीप्तिकरं हृद्यं कान्त्यायुर्बलवर्द्धनम् ॥ ३० ॥ सेव्यो रसों जांगललावकानां विवर्ज्य शाकाम्ल- मपि स्त्रियश्च । शाल्योदनं षष्टिकमाज्यमुद्गं क्षौद्रं गुडं क्षीरमिह क्रियायाम् ॥ ३१ ॥ इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें नारियलका जल और दूधको पीवे । यह उत्तम औषधि सब प्रकारके कुष्ठरोग और वली तथा पलित रोगोंको नष्ट करती है । अग्निको दीपन करती है, हृदयको हित- कारी और शरीरमें कांति, आयु और बलको बढ़ानेवाली है । इसके सेवन करनेपर जांगल प्रदेशके जीवोंका मांस, लवा पक्षीका मांस, शालि चावल और साठीके चावल, घी, मूंग, सहत, गुड़ और दूधका पथ्य देवे । तथा शाक, खटाई और स्त्रीसेवन इनको त्याग देवे । इसको अमृतांकुर लोह कहते हैं ॥ ३० ॥३१ ॥ माणिक्यरस । पलं तालं पलं गन्धं शिलायाश्च पलार्द्धकम् । चपलः शुद्धसीसञ्च ताम्रमभ्रमयोरजः ॥ ३२ ॥
( ४७२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । एतेषां कोलभागञ्च वटक्षीरेण मर्दयेत् । ततो दिनत्रयं घर्मे निम्बक्वाथेन भावयेत् ॥ ३३ ॥ गुडूचीवालहिन्तालवानरीनीलझिण्टिकाः । शोभाञ्जनमुराजाजीनिर्गुण्डीहयमारकम् ॥ ३४ ॥ एषां शाणमितं चूर्णमेकीकृत्य सरित्तटे । मृत्पात्रे कठिने कृत्वा मृदम्बरयुते दृढे ॥ ३५ ॥ एकाकी पाकविद्वैद्यो नग्नः शिथिलकुन्तलः । पचेदवहितो रात्रौ यत्नात्संयतमानसः ॥ ३६ ॥ शुद्ध हरिताल १ पल, शुद्ध गंधक १ पल, मैनशिल २ तोले, शुद्ध पारा, सीसाभस्म, तांबाभस्म, अभ्रकभस्म और लोहभस्म यह प्रत्येक औषधि आधा आधा तोला लेकर इन सब औषधियोंको एकत्र पीस- कर वडके दूधमें खरल करके नीमके क्वाथमें तीन दिनतक खरल करे । फिर उसमें गिलोय, सुगंधवाला, हिंताल, कौंचके बीज, नीली, कटसरैया, सहेंजनेके बीज, कपूरकचरी, जीरा, सम्हालू और कनेर इन प्रत्येक औषधिका चूर्ण चार चार मासे लेकर चूर्ण बनाकर नदीके तीरपर जाकर वहांसे कठिन मृत्तिका लेकर उसकी घडिया बनाकर उसमें इस औषधिको रखे और उसके ऊपर एक दूसरी घड़िया ढक देवे । दोनोंकी कपड़ौटी करके धूपमें सुखावे । इसके उपरान्त पाकको जाननेवाला विद्वान् वैद्य बालोंको और वस्त्रोंको खोल कर नग्न होकर रात्रिके समय चित्तको एकाग्र करके पकावे ॥ ३२-३६ ॥ तद्विजानीहि भेषज्यं सर्वकुष्ठविनाशनम् । सर्पिषा मधुना लौहपात्रे तद्दण्डमर्दितम् ॥ ३७ ॥ द्विगुञ्जं सर्वकुष्ठानां नाशनं बलवर्द्धनम् । शीतलं सारसं तोयं दुग्धं वा पाकशीतलम् ॥३८॥
भाषाटीकासहित । ( ४७३ ) आनीतं तत्क्षणादाजमनुपानं सुखावहम् । वातरक्तं शीतपित्तं हिक्कां च दारुणां जयेत् ॥ ३९ ॥ ज्वरान्सर्वान्वातरोगान्पांडुं कण्डूञ्च कामलाम् । श्रीमद्गहननाथेन निर्मितो बहुयत्नतः ॥ ४० ॥ जबतक कि पात्रकी तली अच्छे प्रकारसे लाल न होजाय तब- तक पकावे । जब पाक समाप्त होजाय तब शीतल होनेपर इसका चूर्ण करके दो रत्ती परिमाण लेकर घृत और सहतमें मिलाकर लोहेकी खर- लमें डालकर लोहेके डंडेसे खरल करे । इसको नित्य भक्षण करे । इससे सब प्रकारके कुष्ठ रोग नष्ट होकर बलकी वृद्धि होती है । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें सरोवरका शीतल जल, अथवा शृत शीतल दूधको पीवे । अथवा तत्काल बनाया हुआ बकरेका मांस भक्षण करे । इस औषधिके सेवन करनेसे वातरक्त, शीत- पित्त, दारुण हिक्का, सब प्रकारका ज्वर, वातरोग, पाण्डुरोग, कण्डू
( ४७४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्रत्येक औषधियोंका चूर्ण सोलह सोलह भाग, करंजके बीजोंका चूर्ण ६४ भाग और अभ्रक भस्म ६४ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर सहत और घृतमें मर्दन करके घीके चिकने बासनमें भरकर रख देवे । इसमेंसे प्रतिदिन २ निष्क परिमाण औषधि सेवन करे । इससे सब प्रकारके कुष्ठ और विशेष करके गलत्कुष्ठ नष्ट होते हैं। इसको कुष्ठकुठार रस कहते हैं। ( इस रसकी २ निष्ककी खुराक अधिक है; अधिकसे अधिक १।। मासे तककी खुराक देनी चाहिये)४१-४३॥ रसतालेश्वर रस । गुञ्जाशङ्खकरञ्चचूर्णरजनीभल्लातकाग्नेः शिखा, कन्यासूर्यपयः पुनर्नवरजो गन्धं तथा सूतकम् । गोमूत्रे पचितं विडङ्गमरिचैः क्षौद्रञ्च तत्तुल्यकं, हन्यादाशु विचर्चिकारुजमिदं कण्डूं तथाकैटिभम्॥४४ घुंघुचीके बीज, शंखकी भस्म, करंजके बीज, हलदी, भिलावे, कलि- हारी, घीकारका रस, आकका दूध, पुनर्नवा, गन्धक, पारा, वायविडंग और काली मिरच इन सब औषधियोंको एकत्र करके अठगुने गोमूत्रमें पकावे । पकनेपर सबके बराबर मधु मिलाकर रख दे । इसको प्रतिदिन यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे विचर्चिका, कण्डू और कैटिभ रोग नष्ट होते हैं ॥ ४४ ॥ • राजतालेश्वर रस । नागस्य भस्म शाणैकं तोलकं गन्ध१कस्य च । द्विनिष्कं शुद्धतालस्य समुद्भूतं गवां जलैः ॥ ४५ ॥ विपचेत्षोडशगुणैः पात्रे ताम्रमये शनैः । घर्मे द्विघस्रं जम्बीरकुमारीवज्रकन्दजैः ॥ ४६ ॥ रसैर्भृङ्गस्य चाम्भोभिर्युतं वल्लद्वयं भजेत् । १ 'पारदस्य' इत्यपि पाठोऽन्यत्रोपलभ्यते ।
भाषाटीकासहित । ( ४७५ ) कुष्ठे चास्थिगते चापि शाखानासाविभुग्नके ॥ स्वरभंगे क्षतक्षीणे मण्डलेषु महत्स्वपि ॥४७॥ सीसेकी भस्म ४ मासे, गंधक १ तोला और शुद्ध हरिताल ८ मासे लेवे, सबको एकत्र करके सोलह गुने गोमूत्रमें तांबेके पात्रमें डाल मंद मंद अग्निसे पकावे । पश्चात् जम्भीरी नींबूका रस, घीकारका रस और थूहरकी जड़के रसमें दो दिन तक खरल करके धूपमें सुखावे । इसमेंसे चार रत्ती परिमाण औषधि लेकर अस्थिगतकुष्ठ, हस्त, नासा- भंगरोग, स्वरभंग, क्षतक्षीण और मण्डलकुष्ठमें भांगरेके रसके द्वारा सेवन करे ॥ ४५-४७ ॥ औदुम्बरं हन्ति शिवामधुभ्यां कृच्छ्रञ्च कुष्ठं त्रिफलाजलेन । गुडार्द्रकाभ्यां गजचर्मसिध्म- विचर्चिकास्फोटविसर्पकण्डूम् ॥ ४८ ॥ निह- न्ति पाण्डुं विविधां विपादीं सरक्तपित्तं कटु- कासिताभ्याम् । खादेद्विजीरं ह्यमृतायुतञ्च समुद्गयूषं सघृतञ्च दद्यात् ॥ ४९ ॥ रोहितकजटाक्वाथमनुपानं प्रयच्छति । चतुर्दशदिनस्यान्ते कुष्ठं शुष्यति यत्नतः ॥ ५० ॥ क्षुद्बोधो जायतेऽत्यर्थमत्यर्थं सुभगं वपुः । वर्जयेत्सततं कुष्ठी मत्स्यमांसादिभोजनम् ॥ ५१ ॥ हरड़ और सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे उदुम्बर- कुष्ठ, त्रिफलेके क्वाथके साथ इसके सेवन करनेसे कष्टसाध्य कुष्ठरोग, गुड़ और अदरखके रसके साथ भक्षण करनेसे गजचर्म, सिध्म, विचर्चिका, विस्फोटक, विसर्प और कण्डू ये रोग नष्ट होते हैं । कुट- र्कीके चूर्ण और मिश्रीके साथ भक्षण करनेसे पाण्डु, विपादिका और रक्तपित्तरोग नष्ट होता है । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें जीरा
( ४७६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । और काला जीरा डालकर गिलोयका क्वाथ, घृतमिश्रित मूंगका यूष और रोहिड़ेकी जड़के क्वाथको पीवे । चौदह दिनतक इस औषधिके सेवन करनेसे कुष्ठरोग नष्ट होता है । अत्यन्त क्षुधा लगती है और शरीर अत्यन्त सुन्दर हो जाता है । इसपर कुष्ठरोगी सदैव मछली और मांस आदिके भोजनको त्याग देवे ॥ ४८-५१ ॥ कुष्ठहारितालेश्वर रस । हरितालं भवेद्भागं द्वादशात्र विशुद्धिमत् । गन्धकोऽपि तथा ग्राह्यो रसः सप्तात्र दीयते ॥ ५२ ॥ कृष्णाभ्रकमपि श्लक्ष्णं खल्ले कृत्वा विमर्दयेत् । अंकोलमूलनीरेण सेहुण्डीपयसाथवा ॥ ५३ ॥ अर्कदुग्धेन संपिष्य करवीरजलेन च ॥ काठोदुम्बरनीरेण पेषणीयो रसो भृशम् ॥ ५४ ॥ शुद्धताम्रकटोरे च क्षेपणीयो रसेश्वरः । पञ्चगुञ्जाप्रमाणेन काठोदुम्बरवारिणा ॥ ५५ ॥ कुष्ठाष्टादशसंख्येषु देय एष भिषग्वरैः । अचिरेणैव कालेन विनाशं यान्ति निश्चयात् ५६॥ पथ्यसेवा विधातव्या प्रणतिः सूर्यपादयोः । साधकेन तथा सेव्यो रसो रोगौघनाशनः ॥ पिप्पलीभिः समं दद्यात्कुष्ठरोगे रसेश्वरम् ॥ ५७ ॥ शुद्ध हरिताल १२ भाग, गन्धक १२ भाग, शुद्ध पारा ७ भाग और कृष्णाभ्रकभस्म ७ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर अंकोलकी जड़के रस, थूहरके दूध, आकके दूध, कनेरके रस और कठूमरके रसमें अलग २ भावना देकर और अच्छे प्रकारसे खरल करके गोलासा बना लेवे । पश्चात् शुद्ध तांबेकी एक उत्तम घड़िया बनवाकर उस घड़ियामें इस गोलेको रखकर छः प्रहरतक
भाषाटीकासहित । ( ४७७ ) पुटपाककी विधिसे पकावे। जब शीतल होजाय तब इसका चूर्ण करले । इसमेंसे पांच रत्ती परिमाण औषधि लेकर कठूमरके रसमें मिलाकर अष्टादश प्रकारके कुष्ठ रोगोंमें प्रयोग करे । इस औषधिके सेवन करनेसे सब प्रकारके कुष्ठ अल्पकालमें ही नष्ट होते हैं। सूर्यकी उपा- सना करनेवाला मनुष्य सूर्यकी वन्दना करके कुष्ठकुलनाशक इस औषधिका सेवन करे । इसको पीपलके चूर्णके साथ कुष्ठरोगमें प्रयुक्त करे । इसको कुष्ठहरितालेश्वर रस कहते हैं ॥ ५२-५७ ॥ राजराजेश्वर रस । त्रिफला खादिरं सारममृता वागुजीफलम् । आतपे मर्दयेत्सूतं गन्धकं मृतताम्रकम् ॥ ५८ ॥ सुहस्तमर्दितं तालं यावत्तत्र विलीयते । भृंगराजद्रवं दत्त्वा दिनमात्रं विमर्दयेत् ॥ ५९ ॥ प्रत्येकं सूततुल्यं स्याच्चूर्णीकृत्य विमर्दयेत् । मध्वाज्याभ्यां लौहपात्रे कर्षाभ्यां भक्षयेत्ततः ॥६०॥ दद्रूकिटिभकुष्ठानि मण्डलानि विनाशयेत् । द्विगुञ्जोऽपि निहन्त्याशु राजराजेश्वरो रसः ॥ ६१॥ शुद्ध पारा, गन्धक, तांबेकी भस्म और हरितालभस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर धूपमें रखकर भांगरेके रसमें एक दिनतक खरल करे । पश्चात् त्रिफला, खैरसार, गिलोय और बावचीके बीज इन प्रत्येक औषधियोंको पारेकी बराबर लेकर एकत्र मिला लेवे । एक कर्ष परिमाण घृत और सहतके साथ इस औषधिमेंसे दो रत्ती लेकर लोहेके पात्रमें मिलाकर सेवन करनेसे दद्रु, किटिभकुष्ठ और मण्डलकुष्ठ नष्ट होते हैं । इसको राजराजेश्वर रस कहते हैं ॥ ५८-६१ ॥
( ४७८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पारिभद्र रस । मूर्च्छितं सूतकं धात्रीफलं निम्बस्य चाहरेत् । तुल्यांशं खदिरक्वाथैर्दिनं मर्घञ्च भक्षयेत् ॥ निष्कैकं दद्रुकुष्ठघ्नः पारिभद्राह्वयो रसः ॥ ६२ ॥ रससिन्दूर, आमले और नीमके फलकी मींगी इन तीनों औषधि- योंको समान भाग लेकर खैरके क्वाथमें एक दिनतक खरल करके चार मासे परिमाण औषधि सेवन करनेसे दद्रु और कुष्ठरोग नष्ट होते हैं। इसको पारिभद्र रस कहते हैं ॥ ६२ ॥ सिध्महर लेप । गन्धकं मूलकक्षारमार्द्रकस्य रसैर्दिनम् । मर्दितं हन्ति लेपेन सिध्मन्तु दिनमेकतः ॥ ६३ ॥ गन्धक और मूलीके खारको समान भाग लेकर अदरखके रसमें एक दिनतक खरल करके सिध्मके ऊपर प्रलेप करनेसे एक दिनमें सिध्मकुष्ठ नष्ट होता है ॥ ६३ ॥ कृष्णधुस्तूरजं मूलं गन्धतुल्यं विचूर्णयेत् । मर्द्यं जम्बीरनीरेण लेपनं सिध्मनाशनम् ॥ ६४ ॥ काले धत्तूरेकी जड़का चूर्ण और गन्धकका चूर्ण दोनोंको बराबर भाग लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके प्रलेप करनेसे सिध्मकुष्ठ नष्ट होता है ॥ ६४ ॥ अपामार्गस्य पञ्चाङ्गं कदलीद्रवसंयुक्तम् । पुटदग्धञ्च गोमूत्रैर्लेपनं दद्रुनाशनम् ॥ ६५ ॥ चिराचिटेके पञ्चांगको समान भाग लेकर केलेकी जड़के रसमें पासकर मूषामें रखे, फिर उसको बंद करके पुटपाकमें पकावे; पश्चात् गोमूत्रमें पीसकर प्रलेप करनेसे दद्रु रोग नष्ट होता है ॥ ६५ ॥
भाषाटीकासहित । (४७९) चक्रमर्दादि लेप । चक्रमर्दस्य बीजञ्च दुग्धे पिष्ट्वा विमर्दयेत् । गन्धर्वतैलसंयुक्तं मर्दनात्सर्वकुष्ठजित् ॥ ६६ ॥ पनवाड़के बीजोंको दूधमें पीसकर अरंडीके तेलमें मिलाकर कुष्ठ स्थानोंपर लेप करनेसे सब प्रकारके कुष्ठ नष्ट होते हैं ॥ ६६ ॥ लङ्केश्वर रस । भस्मसूताभ्रशुल्वानि गन्धं तालं शिलाजतु । अम्लवेतस्य तुल्यांशं त्र्यहं दत्त्वा विमर्दयेत् ॥६७॥ मध्वाज्याभ्यां वटीं कुर्याद्द्विगुञ्जां भक्षयेत्सदा । कुष्ठं हन्ति गजं सिंहो रसो लंकेश्वरो महान् ॥ ६८ ॥ त्रिफलानिम्बमञ्जिष्ठावचापाटलमूलकम् । कटुकारजनीक्वाथं चानुपानं प्रयोजयेत् ॥ ६९ ॥ रससिन्दूर या पारदभस्म, अभ्रकभस्म, तांबाभस्म, गंधक, हरि- ताल और शिलाजीत तथा अमलवेत इन सब औषधियोंको बराबर भाग लेकर घृत और शहदमें तीन दिनतक खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बनाकर सेवन करे । बड़े बड़े हस्तियोंके समान कुष्ठको दूर करनेके लिये यह औषधि सिंहके समान है । इसके सेवन कर- नेके पीछे त्रिफला, नीमकी छाल, मँजीठ, वच, पाढलकी जड़, कुटकी और हलदीके क्वाथको पान करे। इसको लंकेश्वर रस कहते हैं ॥६७-६९॥ भूतभैरव रस । शुद्धं पञ्चदशात्रतालकमितं शुद्धञ्च यद्गन्धकः, सप्ताष्टौ नव तिन्तिडीयकफलात्काठिल्लकानां दश । सेहुण्डार्कपयोभिरेव सततं संचूर्ण्य तद्भाव्यते, रोहीतस्य जटारसेन मृदितं श्लक्ष्णं ततः खल्लितम् ७०
( ४८० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । एकीकृत्य समस्तमेतदपि तद्वैकमेतज्जयेत्, पश्चाद्वासविशुद्धवारिसहितं किञ्चिच्च तत्पीयते । ताम्बूलं शशिखण्डमण्डितवटीमिश्रं ततः स्वापये- च्छय्यायां शुभकर्मधर्मसहितः कर्माणि सम्पादयेत् ७१ शुद्ध हरिताल १५ भाग, शुद्ध गन्धक १५ भाग, नवीन इमली ९ भाग और कैथ १० भाग इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर थूह- रके दूध और आकके दूधमें अलग अलग खरल करके भावना देवे । फिर उसे रोहिड़ेकी जड़के क्वाथमें मर्दन करके सबको एकत्र खरलकर वस्त्रसे छानकर रख लेवे और वस्त्रसे छने हुए स्वच्छ जलके साथ इस औषधिको यथायोग्य मात्रासे सेवन करे। इस औषाधिके भक्षण करनेके पश्चात् कपूर मिलाकर पान खाय और बिछाई हुई उत्तम शय्यापर शयन करे और शुद्ध धर्म कर्म सेवन करे ॥ ७० ॥ ७१ ॥ देहं वीक्ष्य सुखं मुखं न विरसं विज्ञाय सम्यक् सुधी- श्छागीदुग्धमिहैतदेवमुदितं तक्रञ्च तत्पाययेत् । नित्यं शान्तमिदं करोति नियतं सर्वौषधैर्वर्जितं, सामग्रामसमग्रमग्रिमतरं नीलञ्च पीतारुणम् ॥७२॥ श्वेतं स्फीतमनल्पकं भृशमतिप्रायः क्रिमिव्याकुलं, गन्धालिप्रमितं स्फटीकसदृशं कुष्ठञ्च चोत्साधनम् । कुष्ठाष्टादश भूतभैरव इति ख्यातः क्षितौ हन्ति च, वातव्याधिनिकृन्तनः कफकृतान्कुष्ठान्विशेषानयम्॥ हन्तीति ज्वरमुग्ररूपमधिकं दाहाभिधानामयं, कुर्याद्रूपमनङ्गरङ्गगुणभृद्भृङ्गास्पदं विग्रहम् ॥ ७३ ॥ तथा देहबलादि देखकर बकरीका दूध और तक्रादि सेवन करे । इसके सेवनसे सब प्रकारके बढ़े हुए नील, पीत, रक्त, श्वेत आदि कुष्ठ
भाषाटीकासहित । ( ४८१ ) गलितकुष्ठ, कृमियोंसे व्याप्त और दुर्गन्धयुक्त कुष्ठ शांत होते हैं । तथा यह भूतभैरव रस अठारह प्रकारके कुष्ठ, वातरक्तादि वातव्याधि, कफ- जनित कुष्ठ और दाहयुक्त उग्ररूपवाले ज्वरोंको दूर करता है । इसके सेवनसे कामदेवके समान रूप और हाथीके समान बल उत्पन्न होता है और शरीर निरोग होता है ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ एवं समासात्कुरुते समानं पथ्यञ्च तथ्यं सकलं करोति । भुञ्जीत भुक्तं सततं प्रदिष्टं घृतं घृतं वा विकृतं तदेव॥७४ स्वच्छन्ददुग्धेन सुखेन जग्धं पथ्यं तदैतत्प्रवदन्ति सन्तः। कुष्ठस्यदुष्टस्यनिराकरोति गात्रञ्च कुर्याच्छुभगन्धयुक्तम् इसके सेवन करते समय घृतका और घृतयुक्त पदार्थोंका विशेष सेवन करना चाहिये, अथवा निरन्तर दुग्धका सेवन करना चाहिये । यह रस दुष्ट कुष्ठको दूर करके शरीरको सुन्दर और सुगन्धयुक्त करता है ॥ ७४ ॥ ७५ ॥ अर्केश्वर रस । पलानीशस्य चत्वारि बलेर्द्वादश तावती । ताम्रस्य चक्रिका देया रसस्योर्ध्वं शरावकम्॥ ७६ ॥ दत्त्वा विबद्धभाण्डस्थं पूरयेद्भस्मना दृढम् । अग्निं प्रज्वालयेद्यामद्वयं शीतं विचूर्णयेत् ॥ ७७ ॥ पुटेद् द्वादशधा सूर्यदुग्धेनालोडितं पुनः । वरापावकभृङ्गानां द्रवैस्त्रिर्विभावयेत् ॥ अयमर्केश्वरो नाम्ना रक्तमण्डलकुष्ठजित् ॥ ७८ ॥ शुद्ध पारा ४ पल,गन्धक १२ पल लेकर कज्जली करके एक हाँड़ीमें यह कज्जली आधी नीचे बिछाकर ताम्रपत्र १२ पल उसके ऊपर रखकर बाकी बची हुई आधी कज्जलीको ताम्रपत्रोंके ऊपर डालकर
( ४८२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । औषधिके ऊपर हांड़ीके भीतर एक सिकोरा ढककर राखसे हांड़ीको भर देवे; फिर दो प्रहरतक अग्निसे पकावे । जब अपने आप शीतल होजावे तो इसका चूर्ण कर लेवे । फिर आकके दूधमें इसको पीसकर पुटमें पकावे । इस प्रकार बारह बार पुट करके त्रिफला, चित्रक और भांगरेके रसमें अलग अलग तीन तीन भावना दे । यथोचित मात्रानु- सार यथोचित अनुपानके साथ इसके सेवन करनेसे वातरक्त और मण्डलकुष्ठ नष्ट होता है । इसको अर्केश्वर रस कहते हैं ॥ ७६-७८ ॥ महातालेश्वर रस । तालताप्यशिलासूतं शुद्धटङ्गणसैन्धवम् । समं संचूर्णयेत्खल्ले सूताद्विगुणगन्धकम् ॥ ७९ ॥ गन्धतुल्यं मृतं ताम्रं लौहभस्म चतुःपलम् । जंबीराम्लेन तत्सर्वं दिनं मर्द्यं पुटेल्लघु ॥ ८० ॥ त्रिंशदंशं विषञ्चात्र क्षिप्त्वा सर्वं विचूर्णयेत् । माहिषाज्येन संमिश्रं निष्कार्द्धं भक्षयेत्सदा ॥ ८१ ॥ मध्वाज्यैर्वांगुजीचूर्णं कर्षमात्रं लिहेदनु । सर्वान्कुष्ठान्निहन्त्याशु महातालेश्वरो रसः ॥ ८२ ॥ हरितालभस्म, सोनामाखीभस्म, मैनशिल, पारा, सेंधानमक और सुहागा यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले लेवे, गन्धक ८ तोले, ताम्रभस्म ८ तोले और लोहेका चूर्ण १६ तोले लेवे । इन सब औष- धियोंको एकत्र पीसकर जम्भीरी नींबूके रसमें एक दिनतक खरल करके लघुपुटमें पकावे । पश्चात् समस्त औषधियोंका ३० तीसवां भाग विष मिलाकर सबको एकत्र पीसकर चूर्ण कर लेवे । इसमेंसे दो मासे औषधि लेकर भैंसके घीके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेके अन्तमें बावचीका चूर्ण १ कर्ष परिमाण लेकर सहत और घृतमें मिला- कर चाटे । इसके सेवन करनेसे सब प्रकारके कुष्ठरोग नष्ट होते हैं । इसको महातालेश्वर रस कहते हैं ॥ ७९-८२ ॥
भाषाटीकासहित । (४८३) विजयभैरव रस। सप्तकञ्चुकनिर्मुक्तमूर्द्ध्वलग्नं रसेन्द्रकम् । मृत्कटाहान्तरे तत्र स्थापयेच्च समन्त्रकम् ॥ ८३ ॥ सूताद्विगुणितं तालं कूष्माण्डद्रवशोधितम् । दोलायन्त्रेण तैलादौ सप्तधा परिशोधितम् ॥ ८४॥ दत्त्वा प्लवैर्द्रवैर्झिण्ट्याः किञ्चिदाप्लाव्य युक्तितः । तयोर्द्विगुणितं भस्म पलाशस्योपरि क्षिपेत् ॥८५॥ पुनार्झिण्टीद्रवेणैव सर्वमाप्लाव्य यत्नतः । खाखशाकरसैर्भूयः परिप्लाव्य च पाकवित् ॥ ८६ ॥ पचेदवहितो वैद्यः सालाङ्गारेण यत्नतः । चतुर्विंशतियामन्तु पक्त्वा शीतलतां नयेत् ॥ अवतार्य काचपात्रे निधाय तदनन्तरम् ॥ ८७ ॥ सप्तकंचुकीरहित पारेको लेकर ऊर्ध्व पातनयंत्रमें पातन करके अघोर मंत्रको पढ़कर मिट्टीकी हांडीमें स्थापन करे । पश्चात् पेठेका रस, कांजी, तिलोंका तेल और त्रिफलेके रसके द्वारा दोलायंत्रमें सात बार शुद्ध की हुई हरिताल पारेसे दुगुनी लेकर उपरोक्त हांडीमें स्थापन करे । फिर केवटीमोथेका रस और कटसरैयाका रस, हरिताल और पारेके बीचमें डालकर और उसके ऊपर हरिताल और पारेसे दोगुना ढाकका खार डालकर फिर दुबारा कटसरैया (पियावांसा) के रस और अफीमके बीजों ( पोस्त ) के रसमें डुबोकर पाकको जाननेवाला वैद्य चौबीस प्रहरतक शालकी लकड़ीकी अग्निसे पकावे । शीतल होनेपर चूर्ण करके कांचकी शीशीमें भरके रख देवे ॥ ८३-८७ ॥ प्रयत्नेन कृतप्रायश्चित्तः शोधितदेहकः । सिताहरीतकीयुक्तं खादेद्रक्तिचतुष्टयम् ॥ ८८ ॥
( ४८४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । रक्तिकैकक्रमेणैव वर्द्धयेद्दिनसप्तकम् । मधूदकं पिबेच्चानु नारिकेलजलञ्च वा ॥ ८९ ॥ जिङ्गिनीसम्भवं क्वाथमथवा क्षौद्रनागरम् । सुगन्धितैलैरभ्यङ्गं कुर्यात्ताम्बूलचर्वणम् ॥ ९० ॥ पवनानलसूर्यांशुमत्स्यमांसदधीनि च । शाकं ककारपूर्वञ्च वर्जयेन्मतिमान्नरः ॥ ९१ ॥ वातरक्तमाममिश्रमामञ्चापि सुदारुणम् । सर्वकुष्ठञ्चाम्लपित्तं विस्फोटञ्च मसूरिकाम् ॥ विजयाख्यो रसो नाम्ना हन्ति दोषानसृग्दरान्॥९२॥ पश्चात् यत्नपूर्वक प्रायश्चित्त करके और वमन विरेचनादिके द्वारा शरीरको शुद्ध करके मिश्री और हरड़के साथ इस औषधिको चार रत्ती परिमाण सेवन करे । यह औषधि पहिले दिन चार रत्ती और दूसरे दिन पांच रत्ती, इस प्रकार प्रतिदिन एक एक रत्ती बढ़ाकर सात दिन- तक सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेके पीछे सहत मिला हुआ जल, नारियलका जल, जिंगिनीका क्वाथ, सहत समेत सोंठका चूर्ण इनमेंसे एक किसी अनुपानका सेवन करे । तथा शरीरमें सुगंधित तेलकी मालिश और पानको भक्षण करे । इसपर पवन, अग्नि और सूर्यकी धूपको नहीं सेवन करे । मछली, मांस, दही, शाक और सम्पूर्ण ककारादिनामवाले पदार्थोंको त्याग देवे । इस औषधिके सेवन करनेसे आमसहित दारुण वातरक्त, आमजनित रोग, सर्व प्रकारके कुष्ठ, अम्लपित्त, विस्फोटक, मसूरिका और रक्तप्रदररोग नष्ट होते हैं। इसको विजयभैरव रस कहते हैं ॥ ८८-९२ ॥ कुष्ठारि रस । काठोदुम्बरिकाचूर्णं ब्रह्मदन्तीबलात्रयम् । प्रत्यहं मधुना लीढं वातरक्तं निहन्ति च ॥ ९३ ॥