रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४७२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । एतेषां कोलभागञ्च वटक्षीरेण मर्दयेत् । ततो दिनत्रयं घर्मे निम्बक्वाथेन भावयेत् ॥ ३३ ॥ गुडूचीवालहिन्तालवानरीनीलझिण्टिकाः । शोभाञ्जनमुराजाजीनिर्गुण्डीहयमारकम् ॥ ३४ ॥ एषां शाणमितं चूर्णमेकीकृत्य सरित्तटे । मृत्पात्रे कठिने कृत्वा मृदम्बरयुते दृढे ॥ ३५ ॥ एकाकी पाकविद्वैद्यो नग्नः शिथिलकुन्तलः । पचेदवहितो रात्रौ यत्नात्संयतमानसः ॥ ३६ ॥ शुद्ध हरिताल १ पल, शुद्ध गंधक १ पल, मैनशिल २ तोले, शुद्ध पारा, सीसाभस्म, तांबाभस्म, अभ्रकभस्म और लोहभस्म यह प्रत्येक औषधि आधा आधा तोला लेकर इन सब औषधियोंको एकत्र पीस- कर वडके दूधमें खरल करके नीमके क्वाथमें तीन दिनतक खरल करे । फिर उसमें गिलोय, सुगंधवाला, हिंताल, कौंचके बीज, नीली, कटसरैया, सहेंजनेके बीज, कपूरकचरी, जीरा, सम्हालू और कनेर इन प्रत्येक औषधिका चूर्ण चार चार मासे लेकर चूर्ण बनाकर नदीके तीरपर जाकर वहांसे कठिन मृत्तिका लेकर उसकी घडिया बनाकर उसमें इस औषधिको रखे और उसके ऊपर एक दूसरी घड़िया ढक देवे । दोनोंकी कपड़ौटी करके धूपमें सुखावे । इसके उपरान्त पाकको जाननेवाला विद्वान् वैद्य बालोंको और वस्त्रोंको खोल कर नग्न होकर रात्रिके समय चित्तको एकाग्र करके पकावे ॥ ३२-३६ ॥ तद्विजानीहि भेषज्यं सर्वकुष्ठविनाशनम् । सर्पिषा मधुना लौहपात्रे तद्दण्डमर्दितम् ॥ ३७ ॥ द्विगुञ्जं सर्वकुष्ठानां नाशनं बलवर्द्धनम् । शीतलं सारसं तोयं दुग्धं वा पाकशीतलम् ॥३८॥