रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ४७३ ) आनीतं तत्क्षणादाजमनुपानं सुखावहम् । वातरक्तं शीतपित्तं हिक्कां च दारुणां जयेत् ॥ ३९ ॥ ज्वरान्सर्वान्वातरोगान्पांडुं कण्डूञ्च कामलाम् । श्रीमद्गहननाथेन निर्मितो बहुयत्नतः ॥ ४० ॥ जबतक कि पात्रकी तली अच्छे प्रकारसे लाल न होजाय तब- तक पकावे । जब पाक समाप्त होजाय तब शीतल होनेपर इसका चूर्ण करके दो रत्ती परिमाण लेकर घृत और सहतमें मिलाकर लोहेकी खर- लमें डालकर लोहेके डंडेसे खरल करे । इसको नित्य भक्षण करे । इससे सब प्रकारके कुष्ठ रोग नष्ट होकर बलकी वृद्धि होती है । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें सरोवरका शीतल जल, अथवा शृत शीतल दूधको पीवे । अथवा तत्काल बनाया हुआ बकरेका मांस भक्षण करे । इस औषधिके सेवन करनेसे वातरक्त, शीत- पित्त, दारुण हिक्का, सब प्रकारका ज्वर, वातरोग, पाण्डुरोग, कण्डू