भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ४७४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्रत्येक औषधियोंका चूर्ण सोलह सोलह भाग, करंजके बीजोंका चूर्ण ६४ भाग और अभ्रक भस्म ६४ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर सहत और घृतमें मर्दन करके घीके चिकने बासनमें भरकर रख देवे । इसमेंसे प्रतिदिन २ निष्क परिमाण औषधि सेवन करे । इससे सब प्रकारके कुष्ठ और विशेष करके गलत्कुष्ठ नष्ट होते हैं। इसको कुष्ठकुठार रस कहते हैं। ( इस रसकी २ निष्ककी खुराक अधिक है; अधिकसे अधिक १।। मासे तककी खुराक देनी चाहिये)४१-४३॥ रसतालेश्वर रस । गुञ्जाशङ्खकरञ्चचूर्णरजनीभल्लातकाग्नेः शिखा, कन्यासूर्यपयः पुनर्नवरजो गन्धं तथा सूतकम् । गोमूत्रे पचितं विडङ्गमरिचैः क्षौद्रञ्च तत्तुल्यकं, हन्यादाशु विचर्चिकारुजमिदं कण्डूं तथाकैटिभम्॥४४ घुंघुचीके बीज, शंखकी भस्म, करंजके बीज, हलदी, भिलावे, कलि- हारी, घीकारका रस, आकका दूध, पुनर्नवा, गन्धक, पारा, वायविडंग और काली मिरच इन सब औषधियोंको एकत्र करके अठगुने गोमूत्रमें पकावे । पकनेपर सबके बराबर मधु मिलाकर रख दे । इसको प्रतिदिन यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे विचर्चिका, कण्डू और कैटिभ रोग नष्ट होते हैं ॥ ४४ ॥ • राजतालेश्वर रस । नागस्य भस्म शाणैकं तोलकं गन्ध१कस्य च । द्विनिष्कं शुद्धतालस्य समुद्भूतं गवां जलैः ॥ ४५ ॥ विपचेत्षोडशगुणैः पात्रे ताम्रमये शनैः । घर्मे द्विघस्रं जम्बीरकुमारीवज्रकन्दजैः ॥ ४६ ॥ रसैर्भृङ्गस्य चाम्भोभिर्युतं वल्लद्वयं भजेत् । १ 'पारदस्य' इत्यपि पाठोऽन्यत्रोपलभ्यते ।