भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । (४७१) पकावे । जब केवल ३२ पल जल बाकी रह जाय तब लोहपाकको जाननेवाला शास्त्रज्ञ वैद्य प्रथम रससिन्दूरसे लेकर गन्धक पर्यंत औषधियोंको त्रिफलेके क्वाथ और घृतके साथ लोहेके पात्रमें उत्तम रीतिसे पकावे । जब पाक समाप्त होजाय तब शीतल होनेपर त्रिफ- लेका चूर्ण डालकर उतार लेवे । पश्चात् रोगी गुरु, देवता और ब्राह्म- णोंकी पूजा करके प्रतिदिन प्रातःकाल शय्यासे उठकर एक एक रत्ती प्रतिदिन बढाकर घृत और सहतमें लोहेके डंडेसे लोहेके पात्रमें पीस- कर सेवन करे ॥ २६-२९ ॥ अनुपानञ्च कुर्वीत नारिकेलजलं पयः । सर्वकुष्ठहरं श्रेष्ठं वलीपलितनाशनम् । अग्निदीप्तिकरं हृद्यं कान्त्यायुर्बलवर्द्धनम् ॥ ३० ॥ सेव्यो रसों जांगललावकानां विवर्ज्य शाकाम्ल- मपि स्त्रियश्च । शाल्योदनं षष्टिकमाज्यमुद्गं क्षौद्रं गुडं क्षीरमिह क्रियायाम् ॥ ३१ ॥ इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें नारियलका जल और दूधको पीवे । यह उत्तम औषधि सब प्रकारके कुष्ठरोग और वली तथा पलित रोगोंको नष्ट करती है । अग्निको दीपन करती है, हृदयको हित- कारी और शरीरमें कांति, आयु और बलको बढ़ानेवाली है । इसके सेवन करनेपर जांगल प्रदेशके जीवोंका मांस, लवा पक्षीका मांस, शालि चावल और साठीके चावल, घी, मूंग, सहत, गुड़ और दूधका पथ्य देवे । तथा शाक, खटाई और स्त्रीसेवन इनको त्याग देवे । इसको अमृतांकुर लोह कहते हैं ॥ ३० ॥३१ ॥ माणिक्यरस । पलं तालं पलं गन्धं शिलायाश्च पलार्द्धकम् । चपलः शुद्धसीसञ्च ताम्रमभ्रमयोरजः ॥ ३२ ॥