रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४८४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । रक्तिकैकक्रमेणैव वर्द्धयेद्दिनसप्तकम् । मधूदकं पिबेच्चानु नारिकेलजलञ्च वा ॥ ८९ ॥ जिङ्गिनीसम्भवं क्वाथमथवा क्षौद्रनागरम् । सुगन्धितैलैरभ्यङ्गं कुर्यात्ताम्बूलचर्वणम् ॥ ९० ॥ पवनानलसूर्यांशुमत्स्यमांसदधीनि च । शाकं ककारपूर्वञ्च वर्जयेन्मतिमान्नरः ॥ ९१ ॥ वातरक्तमाममिश्रमामञ्चापि सुदारुणम् । सर्वकुष्ठञ्चाम्लपित्तं विस्फोटञ्च मसूरिकाम् ॥ विजयाख्यो रसो नाम्ना हन्ति दोषानसृग्दरान्॥९२॥ पश्चात् यत्नपूर्वक प्रायश्चित्त करके और वमन विरेचनादिके द्वारा शरीरको शुद्ध करके मिश्री और हरड़के साथ इस औषधिको चार रत्ती परिमाण सेवन करे । यह औषधि पहिले दिन चार रत्ती और दूसरे दिन पांच रत्ती, इस प्रकार प्रतिदिन एक एक रत्ती बढ़ाकर सात दिन- तक सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेके पीछे सहत मिला हुआ जल, नारियलका जल, जिंगिनीका क्वाथ, सहत समेत सोंठका चूर्ण इनमेंसे एक किसी अनुपानका सेवन करे । तथा शरीरमें सुगंधित तेलकी मालिश और पानको भक्षण करे । इसपर पवन, अग्नि और सूर्यकी धूपको नहीं सेवन करे । मछली, मांस, दही, शाक और सम्पूर्ण ककारादिनामवाले पदार्थोंको त्याग देवे । इस औषधिके सेवन करनेसे आमसहित दारुण वातरक्त, आमजनित रोग, सर्व प्रकारके कुष्ठ, अम्लपित्त, विस्फोटक, मसूरिका और रक्तप्रदररोग नष्ट होते हैं। इसको विजयभैरव रस कहते हैं ॥ ८८-९२ ॥ कुष्ठारि रस । काठोदुम्बरिकाचूर्णं ब्रह्मदन्तीबलात्रयम् । प्रत्यहं मधुना लीढं वातरक्तं निहन्ति च ॥ ९३ ॥