भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( ४९५ ) क्षरद्रक्तञ्चरन्मांसं मासमात्रेण सर्वथा । गलत्पूयं पतत्कीटं त्रिटङ्कं सेव्यमीरितम् ॥ ९४ ॥ कठूमरका चूर्ण, भारंगीका चूर्ण, दन्ती, खिरैंटीका चूर्ण, कंवीका चूर्ण और गंगेरनका चूर्ण यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर सबको सहतमें मिलाकर एक तोला परिमाण सेवन करे तो चालितरक्त और पतितमांसयुक्त वातरक्त और गलित पूय तथा पतित कृमियुक्त कुष्ठ- रोग एक महीनेमें नष्ट होते हैं ॥ ९३ ॥ ९४ ॥ षडाननगुटिका । विषोषणं टङ्कणपारदञ्च सगन्धचूर्णञ्च समांशयुक्तम् । जैपालचूर्णं द्विगुणं गुडान्वितं संमर्द्य सर्वं गुटिका विधेया ॥९५॥ विरेचनी सर्वविकारनाशिनी लघ्वी हिता दीपनपाचनीयम् । कुष्ठे हिता तीव्रतरे हि शूले चामाशये चर्मगते विकारे । संशोधनी शीतजलेन सम्यक्संग्राहिणी चोष्णजलेत युक्ता ९६॥ विष, काली मिरच, सुहागा, शुद्ध पारा, गंधक यह प्रत्येक औषधि समान भाग और सबसे दुगुना जमालगोटा लेवे और दुगना ही गुड़ लेकर एकत्र पीसकर गोली बना लेवे। यह औषधि विरेचन करनेवाली, सब रोगाको हरनेवाली, हलकी, हितकारी, अग्निप्रदीपक, पाचक और कुष्ठरोगनाशक है । अत्यन्त बढ़े हुए शूल, आमाशयगत रोग और चर्मगतरोगमें अत्यन्त हितकारी है। शीतल जलके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे विरेचन होकर शरीर शुद्ध होजाता है। और गरम जलके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे मलका अवरोध होता है । इसको षडाननगुटिका कहते हैं ॥ ९५ ॥ ९६ ॥ कुष्ठनाशन रस । चिरिबिल्वपत्रपथ्याशिरीषञ्च विभीतकम् । काठोडुम्बरिकामूलं मूत्रैरालोड्य फेणितम् ॥ ९७ ॥