रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(४८६) रसेन्द्रसारसंग्रह । कर्षमात्रं पिबेद्रोगी गोस्तन्या सह टङ्कणम् । सप्तसप्तकपर्यन्तं सर्व्वकुष्ठविनाशनम् ॥ ९८ ॥ करंजके पत्ते, हरड़, सिरसके बीज, बहेड़ा और कठूमरकी जड़ इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर चूर्ण करके गोमूत्रमें डालकर खूब झकोले; जब झाग उठने लगे तब इसमें बराबर भाग दाख और सुहागा मिलाकर एक तोला परिमाण सेवन करे । सात सप्ताह पर्यंत इस औष- धिके सेवन करनेसे सब प्रकारके कुष्ठ नष्ट होते हैं ॥ ९७ ॥ ९८ ॥ विजयानन्द रस । अथ श्वित्रस्य वक्ष्यामि नाशनोपायमुत्तमम् । शुद्धसूतस्य भागैकं द्विभागं शुद्धतालकम् ॥९९॥ मृत्कटाहान्तरे पूर्वं स्थापयेच्च समन्त्रकम् । द्वयोः समं पलाशस्य भस्म तस्योपरि क्षिपेत् १०० वक्त्रं मृत्कर्पटे लिप्त्वा शोषयेच्च खरातपे । चतुर्विंशतियामन्तु पक्त्वा शीतलतां नयेत् ॥१०१॥ अवतार्य काचपात्रे स्थापयेदतियत्नतः । विधिवत्सेवितश्चासौ हन्ति श्वित्रं चिरंतनम् ॥१०२॥ सर्वकुष्ठं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा । रसोऽयं श्वित्रनाशाय ब्रह्मणा निर्मितः पुरा ॥ विजयानन्दनामायं निगूढः क्षितिमण्डले ॥१०३॥ अब श्वित्रकुष्ठको नष्ट करनेवाला उत्तम उपाय कहता हूं-शुद्ध पारा १ भाग और शुद्ध हरिताल २ भाग दोनोंको एकत्र पीसकर एक हांडीमें रखे और रखते समय अघोरमंत्रका पाठ करे । पश्चात् पारे और हरि- तालकी बराबर ढाकका खार लेकर उसके ऊपर हांडीमें भर देवे और ऊपरसे एक नवीन सिकोरेसे हांडीके मुखको बंद कर देवे । ऊपरसे