रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (४८७) अच्छे प्रकार कपडमिट्टी करके प्रचण्ड सूर्यकी धूपमें सुखावे । पश्चात् इसको चौबीस प्रहरतक अग्निके संयोगसे पकावे । जब अपने आप शीतल होजाय तब पीसकर चूर्ण बना लेवे । इसको उत्तम शीशीमें भरकर रख देवे । इस औषधिको विधिपूर्वक सेवन करनेसे बहुत दिनोंका पुराना श्वित्ररोग नष्ट होता है। जिसप्रकार सूर्योदयसे अंधकारका समूह नष्ट होता है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे सब प्रकारके कुष्ठरोग नष्ट होते हैं। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने श्वित्रकुष्ठको दूर करनेके लिये यह औषधि कही है। इसको विजयानन्द रस कहते हैं ॥९९-१०३ श्वित्रदद्रुपाटला लेप । अश्वाहा रजनीहेम प्रत्यक्पुष्पीं प्रदह्य च । चूर्णञ्च स्वार्जिकाक्षारं नीरं दत्त्वा प्रपेषयेत् ॥१०४॥ प्रस्थयित्वा ततः स्थानं मण्डलाग्रेण लिम्पति । पाटलानि पतन्त्यङ्गे विफोटाश्चातिदारुणाः ॥१०५॥ सम्भवंति तिला रक्ताः कृष्णवर्णा भवन्ति ते । मिलन्ति स्वशरीरे च दिव्यरूपो भवेन्नरः ॥१०६॥ कनेर, हल्दी, धतूरेके पत्ते और चिरचिटा इन सबकी भस्म या खार, तथा चूना (कलई) और सज्जी यह सब औषधि समान भाग लेकर जलमें पीसकर श्वित्र स्थानोंमें प्रलेप करे । प्रलेप करते समय श्वित्र- कुष्ठके दागोंको नखादिसे खुरच देवे । प्रथम यह औषधि श्वित्रस्थानके पाटलवर्णको दूर करती है, पश्चात् श्वित्रस्थानोंमें दारुण विस्फोटकोंको उत्पन्न करके फिर उन लाल रंगके चित्रविचित्रित छोटे तिलकी बरा- बर दागोंको उत्पन्न करती है, फिर धीरे धीरे श्वित्रका स्थान काला होकर शरीरके वर्णकी माफिक वर्णवाला होजाता है ॥ १०४-१०६॥ श्वित्रहर लेप । सैन्धवं रविदुग्धेन पेषयित्वाथ मण्डलम् । प्रस्थयित्वा प्रलेपोऽयं श्वित्रकुष्ठविनाशनः॥१०७॥