भारतकोश
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रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

भाषाटीकासहित । (४८७) अच्छे प्रकार कपडमिट्टी करके प्रचण्ड सूर्यकी धूपमें सुखावे । पश्चात् इसको चौबीस प्रहरतक अग्निके संयोगसे पकावे । जब अपने आप शीतल होजाय तब पीसकर चूर्ण बना लेवे । इसको उत्तम शीशीमें भरकर रख देवे । इस औषधिको विधिपूर्वक सेवन करनेसे बहुत दिनोंका पुराना श्वित्ररोग नष्ट होता है। जिसप्रकार सूर्योदयसे अंधकारका समूह नष्ट होता है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे सब प्रकारके कुष्ठरोग नष्ट होते हैं। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने श्वित्रकुष्ठको दूर करनेके लिये यह औषधि कही है। इसको विजयानन्द रस कहते हैं ॥९९-१०३ श्वित्रदद्रुपाटला लेप । अश्वाहा रजनीहेम प्रत्यक्पुष्पीं प्रदह्य च । चूर्णञ्च स्वार्जिकाक्षारं नीरं दत्त्वा प्रपेषयेत् ॥१०४॥ प्रस्थयित्वा ततः स्थानं मण्डलाग्रेण लिम्पति । पाटलानि पतन्त्यङ्गे विफोटाश्चातिदारुणाः ॥१०५॥ सम्भवंति तिला रक्ताः कृष्णवर्णा भवन्ति ते । मिलन्ति स्वशरीरे च दिव्यरूपो भवेन्नरः ॥१०६॥ कनेर, हल्दी, धतूरेके पत्ते और चिरचिटा इन सबकी भस्म या खार, तथा चूना (कलई) और सज्जी यह सब औषधि समान भाग लेकर जलमें पीसकर श्वित्र स्थानोंमें प्रलेप करे । प्रलेप करते समय श्वित्र- कुष्ठके दागोंको नखादिसे खुरच देवे । प्रथम यह औषधि श्वित्रस्थानके पाटलवर्णको दूर करती है, पश्चात् श्वित्रस्थानोंमें दारुण विस्फोटकोंको उत्पन्न करके फिर उन लाल रंगके चित्रविचित्रित छोटे तिलकी बरा- बर दागोंको उत्पन्न करती है, फिर धीरे धीरे श्वित्रका स्थान काला होकर शरीरके वर्णकी माफिक वर्णवाला होजाता है ॥ १०४-१०६॥ श्वित्रहर लेप । सैन्धवं रविदुग्धेन पेषयित्वाथ मण्डलम् । प्रस्थयित्वा प्रलेपोऽयं श्वित्रकुष्ठविनाशनः॥१०७॥

( ४८८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सेंधेनमकको आकके दूधमें पीसकर श्वित्रके स्थानोंको नखादिसे खुरचकर इस औषधिका प्रलेप कर देवे । इससे श्वित्र कुष्ठ और कुष्ठ रोग नष्ट होता है । इसको श्वित्रहर लेप कहते हैं ॥ १०७ ॥ ओष्ठश्वित्रनाशन लेप । मुखे श्वेते च संजातेत्विमां कुर्यात्प्रतिक्रियाम् । गन्धकं चित्रकाशीशं हरितालं फलत्रयम् ॥ मुखे लिम्पेद्दिनैकेन वर्णनाशो भविष्यति ॥ १०८ ॥ जो मुख अथवा ओष्ठपर श्वित्ररोग उत्पन्न होवे तो उसकी इस प्रकार चिकित्सा करे । गंधक, चित्रककी जड़, हीराकसीस, हरिताल, हरड़, बहेड़ा और आमला इन सबको एकत्र चूर्ण बनाकर जलमें पीसकर मुखपर लेप करे तो मुखके ऊपरके सफेद दाग एक दिनमें नष्ट हो जाते हैं ॥ १०८ ॥ गुञ्जाफलाग्निचूर्णञ्च लेपनं श्वेतकुष्ठजित् । शिलापामार्गभस्मापि लिप्त्वा श्वित्रं विनाशयेत्॥१०९॥ घुंघुचीका चूर्ण और चित्रककी जड़के चूर्णको कुष्ठस्थानपर लेप करनेसे श्वेतकुष्ठरोग नष्ट होता है । अथवा मैनाशीलके चूर्ण और चिरचिटेके खार को एकत्र मिलाकर श्वित्रके स्थानोंपर लेप करनेसे श्वित्रकुष्ठ नष्ट होता है ॥ १०९ ॥ रसमाणिक्य । तालकं वंशपत्राख्यं कूष्माण्डसलिले क्षिपेत् । सप्तधा वा त्रिधा वापि दधाम्लेन च वा पुनः॥११०॥ शोधयित्वा पुनः शुष्कं चूर्णयेत्तण्डुलाकृति । ततः शरावके पात्रे स्थापयेत्कुशलो भिषक् ॥१११॥

भाषाटीकासहित। ( ४८९ ) बदरीपत्रकल्केन सन्धिलेपञ्च कारयेत् । अरुणाभमधःपात्रं तावज्ज्वाला प्रदीयते ॥ ११२ ॥ स्वाङ्गशीतं समुद्धृत्य माणिक्याभो भवेद्रसः । तद्रक्तिद्वितयं खादेद् घृतभ्रामरमर्द्दितम् ॥११३॥ संपूज्य देवदेवेशं कुष्ठरोगाद्विमुच्यते । स्फुटितं गलितं कुष्ठं वातरक्तं भगन्दरम् ॥ ११४ ॥ नाडीव्रणं व्रणं दुष्टमुपदंशं विचर्चिकाम् । नासास्यसंभवान्रोगान्क्षतान्हन्ति सुदारुणान् ॥ पुण्डरीकं चर्मदलं विस्फोटं मण्डलं तथा ॥ ११५ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे कुष्ठाधिकारः । वर्की हरितालको पेठेके रसमें, दहीमें और कांजीमें सात सात वार; अथवा तीन तीन वार दोलायंत्रमें पकाकर उत्तम विधिसे सुखा लेवे । फिर चावलोंके समान चूर्ण करके एक शराव सिकोरेमें रखकर उप- रसे एक दूसरे सिकोरेसे ढककर उसके जोड़ोंको अच्छे प्रकारसे बेरीके पत्तोंके कल्कसे बंद कर देवे । पश्चात् आरने उपलोंकी अग्निमें इसको पकावे । जबतक पात्रका रंग अच्छे प्रकारसे लाल न हो जाय तबतक पकावे । शीतल होनेपर इस माणिक्यकी समान औषधिको लेकर भक्तिपूर्वक महादेवकी पूजा करके दो रत्ती परिमाण औषधि सहत और घृतमें मिलाकर सेवन करे । इससे अवश्य कुष्ठरोग नष्ट होता है । इसके सेवन करनेसे फटा हुआ और गलता हुआ कुष्ठ, वातरक्त, भगन्दर, नाडीव्रण, दुष्टव्रण, उपदंश, विचर्चिका, मुख और नासिकागत दारुण क्षतरोग, पुण्डरीक, चर्मदल, विस्फोटक और मण्डलकुष्ठ नष्ट होते हैं। इसको माणिक्य रस कहते हैं॥ ११०-११५॥ इति कुष्ठाधिकार समाप्त ।

( ४९० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ शीतपित्तोदर्दकोष्ठाधिकारः । यमानीगुडसंमिश्रः सूतभस्मद्विवल्लभः । शीतपित्तं निहन्त्याशु कटुतैलविलेपनम् ॥ १ ॥ चार रत्ती रससिन्दूरको अजवायन और गुड़के साथ सेवन करे और शरीरपर कड़वे तेलकी मालिश करे तो शीतपित्तरोग नष्ट होता है ॥ १ ॥ सिद्धार्थरजनीकल्कं प्रपुन्नाडतिलैः सह । कटुतैलेन संमिश्रमेतदुद्वर्त्तनं हितम् ॥ २ ॥ सरसों, हलदी, चकवड़ और तिल इन सबको एकत्र पीसकर कड़वे तेलमें मिलाकर शरीरपर मर्दन करे तो शीतपित्तरोग नष्ट होते हैं ॥ २ ॥ दूर्वानिशायुतो लेपः कण्डूपामाविनाशनः । क्रिमिदद्रुहरश्चैव शीतपित्तहरः परः ॥ ३ ॥ दूबकी जड़ और हलदी इन दोनोंको एकत्र पीसकर प्रलेप करनेसे कण्डू, पामा, क्रिमि, दद्रू और शीतपित्तरोग नष्ट होता है ॥ ३ ॥ कुष्ठोक्ताञ्च क्रियां कुर्यात्सर्वां युक्त्या चिकित्सकः । शीतपित्ते तथोदर्दे कोष्ठे चैव समासतः ॥ ४ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे शीतपित्तोदर्दकोष्ठाधिकारः । जो चिकित्सा कुष्ठरोगकी कही है वही सब चिकित्सा युक्ति- पूर्वक संक्षेपसे शीतपित्त, उदर्द और कोटरोगमें भी प्रयुक्त करनी चाहिये ॥ ४ ॥ इति शीतपित्तोदर्दकोष्ठचिकित्सा समाप्त ।

भाषाटीकासहित । ( ४९१ ) अथ अम्लपित्तरोगचिकित्सा । अम्लपित्तान्तक रस । मृतसूताभ्रलोहानां तुल्यां पथ्यां विमर्दयेत् । माषमात्रं लिहेत्क्षौद्रैरम्लपित्तप्रशान्तये ॥ १ ॥ रससिन्दूर या पारदभस्म, अभ्रकभस्म और लोहभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और हरड़ ३ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके एक एक मासे सहतके साथ खावे तो अम्लपित्त- रोग नष्ट होता है । इसको अम्लपित्तान्तक रस कहते हैं ॥ १ ॥ लीलाविलास रस । रसो बलिव्र्योम रविश्च लौहं धात्र्यक्षनीरैस्त्रिदिनं विमर्द्य । तदल्पघृष्टं मृदुमार्कवेण संमर्दयेदस्य च वल्लयुग्मम् ॥२॥ हन्त्यम्लपित्तं मधुनावलीढं लीलाविलासो रसराज एषः। छर्दिं सशूलं हृदयस्य दाहं निवारयेदेष न संशयोऽस्ति३ शुद्ध पारा, गंधक, अभ्रकभस्म, ताम्रभस्म और लोहभस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर आमलोंके और बहेड़ेके क्वाथमें तीन दिन- तक भावना देवे । फिर कोमल भांगरेके रसमें दुबारा खरल करके चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । सहतके साथ इन गोलियोंके सेवन करनेसे अम्लपित, वमन, शूल और हृदयकी दाह दूर होती है । इसको लीलाविलास रस कहते हैं ॥ २ ॥ ३ ॥ पानीयभक्तवटिका । त्रिवृता मुस्तकं चैव त्रिफला त्र्यूषणन्तथा । प्रत्येकन्तु पलं भागं तदर्धौ रसगन्धकौ ॥ ४ ॥ लौहाभ्रकविडङ्गानां प्रत्येकं च पलद्वयम् । एतत्त्सकलमादाय चूर्णयित्वा विचक्षणः ॥ ५ ॥

( ४९२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । त्रिफलायाः कषायेण वटिकां कारयेद्भिषक् । एकैकां भक्षयेत्प्रातस्तक्रञ्चापि पिबेदनु ॥ ६ ॥ हन्ति शूलं पार्श्वशूलं कुक्षिबस्तिगुदे रुजम् । श्वासं कासं तथा कुष्ठं ग्रहणीदोषनाशिनी ॥ ७ ॥ निसोथकी जड़, नागरमोथा, त्रिफला और त्रिकुटा यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले, पारा और गंधक प्रत्येक दो दो तोले, लोहा- भस्म, अभ्रकभस्म और वायविडंग यह प्रत्येक औषधि आठ आठ तोले इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर त्रिफलेके क्वाथमें मर्दन करके गोली बना लेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल एक गोली खावे और ऊपरसे तक्रको पीवे । इससे शूल, पार्श्वशूल, कुक्षि, वस्ति और गुदज- शूल, श्वास, खाँसी, कुष्ठ और संग्रहणी रोग नष्ट होते हैं । इसको पानीयभक्त वटिका कहते हैं ॥ ४-७ ॥ क्षुधावती गुटिका । आशुभक्तोदकैः पिष्टमभ्रकं तत्र संस्थितम् । कन्दमाणास्थिसंहारखण्डकर्णरसैरथ ॥ ८ ॥ तण्डुलीयकशालिञ्चकालमारिषजेन च । वृश्चीरबृहतीभृङ्गलक्ष्मणाकेशराजकैः ॥ ९ ॥ पेषणं भावनं कुर्यात्पुटञ्चानेकशो भिषक् । यावन्निश्चन्द्रकं तत्स्याच्छुद्धिरेवं विहायसः ॥ १० ॥ स्वर्णमाक्षिकशालिञ्चे ध्मातं निर्व्वापितं जले । त्रैफलेऽथ विचूर्ण्यैवं लौहं कान्तादिकं पुनः ॥११॥ बृहत्पत्रकरीकर्णत्रिफलावृद्धदारजैः । माणकन्दास्थिसंहारशृङ्गवेरभवै रसैः ॥ १२ ॥

भाषाटीकासहित । ( ४९३ ) दशमूलीमुण्डितिकातालमूलीसमुद्भवैः । पुटितं साधु यत्नेन शुद्धिमेवमयो व्रजेत् ॥ १३ ॥ उत्तम लक्षणोंवाला कृष्णाभ्रक लेकर उसका चूर्ण करके आशु नामवाले धानोंकी कांजीमें एक दिन रात भिगोकर रख देवे । फिर इसको सुखाकर उपरोक्त कांजीमें पीसकर जमीकंद, मानकंद, अस्थि- संहार ( हडफोडी ) खण्डकर्ण, चौलाई, शालिंचशाक, मरूसा, सुफेद् पुनर्नवा, कटेरी, भांगरा, लक्ष्मणा और कुकुरभांगरा, इन प्रत्येकके रसमें अलग अलग और मिलाकर वारंवार भावना देवे तथा वारंवार पुटमें पकावे । इस प्रकार वारंवार भावना देकर और वारंवार खरल करके पकावे; जबतक अभ्रक निश्चन्द्र अर्थात् चंद्रिका रहित न हो जावे तबतक पुट देवे । फिर सोनामाखी और शालिंचके पत्तोंका शाक इन दोनोंको एकत्र पीसकर उससे कान्तलोहेके ऊपर लेप करके भस्त्राग्निमें पकाकर त्रिफलेके क्वाथमें छोड़ देवे । इस प्रकार वारंवार दग्ध करके वारंवार त्रिफलेके क्वाथमें बुझावे । पश्चात् इसका चूर्णकर देवे । इस प्रकार निरुत्थित मारित लोहेको जलमें धोकर सूर्यकी धूपमें सुखाकर बड़े पत्तोंके हस्तिकर्ण पलाश, त्रिफलेके, विधारेके, मानकंदके, जमीकंदके, हड़फोड़ीके, सोंठके, दशमूलके, मुण्डीके और मुसलीके क्वाथमें या रसमें अलग अलग खरल करके यत्नपूर्वक पुटपाकमें पकावे । इस प्रकार करनेसे लोहा शुद्ध हो जाता है ॥ ८-१३ ॥ वशिरं श्वेतवाह्यालं मधुपर्णी मयूरकम् । तण्डुलीयञ्च वर्षाभ्वं दत्त्वाऽधश्चोर्ध्वमेव च ॥ १४ ॥ पाक्यं सुजीर्णमण्डूरं गोमूत्रेण दिनत्रयम् । अन्तर्बाष्पमदग्धञ्च तथा स्थाप्यं दिनत्रयम् ॥१५॥ विच्चूर्णितं शुद्धिरियं लोहकिट्टस्य दर्शिता । जयन्त्या वर्द्धमानस्य आर्द्रकस्य रसेन तु ॥ १६ ॥ १७

( ४९४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वायस्याश्चानुपूर्व्यैवं मर्दनं रसशोधनम् । गन्धकं नवनीताख्यं क्षुद्रितं लौहभाजने ॥ १७ ॥ त्रिधा चण्डांतपे शुष्कं भृङ्गराजरसाप्लुतम् । ततो वह्नौ द्रवीभूतं त्वरितं वस्त्रगालितम् ॥ यत्नाद्भृङ्गरसे क्षिप्तं पुनः शुष्कं विशुद्ध्यति ॥१८॥ पश्चात् चव्य, सफेद फूलकी खिरेंटी, गिलोय, चिरचिटा, चौलाई और पुनर्नवा (विखखपरा) इन सब औषधियोंकी जड़, छाल और पत्ते लेकर एक हांडीमें रखे और उसके ऊपर पुराना जीर्ण मण्डूर स्थापन करके प्रथम कही हुई औषधियोंकी जड़, छाल और पत्तोंसे आच्छा- दन करके उसमें गोमूत्र डालकर हांडीके मुखको अच्छे प्रकारसे बंद करके तीन दिन तक पकावे । और सुखाकर चूर्ण कर लेवे । इसप्रकार करनेसे मण्डूर शुद्ध होजाता है । जयंतीके पत्ते, एरण्डकी जड़, अद्- रख और मकोय इन प्रत्येकके रसके द्वारा अलग अलग खरल करके पारेको शुद्ध करे । इसके उपरांत नवनीताख्य अर्थात् नवनीत घृतके समान गंधकको लेकर चावलोंके समान उसके छोटे छोटे टुकड़े करके भांगरेके रसके द्वारा लोहेके पात्रमें भिगोकर प्रचण्ड सूर्यकी धूपमें सुखावे । इस प्रकार तीन बार भांगरेके रसमें डुबोकर तीन बार सूर्यकी तेज धूपमें सुखा लेवे । फिर गंधकको लोहेके पात्रमें डालकर बेरीके दीप्त अंगारोंपर स्थापन कर लोहेके डंडेसे या करछीसे चलाता जाय । अच्छे प्रकारसे गंधक गलकर तेलके समान हो जाय तब भांगरेके रससे भरी हुई हांडीके मुँहपर घृतमें भीगा वस्त्र लपेटकर उस वस्त्रमें गंधकको छोड़ देवे । फिर गंधकको भांगरेके रसमेंसे निकालकर जलमें धोकर सुखा लेवे और फिर पीछे उसका चूर्ण कर लेवे ॥ १४-१८ ॥ गगनाद्द्विपलं चूर्णं लौहस्य पलमात्रकम् । लोहकिट्टपलार्द्धं च सर्वमेकत्र संस्थितम् ॥ १९ ॥

भाषाटीकासहित । ( ४९५ ) मण्डूकपर्णीवशिरतालमूलीरसैः पुनः । वरीभृङ्गकेशराजकालमारिषजैरथ ॥ २०॥ त्रिफलाभद्रमुस्ताभिः स्थालीपाकाद्विचूर्णितम् । रसगन्धकयोः कर्षं प्रत्येकं ग्राह्यमेकतः ॥ २१ ॥ तन्मसृणशिलाखण्डे यत्नतः कज्जलीकृतम् । वचा चव्यं यमानी च जीरके शतपुष्पिका ॥ २२ ॥ व्योषं मुस्तं विडङ्गञ्च ग्रन्थिकं खरमञ्जरी । त्रिवृता चित्रको दन्ती सूर्यावर्त्तः सितस्तथा ॥ २३॥ भृङ्गमाणककन्दाश्च खण्डकर्णक एव च । दण्डोत्पला केशराजकालावकरकोऽपि च ॥ २४ ॥ एषामर्द्धपलं ग्राह्यं पटघृष्टं सुचूर्णितम् । प्रत्येकं त्रिफलायाश्च पलार्द्धं पलमेव च ॥ २५ ॥ एतत्सर्वं समालोड्य लोहपात्रे तु भावयेत् । आतपे दण्डसंघृष्टमार्द्रकस्य रसैस्त्रिधा ॥ २६ ॥ तद्रसेन शिलापिष्टं गुटिकां कारयेद्भिषक् । बदरास्थिनिभां शुष्कां स्वनुगुप्तां निधापयेत्॥२७॥ [

( ४९६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । १ तोला दोनोंको एक उत्तम शुभ्र खरलमें डालकर कज्जली बना लेवे । फिर वच, चव्य, अजवायन, जीरा, कालाजीरा, सौंफ, त्रिकुटा, नागरमोथा, वायविडंग, पीपलामूल, चिरचिटा, निसोधकी जड़, चीतेकी जड़, दंतीकी जड़, सुफेद हुलहुल, भांगरा, मानकंद, जमीकंद, खण्डकर्ण, दंडोत्पल, कुकुरभांगरा, काला अंकोल और त्रिफला इन सबको अत्यंत बारीक चूर्णकर प्रत्येक दो दो तोले और पूर्वोक्त अभ्र- कसे त्रिफला तक सब औषधियोंको लोहेके पात्रमें डालकर अदरकके रसकी तीन भावना देकर फिर अदरकके रसमें खरल करके बेरकी गुठलीकी बराबर गोली बना लेवे और सूख जानेपर किसी शीशीमें रख देवे ॥ १९-२७ ॥ तत्प्रातर्भोजनादौ तु सेवितं गुटिकात्रयम् । अम्लोदकानुपानञ्च हितं मधुरवर्जितम् ॥ दुग्धञ्च नारिकेलञ्च वर्जनीयं विशेषतः ॥ २८ ॥ भोज्यं यथेष्टमिष्टञ्च वारिभक्ताम्लकाञ्जिकम् । हन्त्यम्लपित्तं विविधं शूलञ्च परिणामजम् ॥ २९॥ पाण्डुरोगञ्च गुल्मञ्च शोथोदरगुदामयान् । यक्ष्माणं पञ्चकासांश्च मन्दाग्नित्वमरोचकम् ॥ ३०॥ प्लीहानं श्वासमानाहमामवातं सुदारुणम् । गुटी क्षुधावती सेयं विख्याता रोगनाशिनी ॥ ३१॥ और प्रतिदिन प्रातःकाल भोजनके आदिमें ३ गोली खावे । इसके सेवन करनेके बाद कांजीका अनुपान करे । मधुर रसवाले पदार्थ, दूध और नारियलका भक्षण करना त्याग देवे । तथा अन्यान्य वांछित खाद्य, जलसमेत भात और खट्टी कांजीको भक्षण करे । इसके सेवन करनेसे विविध प्रकारका अम्लपित्त, परिणामशूल, पाण्डुरोग, गुल्म, शोथ, उदररोग, गुदरोग,राजयक्ष्मा, पांच प्रकारकी

भाषाटीकासहित । ( ४९७ ) खांसी, मंदाग्नि, अरुचि, प्लीहा, श्वास, आनाह और दारुण आमवात रोग नष्ट होते हैं । इसको क्षुधावती वटिका या गुटिका कहते हैं ॥ २८-३१॥ अविपत्तिकर चूर्ण । त्रिकटु त्रिफला मुस्तं बीजञ्चैव विडङ्गकम् । एलापत्रञ्च सर्वञ्च समभागं विचूर्णयेत् ॥ ३२ ॥ यावन्त्येतानि चूर्णानि लवङ्गं तत्समं भवेत् । सर्वचूर्णद्विगुणितं त्रिवृच्चूर्णञ्च दापयेत् ॥ ३३ ॥ सर्वमेकीकृतं यावत्तावच्छर्करयान्वितम् । सर्वमेकीकृतं पात्रे स्निग्धभाण्डे निधापयेत् ॥ ३४ ॥ भोजनादौ ततोऽन्ते च मध्वाज्याभ्यामिदं शुभम् । शीततोयानुपानञ्च नारिकेलोदकं तथा ॥ ३५ ॥ ततो यथेष्टमाहारं कुर्यात्क्षीररसाशनः । अम्लपित्तं निहन्त्याशु विबद्धमलमूत्रकम् ॥ ३६ ॥ अग्निमान्द्यभवान् रोगान्नाशयेच्चाविकल्पतः । बलपुष्टिकरञ्चैव शूलदुर्नामनाशनम् ॥ ३७ ॥ प्रमेहान् विंशतिञ्चैव मूत्राघातांस्तथाश्मरीम् । अविपत्तिकरं चूर्णमगस्त्यमुनिभाषितम् ॥ ३८ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे अम्लपित्ताधिकारः । त्रिकुटा, त्रिफला, नागरमोथा, वायविडंग, इलायची और तेजपात यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और इनके चूर्णके बराबर लौंगका चूर्ण लेवे और सब चूर्णसे दुगुना निसोधका चूर्ण लेवे और सबकी बराबर उत्तम स्वच्छ खांड मिलावे। सबको एकत्र पीसकर एक उत्तम घीके चिकने बासनमें भरकर रख देवे । पश्चात् भोजनकी

( ४९८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । आदिमें, भोजनके अन्तमें घी और सहतके साथ इस औषधिको यथोक्तमात्रासे सेवन करे और ऊपरसे शीतल जल तथा नारियलका जल पान करे । इसपर दूध और मांसादि पदार्थोंका यथेष्ट भोजन करे । इसके सेवन करनेसे अम्लपित्त, मलमूत्रका विबन्ध और मंदाग्निजनित समस्त रोग नष्ट होते हैं । बल और पुष्टिकी वृद्धि होती है । शूल, बवासीर, बीस प्रकारके प्रमेह, मूत्राघात और अश्मरीरोग नष्ट होते हैं । इस अविपत्तिकर चूर्णको अगस्त्य मुनिने कहा है ॥ ३२-३८ ॥ इति अम्लपित्ताधिकार सम्पूर्ण । अथ विसर्प-विस्फोट-तन्तुक-रोगचिकित्सा । कालाग्निरुद्ररस । सूताभ्रकान्तलौहानां भस्मगन्धकमाक्षिकम् । वन्यकर्कोटकद्रावैस्तुल्यं मर्द्यं दिनावधि ॥ १ ॥ वन्यकर्कोटिकाकन्दे क्षिप्त्वा लिप्त्वा मृदा बहिः । भूधराख्ये पुटे पश्चाद्दिनैकं तद्विपाचयेत् ॥ २ ॥ दशमाषं विषं योज्य माषमात्रन्तु भक्षयेत् । रसः कालाग्निरुद्रोऽयं दशाहेन विसर्पनुत् ॥ पिप्पलीमधुसंयुक्तमनुपानं प्रकल्पयेत् ॥ ३ ॥ शुद्ध पारा, अभ्रकभस्म, कान्तलोहभस्म, गंधक और सोनामाखी- भस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर वनककोड़ेकी जड़के रसमें एक दिनतक खरल करके वनककोड़ेकी जड़के कल्कमें इस औषधिको रखे और ऊपरसे मिट्टी आदिसे लेप कर देवे । पश्चात् भूधर यंत्रमें इसको पकाकर समस्त औषधियोंका दशवां भाग विष मिलाकर एक मासे परिमाण लेकर पीपलके चूर्ण और सहतमें मिलाकर सेवन करे तो दश दिनमें विसर्परोग दूर हो जाता है । इसको कालाग्नि रुद्र रस कहते हैं ॥ १-३ ॥

भाषाटीकासहित । (४९९ ) पित्तनाशकभैषज्यं योगवाहिरसं सुधीः । कुष्ठोद्दिष्टक्रियां सर्वामपि कुर्याद्भिषग्वरः ॥ ४ ॥ इस विसर्प रोगमें समस्त पित्तनाशक औषधि और योगवाही औष- धियोंका प्रयोग करे । तथा कुष्ठरोगोक्त समस्त चिकित्सा करे ॥ ४ ॥ गुडूचीनिम्बजक्वाथैः खदिरेन्द्रयवाम्बुना । कर्पूरत्रिसुगन्धिभ्यां युक्तं सूतं द्विवल्लभम् ॥ विस्फोटं त्वरितं हन्याद्वायुर्जलधरानिव ॥ ५ ॥ गिलोय और नीमकी छालके क्वाथमें; अथवा खैर और इन्द्रजौके क्वाथमें कपूर, दालचीनी, इलायची और तेजपातका चूर्ण डालकर इसके साथ चार रत्ती परिमाण रससिन्दूरके सेवन करनेसे शीघ्र ही विस्फोटकरोग ऐसे नष्ट होता है, जिसप्रकार वायुसे मेघोंके समूह नष्ट हो जाते हैं ॥ ५ ॥ गव्यं सर्पिरुयहं पीत्वा निर्गुण्डीस्वरसं त्र्यहम् । विविधं स्नायुकं

(५००) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ मसूरिकाचिकित्सा । पापरोगान्तक रस । अथ शुद्धस्य सूतस्य मूर्च्छितस्य मृतस्य च । द्विबलापिप्पलीधात्रीरुद्राक्षघृतमाक्षिकैः ॥ पापरोगान्तको योगः पृथिव्यामेव दुर्लभः ॥ १ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे मसूरिकाचिकित्सा । रससिन्दूर, खिरैंटी, कंघी, पीपल, आमले और रुद्राक्ष इन सबका चूर्ण तथा घी और सहत सबको मिलाकर सेवन करनेसे मसूरिका रोग नष्ट होता है । यह औषधि पृथिवीमें दुर्लभ है । इसको पाप- रोगान्तक रस कहते हैं ॥ १ ॥ इति मसूरिकाचिकित्सा । अथ क्षुद्ररोगचिकित्सा । क्षुद्ररोगेषु मतिमांस्तत्तदौषधयोगतः । भस्मसूतं प्रयुञ्जीत तथात्र योगवाहिकम् ॥ १ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे क्षुद्ररोगचिकित्सा । बुद्धिमान् वैद्य क्षुद्र रोगोंमें उन्हीं उन्हीं क्षुद्ररोगनाशक औषधि- योंके अनुपानके साथ रससिन्दूरका प्रयोग करे तथा अन्यान्य योग- वाही औषधियोंका भी प्रयोग करे ॥ १ ॥ इति क्षुद्ररोगचिकित्सा । अथ मुखरोगचिकित्सा । चतुर्मुख रस । मृतं सूतं.मृतं स्वर्णं द्वाभ्यां तुल्यां मनःशिलाम् । विमर्दयेच्च तैलेन अतसीसम्भवेन च ॥ १ ॥ तद्गोलं वस्त्रतो बद्ध्वा लेपयेच्च समन्ततः । अतसीफलकल्केन दोलायन्त्रे त्र्यहं पचेत् ॥ उद्धृत्य धारयेद्वक्त्रे जिह्वादन्तास्यरोगनुत् ॥ २ ॥

भाषाटीकासहित । (५०१) रससिन्दूर और सोनाभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, मैनाशिल दो भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके अलसीके तेलमें पीसकर गोलासा बना लेवे। फिर इस औषधिके गोलेको वस्त्रमें बांधकर अलसीके कल्कमें लेप करके तीन दिनतक दोलायंत्रमें पकावे। इस औषधिको मुखमें धारण करनेसे जिह्वारोग दन्तरोग, और सकल मुखके रोग नष्ट होते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ पार्वती रस । पार्वतीकाशिसम्भूतो दरदो मधुपुष्पकम् । गुडूची शाल्मली द्राक्षा धान्यभूनिम्बमार्कवम् ॥३॥ तिलमुद्गपटोलञ्च कूष्माण्डलवणद्वयम् । यष्टिका धान्यकं भस्म चान्तर्दग्धं समं समम्॥४॥ मुखरोगं निहन्त्याशु पार्वतीरस उत्तमः । पित्तज्वरं चिरं हन्ति तिमिरञ्च तृषामपि ॥ ५ ॥ गंधक, पारा, सिंग्रफ, महुवेके फूल, गिलोय, सेमलकी छाल, दाख, धनिया, चिरायता, कुकुरभांगरा, तिल, मूंग, पटोल, पेठा, कालानमक, सैंधानमक, मुलैठी और धनिया इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एक हांडीमें रखकर और उसका मुख अच्छे प्रकारसे बन्द करके अन्तर्धूमरीतिसे दग्ध करे। इसके सेवन करनेसे बहुत दिनोंका पित्तज्वर, मुखरोग, तिमिररोग और तृषारोग नष्ट होते हैं। इसको पार्वतीरस कहते हैं ॥ ३-५ ॥ मुखरोगहरी । रसगन्धौ समौ ताभ्यां द्विगुणञ्च शिलाजतु । गोमूत्रेण विमर्द्याथ सप्तधार्द्रद्रवेण च ॥ ६ ॥ जातीनिम्बमहाराष्ट्रीरसैः सिद्धयति पाकहा । कणामधुयुतं हन्ति मुखरोगं सुदारुणम् ॥ ७ ॥

( ५०२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह। गुञ्जाष्टकमिदं तालुगलौष्ठदन्तरोगनुत् । महाराष्ट्राश्वगन्धाभ्यां मुखञ्च प्रतिसारयेत् ॥ धारणात्सेवनाच्चैव हन्ति सर्वान्मुखामयान् ॥ ८ ॥ पारा १ भाग, गन्धक १ भाग और शिलाजीत ४ भाग, इन तीनों औषधियोंको एकत्र गोमूत्रमें पीसकर अदरखके रसमें सात, मालतीके पत्तोंके रसमें सात, नीमके रसमें सात और महाराष्ट्री ( मरेठी, पनिसिगा, गजपीपल, ) के रसमें सात भावना देकर आठ आठ रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे मुख- पाक दूर होता है । पीपलके चूर्ण और सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे दारुण मुखरोग, तालु, गल, ओष्ठ और दन्तसम्बन्धी समस्त रोग नष्ट होते हैं । महाराष्ट्री और असगन्धके क्वाथसे मुखको धोकर इस औषधिको मुखमें धारण अथवा सेवन करनेसे सब प्रकारके मुखरोग नष्ट होते हैं ॥ ६-८ ॥ सर्वास्यामयजित्सेव्यो मधुना पर्पटीरसः ॥ ९ ॥ पित्तपापड़ेके रस और सहतको एकत्र मिलाकर सेवन करनेसे सर्व प्रकारके मुखरोग नष्ट होते हैं । अथवा पर्पटीरसको २ रत्ती प्रमाण सहतमें मिलाकर खानेसे मुखरोग नष्ट होता है ॥ ९ ॥ पथ्या बालककुष्ठञ्च गोमूत्रेण प्रसाधयेत् । एषा च वटिका हन्ति मुखदौर्गन्ध्यसन्ततिम्॥१०॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे मुखरोगाधिकारः । हरड़, सुगन्धवाला और कूठ इन सब औषधियोंका चूर्ण समान भाग लेकर अठगुने गोमूत्रमें पकावे । जब पककर खूब गाढा हो जाय तब यथोचित मात्राकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे मुखदौर्गन्ध्यादि समस्त विकार दूर होते हैं ॥ १० ॥ इति मुखरोगाधिकार सम्पूर्ण ।

भाषाटीकासहित । ( ५०३ ) अथ कर्णरोगाधिकार । कफकेतु रस । व्योषहिज्जलबीजञ्च शंखभस्म विषान्वितम् । मरिचं सदृशं खादेत्कफकेतुमहारसम् ॥ १ ॥ सोंठ, मिरच, पीपल, हिज्जलबीज, शंखकी भस्म, विष इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर जलमें पीसकर कालीमिर्च बराबर सेवन करनेसे कर्णरोग नष्ट होता है। इसको कफकेतु रस कहते हैं॥१॥ सूतं गन्धं विषञ्चैव टङ्कणं सकपर्दकम् । मरिचेन समायुक्तमार्ड्रतोयेन भावितम् ॥ २ ॥ वह्निमान्द्यञ्चामरोगं श्लेष्माणं ग्रहणीगदम् । सन्निपातं तथा शोथं हन्ति श्रोत्रोद्भवं गदम् ॥ ३ ॥ पारा, गंधक, विष, सुहागा, कौड़ीकी भस्म और कालीमिरच इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर अदरखके रसमें सातवार भावना देकर उपयुक्त मात्रानुसार सेवन करनेसे मंदाग्नि, आमरोग, श्लेष्मा, संग्रहणी, सन्निपात, शोथ और कर्णगत अनेक रोग नष्ट होते हैं ॥ २ ॥ ३ ॥ योगवाहिरसाः सर्वे प्रयोक्तव्या भिषग्वरैः । कर्णरोगेषु सर्वेषु पीनसादिषु नित्यशः ॥ ४ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे कर्णरोगाधिकारः । बुद्धिमान् वैद्य समस्त योगवाही रसोंको यथायोग्य अनुपानोंके साथ कर्णरोगमें प्रयुक्त करे । तथा पीनसा दिरोगोंमें भी प्रयोग करे ॥ ४ ॥ इति कर्णरोगचिकित्सा समाप्त ।

( ५०४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ नासारोगाधिकार । पञ्चामृत रस । शुद्धसूतं समादाय गन्धभागद्वयं ततः । त्रिभागं टङ्कणञ्चापि विषं भागचतुष्टयम् ॥ १ ॥ पञ्चभागं तथा देयं मरिचस्य प्रयत्नतः । शृङ्गवेररसैः पिष्ट्वा गुटिका पञ्चरक्तिका ॥ २ ॥ अनुपानं हितं योज्यं सर्वरोगप्रशान्तये । जलदोषोद्भवे रोगे महत्युग्रे जलोदरे ॥ ३ ॥ सन्निपातेषु रोगेषु नासाव्याधौ सपीनसे । व्रणशोथे व्रणे चैव उपदंशे भगन्दरे ॥ ४ ॥ नाडीव्रणे ज्वरे चैव नखदन्तविघातके । पञ्चामृतरसो योज्यः सर्वरोगप्रशान्तये ॥ ५ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे नासारोगाधिकारः । शुद्ध पारा १ भाग, गंधक २ भाग, सुहागा ३ भाग, विष ४ भाग और कालीमिरच ५ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके अदर- खके रसमें खरल करके पांच पांच रत्तीकी गोली बना लेवे । सर्व रोगोंको दूर करनेके लिये यथोचित अनुपानोंके साथ इस औषधिका सेवन करना चाहिये । इस औषधिको जलदोषजनितरोग, उग्र उदररोग, सन्निपात, नासारोग, पीनस, व्रण, व्रणशोथ, उपदंश, भगंदर, नाडीव्रण, ज्वर और नख तथा दंताभिघात रोगोंमें प्रयुक्त करे । इसको पञ्चामृत रस कहते हैं ॥ १–५ ॥ इति नासारोगचिकित्सा समाप्त ।

भाषाटीकासहित । ( ५०५ ) अथ नेत्ररोगचिकित्सा । नेत्राशनि रस । अभ्रं ताम्रं तथा लौहं माक्षिकञ्च रसाञ्जनम् । पातनायन्त्रसंशुद्धं गन्धकं नवनीतकम् ॥ १ ॥ पलप्रमाणं प्रत्येकं गृह्णीयाच्च विधानवित् । सर्वमेकीकृतं चूर्णं वैद्यैः कुशलकर्मभिः ॥ २ ॥ ततस्तु भावना कार्या त्रिफलाभृङ्गराजकैः । ततः प्रक्षेपचूर्णञ्च पिप्पलीमूलयष्टिका ॥ ३ ॥ एला पुनर्नवा दारु पाठा भृङ्गः शटी वचा । नीलोत्पलं चन्दनञ्च श्लक्ष्णचूर्णञ्च दापयेत् ॥ ४ ॥ माषमेकं प्रदातव्यं घृतश्रीमधुमर्दितम् । मर्दनं लौहदण्डेन पात्रे लौहमये दृढे ॥ ५ ॥ अनुपानं प्रयोक्तव्यमुष्णेन वारिणा तथा । यावतो नेत्ररोगांश्च पानादेव विनाशयेत् ॥ ६ ॥ सरक्ते रक्तपित्ते च रक्ते चक्षुःस्रुतेऽपि च । नक्तान्धे तिमिरे काचे नीलिकापटलार्बुदे ॥ ७ ॥ अभिष्यन्देऽधिमन्थे च पिष्टे चैव चिरन्तने । नेत्ररोगेषु सर्वेषु वातपित्तकफेषु च ॥ सर्वनेत्रामयं हन्याद् वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ८ ॥ अभ्रकभस्म, तांवाभस्म, लोहाभस्म, सोनामाखीभस्म, रसौत और पातनायंत्रमें शोधित आमलासारगंधक यह प्रत्येक औषधि एक एक पल लेवें, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर त्रिफलेके रस और भांगरेके रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर पीपलामूल, मुलैठी, ।

( ५०६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । इलायची, पुनर्नवा, देवदारु, पाठ, भांगरा, कचूर, वच, नीलोत्पल और लालचंदन यह प्रत्येक औषधि एक एक मासे लेकर बारीक चूर्ण करके मिला देवे। पश्चात् इसको लोहेके पात्रमें डालकर लोहेकी कर- छीसे पीसकर घृत और सहतमें मिलाकर गोली बना लेवे। गरम जलके साथ इन गोलियोंके सेवन करनेसे सब प्रकारके नेत्ररोग दूर होते हैं। रक्तजनेत्ररोग, रक्तपित्त, नेत्रोंसे रुधिरका गिरना, रात्र्यन्धरोग (रतौंधी), तिमिररोग, काच, नीलिका, पटल, अर्बुद, नेत्राभिष्यन्दरोग, अधिमन्थ, बहुत दिनोंका फूलारोग और वात-पित्त कफजनित नेत्र- रोग ये सब निश्चय दूर होजाते हैं। इस औषधिके सेवन करनेसे वज्राहत वृक्षके समान समस्त नेत्ररोग दूर होजाते हैं ॥ १-८ ॥ नयनामृत लोह । त्रिकटु त्रिफला शृंगी शटी रास्ना महौषधम् । द्राक्षा नीलोत्पलञ्चैव काकोली मधुयष्टिकम् ॥ ९ ॥ वाट्यालं केशराजञ्च कण्टकारीद्वयं पलम् । लौहाभ्रयोः पलं दत्त्वा भावयेद्वक्ष्यमाणजैः ॥ १० ॥ त्रिफलायाश्च तोयेन भृङ्गराजरसेन वा । भावयित्वा वटी कार्या बदरास्थिनिभा शुभा ॥ यावतो नेत्ररोगांश्च निहन्यान्नात्र संशयः ॥ ११ ॥ त्रिकुटा, त्रिफला, काकड़ासिंगी, कचूर, रास्ना, सोंठ, दाख, नीलो- त्पल, कालोली, मुलैठी, खिरेंटी, कुकुरभांगरा, कटेरी, बडीकटेरी, लोहाभस्म और अभ्रकभस्म, इन प्रत्येकका चूर्ण चार चार तोले लेकर त्रिफलेके और भांगरेके रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर बेरकी गुठलीकी बराबर गोली बना लेवे। इन गोलियोंके सेवन करनेसे सब प्रकारके नेत्ररोग दूर होते हैं। इसको नयनामृत लोह कहते हैं ॥ ९-११ ॥