रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५०६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । इलायची, पुनर्नवा, देवदारु, पाठ, भांगरा, कचूर, वच, नीलोत्पल और लालचंदन यह प्रत्येक औषधि एक एक मासे लेकर बारीक चूर्ण करके मिला देवे। पश्चात् इसको लोहेके पात्रमें डालकर लोहेकी कर- छीसे पीसकर घृत और सहतमें मिलाकर गोली बना लेवे। गरम जलके साथ इन गोलियोंके सेवन करनेसे सब प्रकारके नेत्ररोग दूर होते हैं। रक्तजनेत्ररोग, रक्तपित्त, नेत्रोंसे रुधिरका गिरना, रात्र्यन्धरोग (रतौंधी), तिमिररोग, काच, नीलिका, पटल, अर्बुद, नेत्राभिष्यन्दरोग, अधिमन्थ, बहुत दिनोंका फूलारोग और वात-पित्त कफजनित नेत्र- रोग ये सब निश्चय दूर होजाते हैं। इस औषधिके सेवन करनेसे वज्राहत वृक्षके समान समस्त नेत्ररोग दूर होजाते हैं ॥ १-८ ॥ नयनामृत लोह । त्रिकटु त्रिफला शृंगी शटी रास्ना महौषधम् । द्राक्षा नीलोत्पलञ्चैव काकोली मधुयष्टिकम् ॥ ९ ॥ वाट्यालं केशराजञ्च कण्टकारीद्वयं पलम् । लौहाभ्रयोः पलं दत्त्वा भावयेद्वक्ष्यमाणजैः ॥ १० ॥ त्रिफलायाश्च तोयेन भृङ्गराजरसेन वा । भावयित्वा वटी कार्या बदरास्थिनिभा शुभा ॥ यावतो नेत्ररोगांश्च निहन्यान्नात्र संशयः ॥ ११ ॥ त्रिकुटा, त्रिफला, काकड़ासिंगी, कचूर, रास्ना, सोंठ, दाख, नीलो- त्पल, कालोली, मुलैठी, खिरेंटी, कुकुरभांगरा, कटेरी, बडीकटेरी, लोहाभस्म और अभ्रकभस्म, इन प्रत्येकका चूर्ण चार चार तोले लेकर त्रिफलेके और भांगरेके रसमें अलग अलग सात सात भावना देकर बेरकी गुठलीकी बराबर गोली बना लेवे। इन गोलियोंके सेवन करनेसे सब प्रकारके नेत्ररोग दूर होते हैं। इसको नयनामृत लोह कहते हैं ॥ ९-११ ॥