भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । (५०७) क्षतशुक्लहर गुग्गुल । अयःसयष्टित्रिफलाकणानां चूर्णानि तुल्यानि पुरेण नित्यम् । सर्पिर्मधुभ्यां सह भक्षितानि शुक्लानि काचानि निहन्ति शीघ्रम् ॥ १२ ॥ लोहाभस्म, मुलैठी, त्रिफला और पीपल इन प्रत्येकका चूर्ण एक एक भाग और गूगल छः भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोक्त मात्रानुसार सहत और घृतमें मिलाकर सेवन करनेसे नेत्रशुक्लगतरोग और काचरोग शीघ्र ही नष्ट होजाते हैं । इसको क्षत- शुक्लहर गूगल कहते हैं ॥ १२ ॥ त्रिफलापद्मयष्ट्याह्वयुक्तं सायं निषेवितम् । लौहं तिमिरकं हन्ति सुधांशुस्तिमिरं यथा ॥ १३ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे नेत्ररोगचिकित्सा । त्रिफला, पद्माख और मुलैठी इन प्रत्येकका चूर्ण और लोह- भस्मका चूर्ण ५ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके यथोचित मात्रानुसार संध्याके समय सेवन करनेसे तिमिररोग ऐसे नष्ट होता है जिसप्रकार चन्द्रमासे अंधकारका समूह दूर होता है ॥ १३ ॥ इति नेत्ररोगचिकित्सा समाप्त । अथ शिरोरोगाधिकार । रसचन्द्रिका वटी । त्रैलोक्यविजयाबीजं बीजमुन्मत्तकस्य च । कण्टकारीबीजकञ्च हिज्जलं बीजमेव च ॥ १ ॥ बीजञ्च वृद्धदारस्य समौ गन्धकपारदौ । आर्द्रकैर्वटिका कार्या कलायपरिमाणतः ॥ २ ॥