रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (५०१) रससिन्दूर और सोनाभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, मैनाशिल दो भाग इन सब औषधियोंको एकत्र करके अलसीके तेलमें पीसकर गोलासा बना लेवे। फिर इस औषधिके गोलेको वस्त्रमें बांधकर अलसीके कल्कमें लेप करके तीन दिनतक दोलायंत्रमें पकावे। इस औषधिको मुखमें धारण करनेसे जिह्वारोग दन्तरोग, और सकल मुखके रोग नष्ट होते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ पार्वती रस । पार्वतीकाशिसम्भूतो दरदो मधुपुष्पकम् । गुडूची शाल्मली द्राक्षा धान्यभूनिम्बमार्कवम् ॥३॥ तिलमुद्गपटोलञ्च कूष्माण्डलवणद्वयम् । यष्टिका धान्यकं भस्म चान्तर्दग्धं समं समम्॥४॥ मुखरोगं निहन्त्याशु पार्वतीरस उत्तमः । पित्तज्वरं चिरं हन्ति तिमिरञ्च तृषामपि ॥ ५ ॥ गंधक, पारा, सिंग्रफ, महुवेके फूल, गिलोय, सेमलकी छाल, दाख, धनिया, चिरायता, कुकुरभांगरा, तिल, मूंग, पटोल, पेठा, कालानमक, सैंधानमक, मुलैठी और धनिया इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एक हांडीमें रखकर और उसका मुख अच्छे प्रकारसे बन्द करके अन्तर्धूमरीतिसे दग्ध करे। इसके सेवन करनेसे बहुत दिनोंका पित्तज्वर, मुखरोग, तिमिररोग और तृषारोग नष्ट होते हैं। इसको पार्वतीरस कहते हैं ॥ ३-५ ॥ मुखरोगहरी । रसगन्धौ समौ ताभ्यां द्विगुणञ्च शिलाजतु । गोमूत्रेण विमर्द्याथ सप्तधार्द्रद्रवेण च ॥ ६ ॥ जातीनिम्बमहाराष्ट्रीरसैः सिद्धयति पाकहा । कणामधुयुतं हन्ति मुखरोगं सुदारुणम् ॥ ७ ॥