भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 526

(५००) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ मसूरिकाचिकित्सा । पापरोगान्तक रस । अथ शुद्धस्य सूतस्य मूर्च्छितस्य मृतस्य च । द्विबलापिप्पलीधात्रीरुद्राक्षघृतमाक्षिकैः ॥ पापरोगान्तको योगः पृथिव्यामेव दुर्लभः ॥ १ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे मसूरिकाचिकित्सा । रससिन्दूर, खिरैंटी, कंघी, पीपल, आमले और रुद्राक्ष इन सबका चूर्ण तथा घी और सहत सबको मिलाकर सेवन करनेसे मसूरिका रोग नष्ट होता है । यह औषधि पृथिवीमें दुर्लभ है । इसको पाप- रोगान्तक रस कहते हैं ॥ १ ॥ इति मसूरिकाचिकित्सा । अथ क्षुद्ररोगचिकित्सा । क्षुद्ररोगेषु मतिमांस्तत्तदौषधयोगतः । भस्मसूतं प्रयुञ्जीत तथात्र योगवाहिकम् ॥ १ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे क्षुद्ररोगचिकित्सा । बुद्धिमान् वैद्य क्षुद्र रोगोंमें उन्हीं उन्हीं क्षुद्ररोगनाशक औषधि- योंके अनुपानके साथ रससिन्दूरका प्रयोग करे तथा अन्यान्य योग- वाही औषधियोंका भी प्रयोग करे ॥ १ ॥ इति क्षुद्ररोगचिकित्सा । अथ मुखरोगचिकित्सा । चतुर्मुख रस । मृतं सूतं.मृतं स्वर्णं द्वाभ्यां तुल्यां मनःशिलाम् । विमर्दयेच्च तैलेन अतसीसम्भवेन च ॥ १ ॥ तद्गोलं वस्त्रतो बद्ध्वा लेपयेच्च समन्ततः । अतसीफलकल्केन दोलायन्त्रे त्र्यहं पचेत् ॥ उद्धृत्य धारयेद्वक्त्रे जिह्वादन्तास्यरोगनुत् ॥ २ ॥