भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 522, कुल 584 में से

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( ४९६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । १ तोला दोनोंको एक उत्तम शुभ्र खरलमें डालकर कज्जली बना लेवे । फिर वच, चव्य, अजवायन, जीरा, कालाजीरा, सौंफ, त्रिकुटा, नागरमोथा, वायविडंग, पीपलामूल, चिरचिटा, निसोधकी जड़, चीतेकी जड़, दंतीकी जड़, सुफेद हुलहुल, भांगरा, मानकंद, जमीकंद, खण्डकर्ण, दंडोत्पल, कुकुरभांगरा, काला अंकोल और त्रिफला इन सबको अत्यंत बारीक चूर्णकर प्रत्येक दो दो तोले और पूर्वोक्त अभ्र- कसे त्रिफला तक सब औषधियोंको लोहेके पात्रमें डालकर अदरकके रसकी तीन भावना देकर फिर अदरकके रसमें खरल करके बेरकी गुठलीकी बराबर गोली बना लेवे और सूख जानेपर किसी शीशीमें रख देवे ॥ १९-२७ ॥ तत्प्रातर्भोजनादौ तु सेवितं गुटिकात्रयम् । अम्लोदकानुपानञ्च हितं मधुरवर्जितम् ॥ दुग्धञ्च नारिकेलञ्च वर्जनीयं विशेषतः ॥ २८ ॥ भोज्यं यथेष्टमिष्टञ्च वारिभक्ताम्लकाञ्जिकम् । हन्त्यम्लपित्तं विविधं शूलञ्च परिणामजम् ॥ २९॥ पाण्डुरोगञ्च गुल्मञ्च शोथोदरगुदामयान् । यक्ष्माणं पञ्चकासांश्च मन्दाग्नित्वमरोचकम् ॥ ३०॥ प्लीहानं श्वासमानाहमामवातं सुदारुणम् । गुटी क्षुधावती सेयं विख्याता रोगनाशिनी ॥ ३१॥ और प्रतिदिन प्रातःकाल भोजनके आदिमें ३ गोली खावे । इसके सेवन करनेके बाद कांजीका अनुपान करे । मधुर रसवाले पदार्थ, दूध और नारियलका भक्षण करना त्याग देवे । तथा अन्यान्य वांछित खाद्य, जलसमेत भात और खट्टी कांजीको भक्षण करे । इसके सेवन करनेसे विविध प्रकारका अम्लपित्त, परिणामशूल, पाण्डुरोग, गुल्म, शोथ, उदररोग, गुदरोग,राजयक्ष्मा, पांच प्रकारकी

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