भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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भाषाटीकासहित । ( ४९३ ) दशमूलीमुण्डितिकातालमूलीसमुद्भवैः । पुटितं साधु यत्नेन शुद्धिमेवमयो व्रजेत् ॥ १३ ॥ उत्तम लक्षणोंवाला कृष्णाभ्रक लेकर उसका चूर्ण करके आशु नामवाले धानोंकी कांजीमें एक दिन रात भिगोकर रख देवे । फिर इसको सुखाकर उपरोक्त कांजीमें पीसकर जमीकंद, मानकंद, अस्थि- संहार ( हडफोडी ) खण्डकर्ण, चौलाई, शालिंचशाक, मरूसा, सुफेद् पुनर्नवा, कटेरी, भांगरा, लक्ष्मणा और कुकुरभांगरा, इन प्रत्येकके रसमें अलग अलग और मिलाकर वारंवार भावना देवे तथा वारंवार पुटमें पकावे । इस प्रकार वारंवार भावना देकर और वारंवार खरल करके पकावे; जबतक अभ्रक निश्चन्द्र अर्थात् चंद्रिका रहित न हो जावे तबतक पुट देवे । फिर सोनामाखी और शालिंचके पत्तोंका शाक इन दोनोंको एकत्र पीसकर उससे कान्तलोहेके ऊपर लेप करके भस्त्राग्निमें पकाकर त्रिफलेके क्वाथमें छोड़ देवे । इस प्रकार वारंवार दग्ध करके वारंवार त्रिफलेके क्वाथमें बुझावे । पश्चात् इसका चूर्णकर देवे । इस प्रकार निरुत्थित मारित लोहेको जलमें धोकर सूर्यकी धूपमें सुखाकर बड़े पत्तोंके हस्तिकर्ण पलाश, त्रिफलेके, विधारेके, मानकंदके, जमीकंदके, हड़फोड़ीके, सोंठके, दशमूलके, मुण्डीके और मुसलीके क्वाथमें या रसमें अलग अलग खरल करके यत्नपूर्वक पुटपाकमें पकावे । इस प्रकार करनेसे लोहा शुद्ध हो जाता है ॥ ८-१३ ॥ वशिरं श्वेतवाह्यालं मधुपर्णी मयूरकम् । तण्डुलीयञ्च वर्षाभ्वं दत्त्वाऽधश्चोर्ध्वमेव च ॥ १४ ॥ पाक्यं सुजीर्णमण्डूरं गोमूत्रेण दिनत्रयम् । अन्तर्बाष्पमदग्धञ्च तथा स्थाप्यं दिनत्रयम् ॥१५॥ विच्चूर्णितं शुद्धिरियं लोहकिट्टस्य दर्शिता । जयन्त्या वर्द्धमानस्य आर्द्रकस्य रसेन तु ॥ १६ ॥ १७