रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 520, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४९४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वायस्याश्चानुपूर्व्यैवं मर्दनं रसशोधनम् । गन्धकं नवनीताख्यं क्षुद्रितं लौहभाजने ॥ १७ ॥ त्रिधा चण्डांतपे शुष्कं भृङ्गराजरसाप्लुतम् । ततो वह्नौ द्रवीभूतं त्वरितं वस्त्रगालितम् ॥ यत्नाद्भृङ्गरसे क्षिप्तं पुनः शुष्कं विशुद्ध्यति ॥१८॥ पश्चात् चव्य, सफेद फूलकी खिरेंटी, गिलोय, चिरचिटा, चौलाई और पुनर्नवा (विखखपरा) इन सब औषधियोंकी जड़, छाल और पत्ते लेकर एक हांडीमें रखे और उसके ऊपर पुराना जीर्ण मण्डूर स्थापन करके प्रथम कही हुई औषधियोंकी जड़, छाल और पत्तोंसे आच्छा- दन करके उसमें गोमूत्र डालकर हांडीके मुखको अच्छे प्रकारसे बंद करके तीन दिन तक पकावे । और सुखाकर चूर्ण कर लेवे । इसप्रकार करनेसे मण्डूर शुद्ध होजाता है । जयंतीके पत्ते, एरण्डकी जड़, अद्- रख और मकोय इन प्रत्येकके रसके द्वारा अलग अलग खरल करके पारेको शुद्ध करे । इसके उपरांत नवनीताख्य अर्थात् नवनीत घृतके समान गंधकको लेकर चावलोंके समान उसके छोटे छोटे टुकड़े करके भांगरेके रसके द्वारा लोहेके पात्रमें भिगोकर प्रचण्ड सूर्यकी धूपमें सुखावे । इस प्रकार तीन बार भांगरेके रसमें डुबोकर तीन बार सूर्यकी तेज धूपमें सुखा लेवे । फिर गंधकको लोहेके पात्रमें डालकर बेरीके दीप्त अंगारोंपर स्थापन कर लोहेके डंडेसे या करछीसे चलाता जाय । अच्छे प्रकारसे गंधक गलकर तेलके समान हो जाय तब भांगरेके रससे भरी हुई हांडीके मुँहपर घृतमें भीगा वस्त्र लपेटकर उस वस्त्रमें गंधकको छोड़ देवे । फिर गंधकको भांगरेके रसमेंसे निकालकर जलमें धोकर सुखा लेवे और फिर पीछे उसका चूर्ण कर लेवे ॥ १४-१८ ॥ गगनाद्द्विपलं चूर्णं लौहस्य पलमात्रकम् । लोहकिट्टपलार्द्धं च सर्वमेकत्र संस्थितम् ॥ १९ ॥